लायचामलः
श्री कृष
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खवल्छा प्नस्ाषद उप्वाघ््याख
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र्या चटा
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श कृष्णयामल महातन्त्रम्
वाराणसीताच्तरिकग्रन्थमालायाः षष्ठतमं पुष्पम्
श्रीकृष्णयामलं महातन्त्रम्
सम्पादकः डो° शीतला प्रसाद उपाध्यायः
आगमाचायं: ( लन्धस्वणं पदकः )} प्राध्यापकः, साड्ययोगतन्त्रागमविभागे सम्पूर्णानिन्दसंस्कृत विश्वविद्यालये वाराणस्याम्
प्राच्य प्रकाशन, जगतगज वाराणक्ती वि० सं° २०९४८ | १६६२ ई० [ शक सं° १६१४
ग्रन्थोऽयं अनुसन्धान प्रबन्धरूपेण सम्पूर्णानन्दसंस्कृतविश्वविद्यालयेन 'विद्यावारिधि' इत्युपाध्यथं स्वीकृतः; पुनश्च संशोधन-सं वधं नपूवंक आरतसवंकारस्य मानवसंसाधनविकासमन्त्रालयस्य शिक्षाविभाग- स्याथिकेन साहाय्येन मुद्रितः ।
सर्वाधिकारः सम्पादकस्य
मद्यम् स १२८.००
प्रथमसंस्करणम् ; १००० प्रतिरूपाणि
पुस्तकप्राप्तिस्थानम्-- प्रकाशकः
प्राच्य प्रकाञ्चन
पोस्ट बाक्स न० २०३७ ७४-ए, जगतगंज वाराणसी-२२१००२ ( भारत )
प्रदीप कुमार राय, प्राच्य प्रकाशन, वाराणसी द्वारा प्रकशित एवं अनुप त्रिदिग ववसं, जगतगंज वाराणसी द्वार मुद्रित ।
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आशीरतैचांसि प्रो° वी ° वेङ्टाचलम् कुलाधिपति श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्टौय संस्कृत विद्यापीठ ( माल्य विरवविद्यालय ) नयी दिल्ली शिषस द्भुर्पः अवालोकयापातह््या प्रसद्धान्तरागतेन मया डं शीतला प्रसादोपाध्यायमहोदयैः सम्पादितो न चिरादेव प्राक्ट्यमुपजिगमिषुः श्रीकृष्णयामल ग्रन्थः । अप्रकारितोऽयं ग्रन्थः इदम्प्रथमतया सम्पा प्राकार्यमुपनीयत इत्येतद्विलोक्य यदा भवत्येकतो हषंभूमा, तदा अपरतोऽस्य म्रन्थस्य संस्कृतमाषानिबद्धमुपोद्धातमतिविस्तृतं राष्ट्र भषामयीं प्रस्तावना विलोक्य यत्सत्यं प्रसोदत्यन्तरङ्गम् । यदाधुना आधुनिका युवानः परिश्रमाद् बिभ्यति, सवत्र च लघुनैव साधनेन भूयसीं सिद्धिमसाध्यामपि सिषाधयिषन्ति, तदेभिः बहुधा बहुलं परिश्चम्य ्रकृतग्रन्थसम्बद्धानां भूयसां विषयाणां संग्रहः कृतोऽत्रत्ये स्वोपज्ञ उपोद्धात इत्येतन्नूनं घटयति प्रत्याामेतेषां भाव्यभ्युदये । विशेषतश्च पराक्रान्तमेभिः यामल-ग्रन्थसाहित्य- सङ्कलने, यन्नूनमुपकरिष्यति जिज्ञासून् । भरगवतो विश्वनाथस्य परमानुग्रहेणं तेषां तन्त्रशास्तरग्रन्थसम्पा- दनमनोरथाः सर्वे यथायथं सिद्ध्यनिः वत्याशासे । वाराणसी, वि० वेङ्कुटाच्लम् ६-३- १६६२
५1 प्रो ° ब्रजवर्छभ द्विवेदी
डां० शीतला प्रसाद उपाध्यायने | उपाधिकी प्राप्ति के लिये मेरे निदंशन में कृष्णयामलतन्त का सपालोचनात्मकर परिष्कृत संस्करण ओर गवेषणापूणं उपोदुघात व्रस्तृत कियाथा। दह यह उपाधि तो प्राप्त हो ही गयी, एक वस्तुनिष्ठ प्रस्तावना के साथ अब यह शोध-प्रबन्ध मारत सर्कार के मानव संसाधन विकास मन्त्रालय की आधिक सहायता से तथा अनेक तन्त्र-ग्रन्थो का प्रकाशन कर इसक्षेत्रमे प्रतिष्ठा प्राप्त प्राच्य् प्रकाशन, जगतगंज वाराणसी के सहयोग से प्रकाशित होकर भारतीय साहित्य के प्रबुद्ध पाठकों के समक्ष प्रस्तृत कियाजा रहा है, यह जानकर परम प्रसन्नता हुई । जसा कि प्रस्तावना मे बताया गया दै कृष्णयामलतन्तर् का यहं परिष्कृत संस्करण विभिन्न स्थानोंसे प्राप्त जाठ हुस्तलेखो को सहायता से तयार किया गया है । एक ओर् नवीं मातृका मी इन्हे प्राप्त हृद । अन्य मातुकाओं से यहं पूरो तरह से भिन्न है, अतः इसको प्रथम परिशिष्टमे अलग स्थान दिया गया है । इनका यह् निणेय उचितदहीदै। पूरे अथवा अधूरे आठ हस्तलेखो के आधार पर तो प्रस्तुत ग्रन्थ को इन्होने संशोधित किया ही है, इसके बाद भी जव इन्हें पाठ में कु अशुद्धि जान पड़ी, तो उसे भी परिष्कृत करने का प्रयत्न किया दहै ओर इस तरह के पाठो को यहाँ चोरे कोष्ठकों में रखा गया दै । प्रस्तुत ग्रन्थ के अनेक स्थल नरुटित दहो गयेहें ओर किंसी भी हस्तलेख से जब उसकी पूति न हो सकी, तव वहां इन्होंने अपनी कल्पना के सहारे उस पाठक पूति करने का प्रयत्न किया है ओर एेसे पाठो को बड़ कोष्ठक मे रखा गया है । उदाहरण के लिए हम प्रथम पृष्ठ कोही देखें ~- प्रा प्रे) रणप्रदम् ओर यन्तु (पातु) [त्व] महसि । यहं एक अच्छा प्रयास है ओर अन्य ग्रन्थ-सम्पादकों के लिये भी अनुकरणीय है । सम्पादक की जिम्मेदारी किसी अध्यापकं से कम नहीं होती । एक सही अध्यापक लेसे ग्रन्थ की अ्रन्थियों को लोल्लकर श्लिष्य को उसका अभिप्राय समन्ञाता है, उसीतरहसे एक योग्य सम्पादक भो अपनी टिप्पणियों के, प्रस्तावना ओर
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उपोद्घात के सहारे न्थ के उन दुरूहं स्थलों को परिमाजित, परिष्कृत ओर बोधगम्य बनाकर विज्ञ पाठकों के सामने रल सकता है) प्रस्तावना में इस ग्रन्थ के परिष्कार कं लिये उपयुक्त मातृकराओं के साथ ग्रन्थकाभी संक्षिप्त परिचय आधुनिक एतिहासिक पद्धति से दियादहै ओर प्राचीन भारतीय पद्धति के अनुसार भक्ति- सम्प्रदाय, भक्ति-दशंन, लीला-धाम, श्रीराघा-ङृष्ण एवं कामकला, श्रीराधा-कृष्ण तथा त्रिपुरसुन्दरी आदि विषयों का दाशेनिक स्वरूप भी पूरी गम्भीरताके साथहमारे सामने रला है । अपने संस्कृत उपोद्धात मेँ इन्होने यामलततत्व कौ दाशंनिक व्याख्या ्रस्तत कर यामलशब्द के अथं को स्पष्ट किया है ओर यामलतन्त्रो क प्रतिपाद्य विषयों का उल्लेख करते हुए इनकी संख्या, इलोक- परिमाण आदि के विषय में शास्त्रीय प्रमाणदियेदहँ। यामलोको उत्पत्ति पैसे हई ओौर इनकी संख्या कितनौ है, इन पर सामान्यतः भारतीय पद्धति से विचार कर इन्होने अपने परिश्रमपूणं अध्ययन कं आधार पर ७० यामलग्रन्थों का विष्तारसे विवरण दियाहै। दससे इनका शास्त्र के प्रति समपंणभाव प्रकट होता है। इतना सब करने से उपरान्त इन्होंने पूरे कृष्णयामलतन्त्र कं २८ अध्यायो कं विषयों का संक्षिप्त परिचय देकर पा्चरात्र आगम को पृष्ठभूमि म प्रस्तुत यामल के वक्ता ओर श्रोता का परिचय देते हृए पूरे ग्रन्थ का दाशंनिक विवेचन करते समय यामलावस्था, अदय ततव, यामल-भाव, स्वातन्त्र्य, शक्ति-तत्त्व, सृष्टि-तत्त्व, त्रिकोण-ततव आदि के स्वल्प को स्पष्टकियादहै। देसी तरह से अन्य भी अनेक दुलभ ग्रन्थो का समुचित सम्पादन कर तथा नूतन भ्रन्थों का निर्माण कर सुरभारती की अर विशेष कर भारतीय तन्त्रशास्त्र की श्री-वृद्धिमेये निरन्तर लगे रहै, यही हमारी उस अन्तर्यामी से प्राथंनादहै, जो कि सबका नियामक है। दिनांक ८-३-१६६२ व्रजवल्लभ द्विवेदी पूवं आचायं एवं अध्यक्ष, साख्योगतन्त्रागम विभाग सं० सं° वि० वि०, वाराणसी
४1; 1
प्रो ° बटकनाथ शास्त्री चिस्त
डाँ० शीतला प्रसाद उपाध्यायने तान्त्रिक वाङ्मय के एक महत्वपूणं ग्रन्थ श्रीकृष्णयामल पर अनुसन्धान कर शोध -निबन्ध को रूप से प्रस्तुत किया था। उसका सम्प्रति मुद्रणहो रहा दै, यहं प्रसन्नताका विषयदहै। वैष्णव सम्प्रदायान्तगंत चैतन्य सम्प्रदायका यह ग्रन्थहैषएेसी धारणा है। राधा-कृष्ण युगल को अनादि मिथुनके रूपसे इसमे दिखलायाहै। साथही श्रीविद्या सम्प्रदायसे इसका निकटतर सम्बन्ध है यह भी स्पष्ट करिया है । बहुत सी बातें जो इन सम्प्रदायो मेदहैउनपरपूरा विचार अभी नहीं हाद, परन्तु इस प्रबन्ध से उसक्षेत्रमे प्रवेश हुआ दहे। आशा है भविष्य म इस पर ओर कायं होगा । मै शोधकर्ता को शुभारीर्वाद देता दं । दिनांक २०-२-१६६२ बदटुकनाथ शास्त्री खिस्ते पूवं आचायं एवं अध्यक्ष-साहित्य विभाग सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी
प्रो रामजी मारवीय
अधुना श्रीकृष्णयामलमहातन््म्* सम्पूर्णानन्दसंस्कृतविशव- विद्यालये सांख्ययोगतन्त्रागमविभागे शैवागमप्राध्यापकपदमलङ्- करुवंता आयुष्मता डं० शीतला प्रसाद उपाध्यायेन सुसम्पा्य भूमिकापरिशिष्टादिभिश्च संयोज्य महता यत्नेन प्रकाश्यते । यदुदधतानां सन्दर्भाणां प्रस ङ्गाइच सङ्खतिताः तद्विदुषां वैष्णवागम- हास््ररसिकानां महते तोषाय प्रभविष्यन्ति ।
आशासे अग्रोऽपि अवश्यमेव शास्त्रसेवया सोऽयं यशोभाजनं
भविष्यति । रामजी मालवीय फाल्गुनकृष्णाष्टमी, आचायं एवं अध्यक्ष वि० सं० २०४८ सांख्ययोगतन्त्रागम विभाग
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विहवविद्यालय, वाराणसी
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प्रस्तावना
“श्रीकृष्णयामलमहातन्त्र' का वह संस्करण श्रद्धेयचरण पुज्य गुरुदेव प्रो° ब्रजवल्लभ द्विवेदी के कूणल निदंणन मेतयार किये गये मेरे शोध-प्रबन्ध काही परिष्कृत एवं परिवर्धित स्वरूप है । शोध-काल में मृज्ञे इस ग्रन्थ की पाच मात्रकाएः ही उपलब्ध हो पायी थीं । सौभाग्यसे दस ग्रन्थ के प्रकाशन के समय अन्य चार मातृकाए* ओौर प्राप्त हो गयीं । कुल अठ मातृकाभों कौ सहायता से इसका संस्करण आप सवके समक्ष प्रस्तुत किथाजारहादै। नवीं मातृका का भिन्न पाठने के कारण उसे परिशिष्ट-श्में रखा गया है। इसके अतिरिक्त न्यू कंटलागस कंटलागरम् (भाग ४, प° ३४७-४८) के अनुसार कुठ जन्य मातुकाओं की भी सूचना मिलती दै, किन्तु कुष्ठ कटिनाइयों के कारण इच्छा रहते हए भी संस्करणमें उनका उपयोग नहीं कर स्का ।
माशादहै कि अगले संस्करणोंमे इस कमी को पूरा किय। जा सकेगा ।
मातका-परिचय
संक्षेप में इस संस्करण में प्रयुक्त मातृकाओं का परिचय इस प्रकार है-
क. पूणं । १-६८ पत्रात्मिका, देवनागरी लिपिमे प्राप्त यह बीकानेर स्थित अनूप पुस्तकालय की ४६१ ष्यक मातृका है । यह पूणं रूप से इस ग्रन्थ के प्रारम्भ से अन्त तक प्रयुक्त है। यह मातृका श्रीकृष्णाय नमः पद से प्रारम्भ है । इसके अन्त में लिखा टै- “संवत् १७२६ वषे पौषमासे कृष्णपक्ष चतुदंणो १४ तिथौ रविवासरे श्री विक्रममहानगरे महाराजाधिराज महाराजा श्रीश्रीश्रीश्रीश्री अन्पसिहजी चिरञ्जिवि लि्यावतु मथेन जोशी लिष्यतु । शुभं भवतु । श्रीरस्तु ।'
ख. अपूणं । २,६३-१६० पव्रात्मिका, देवनागरी लिपि में प्राप्त यहभी बीकानेर स्थित अनूप पुस्तकालय की ४६० संख्यक मातृकादटै। यह् प्रथम अध्यायकेय्वें श्लोक के द्वितीय पक्ति अर्थि श्लोक सं० (१.८. ख) से श्लोक सं° (-१.२३.ख ) तक तथा पुनः श्लोक सं° ( ११.११६. ख) से न्थ के अन्त तकदटै। इस मातृका के अन्त मे लिखित है-'संवत् १६६५ वषं
म]
माषाढमासे कृष्णपक्षे द्वितीयायां श्रीमथ् राक्षेत्रे इदं पस्तकं वेष्णवगिरिधर- दासपठनाथं वा परोपकाराथंम् । लि° मभू रादासात्मज किशोर वैश्य । कारं मध्ये कला सवत् १६९५ भाद्रपद सुदि १५ श्रीमथराक्षेत्रे गिरिधरदासरवंष्ण- वपठनाथंम् । लि° मथ् रादास(त्मज किसोर वंश्य । तथा प्रति ।'
ग. अनेक स्थलों पर् खण्डित, अपुणं, ११ पत्रात्मिका (०,११-१२, २९-२८,४१,४६-४६ ), देवनागरीलिपि में प्रप्त यह भी अन् पुस्तकालय कौ ४८६ संख्यक मातृका है । इस ग्रन्थ में इसका पाठ श्लोक सं ° (२.४३.क) के अद्धंभाग से श्लोक सं० (२.५६) के पूर्वाद्धं तक, ष्लो° (२.८६) से श्लो° (२.११८.ख) तक, श्लो० (५.२६.ख) से ष्लो०° (७.११.ख) तक, श्लोक (७.१७६.क) से श्लो ° (७.१६४.क) के अद्धंभाग तक तथा श्लो° (८.१०.क) से एलो ° (६.३७.ख) के अद्धंभाग तक स्थिते है ।
घ. ११२ श्लोकात्मिका, अपूणं, ४ पत्रात्मिका, देवनागरी लिपिमेप्राप्त यह कलकत्ता स्थित एशियारिक सोसायिटी आफ बंगाल की ५८६९१ संख्यक मातृका है। इसमे मात्र कृष्ण के त्रिभङ्खचरित्र काही पाठ मिलतादहै। इस ग्रन्थ में इसका पाठ श्लो° (११.११९१.ख) से ्लो° (११.१२६.ख) तक तथा श्लो° (११.१७३.क) से श्लो° (१२.४५.क.) तक ही उपस्थित है । मातृका समाप्ति के अनन्तर “सवत् १६५२ कू°स्० १ बुध को श्रीकृष्णयामलतन्त्र मे से लिखवायो श्री राधामोहन गोस्वामी राय साहब भौर ५० वालोंक गृह्य राधाचरणजी की कृपा से ५।५।६० व्यास गणेश राम' लिखित है।
ङ. अपुणं १४-१०३,१०३-१३१ पत्रात्मिका, बंगलिपिमे प्राप्त यह वाराणसीस्थ सरस्वती भवन पुस्तकालय की २६६७८ संखयक मातृका है। इस संस्करण मं इसका पाठ श्लो° (२.१७१.क) कै अद्धंमागये ग्रन्थ के अन्त तक मिलता है। मातृका के अन्त में ॐ नमो कालिकां ' लिखित है ।
च. अपूणं. १ पत्रात्मिका, देवनागरी लिपिमें प्राप्त यह भी सरस्वती भवन पुस्तकालय कौ २४५३४ संख्यक मातृका है । प्रस्तुत संस्करण मे इसका पाठ श्लो० (१.२७.ख) के अद्धमागसे श्लो० (१.५०.ख) तकं तथा श्लो° (२.२.क) से श्लो° (२.१३.ख) के अधंभाग तक ही मिलता दै ।
चु. अनेक स्थलों पर खण्डित, कुठ पत्र जधंभागसे फटे हुए, अपूणं, ७त-७६,८ ३-८४,८६-८६,६१-६५ पत्रात्मिका, बंगलिपि में प्राप्त यह् सरस्वती भवन कौ २४८७५ संख्यक मातृकादहै। इस संस्करणमें श्लो°
[
(२४.२१८.ख) से एलो° (२४.२७०.ख) के पूर्वाधं तक, एलो ° (२४.३४५.ख) से श्लो ° (२६.१०.क) तक, शलो° (२८.५७.ख) से ग्रन्थ की समाप्ति तक के पाठको इसकी सहायता से संशोधित किया गयादहै। कुषठपत्रोंकेफटे होने कारण उन्हँं छोड दिया गथा है। मातृका समाप्ति के अनन्तर यह् लिखा है--'इति श्रीकृष्णया मलमहातन्त्रसमाप्तश्चाय शकान्दा १६८५ शके काशी स्थले पुस्तकं लिखत ।'
ज. अपूणं, १ पत्रात्मिका, बंगलिपिमें प्राप्त यह् भी सरस्वती भवन की ५१३०१ संख्यक मातृका है । इस ग्रन्थ में श्लो ° (२८.५१.क) से श्लो° (२८.७६.ख) तक के पाठ संशोधन मे इसकी सहायता ली गयीदहै। इस मातृका के प्रारम्भ मे ॐ नमः । श्रीकृष्णाय नमः तथा इसकी समाप्ति के पश्चात् “इति कृष्णथामले महातन्त्रे राधाङृष्णराधाप्री तिवृन्दावन रहस्ये श्री राधाकृष्णविहारनाम षडविशतितमस्याध्यायस्य मध्ये एतत् । ॐ राधा- कृष्णाभ्यां नम: । ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ” लिखित है ।
उपयुक्त मातृकाओं के अतिरिक्त सरस्वती भवन पुस्तकालय सेही
प्राप्त २४५३५ संख्यक मातृका भीदहै। यह् बपूणं, २-१३ पत्रात्मिका, देवनागरी लिपिमेदहै। सम्पूणं प्रन्थके पाठसे भिन्न होने के कारण इसे धरिशिष्ट-१ के अन्तगंत 'नवममातृकाविशेषपाठाः शीषंकसे रखागयादहै।
इस सन्दभं मे आपके समक्ष एक सूचना भौर निवेदनीयदहै। म° भ० गोपीनाय कविराजके तान्त्रिक साहित्य (प° १५३) की सृचनाके अनुसार 'नोटिसेज भाफ संस्कृत मैनुस्क्रष्ट सेकण्ड सीरीज' नामक म० म° हर प्रसाद शास्त्री के विवरण में (१.७८) संख्यक मातृका १४६० श्लोकात्मक है । प्रयत्न करने पर भी इसे प्राप्त नहीं किया जा सका । इसमे वणित विषय इस प्रकार हैँ - व्यास का नारदजीसे प्रशन, शम्भ् का ब्रह्माजी से प्रश्न, कृष्णरहस्य के विषय में ब्रह्मा का विष्णु सेप्रष्न, आराध्य ईश्वर कौन? इसके निणंय में विष्ण् का महाविष्ण् से प्रष्न, वृन्दावन का आरोहणवणंन, विद्याधर आदि का प्रत्यागमन, विद्याधरी को कृष्ण का शाप, विद्याधर के साथ नारदजीका निगमन, कृष्णके किकर की उत्पत्ति, मदालसा का उपाख्यान आदि, ऋतध्वज का पितृपुर मे प्रवेश, कालयवन का भस्म होना आदि ।
२ |
ग्रन्थ-परिचयं
यह् ग्रन्थ २८ अध्यायो मे पूणं है । प्रस्तुत संस्करण प्रधानतः क. एवं ङ. मातृकाओं पर जाधारित है । शेष अन्य मातृकाओों (ख. ग. घ. च. छ. ज) के आधार पर पाठोंको संशोधित किया गयाहै। मातृकां मै उपलन्ध पाठके उचितन जान पड़ने पर लघ्. कोष्ठकों एवं दीर्घं कोष्ठकों में अपने सुञ्ञाव दिये गयेदहै। लघ् कोष्ठकोंमे पाठ का संशोधन तथा दीं कोष्ठकों में पाठ को अपनी तरफसे जोड़ा गया है । बीच में कहीं कहीं पाठों को अनावश्यक समञ्चकर भी इसे दीघं कोष्ठक मे रखा गया है ।
इस सस्करणमे तीन परिशिष्टो का समावेशदहै। प्रथम में नवम मातृका कापारठहै, जसा कि पहने बताया जाचूकादहै। द्वितीयमें इस ग्रन्थ की शलोकानुक्रमणिका है। यहाँ श्लोक संख्याका निदेश इस तरह समञ्लना चाहिए, जंसे-(१.१.क) का तात्पयं प्रथम मध्याय के प्रथम एलोक की प्रथम पङ्क्तिहै। इसमें प्रायः श्लोकदो पंक्तियोंके टै तथा कहीं कहीं तीन पङ्क्तियो के भी। इनके सङ्कुत क्रमशः क.+ख..ग. समस्लना चाहिए । तृतीय परिशिष्टमें प्रथम परिशिष्ट में आये श्लोकों की अनुक्रमणिका है ।
वहाँ इनका सङ्कुत पृष्ठ सख्या के आधारपरही रखा गया है ।
इस ग्रन्थ कं लेखक अज्ञात हैँ । ग्रन्थ के जारम्भमेंही चंतन्य महाप्रभू हारा प्र्वात्तिति भक्ति के सिद्धान्तो का परिचय भिलतादहै। ्रन्थ के अन्तिम अध्याय मे सचीसुत' एवं “चंतन्य' का नाम आतादहै। इससे प्रतीत होता है कि यह् ग्रन्थ चंतन्य सम्प्रदाय की साधना पदति को लक्ष्य करके ही लिखा गया । मातृकां के अन्त मे उनके लेखन के समय का सङ्कत मिलता है । क. मातृका संवत् १७२९ मे, ख. मातृका संवत् १६९५ में, घ. मातृका संवत् १६९५२ मे तथा छ. मातृका शकाब्द १६९८५ में लिखी गयी है । इनके आधार पर यह् कहा जा सक्ता है कि इस ग्रन्थ की रचना इन काल-खण्डों के पुवं सम्पन्न हो चूकौथी। महाप्रभ् चंतन्य का जन्म काल १४८५ ई० बताया जाता है । इससे सिद्ध किया जा सकता है कि इसकी संरचना सोलहवीं गती से सत्रहवीं शती के प्रारम्भिक वर्षो में की गयी होगी ।
इस ग्रन्थ के अनुशीलन से यह प्रतीत होतादहै कि प्रन्थमें पूवं मौर उत्तर भाग कं कोई लक्षण नहीं मिलते, अर्थात् इस ग्रन्थ का लेखक एक ही व्यक्ति हो सकता है। यह् ग्रन्थ परवती काल का अवश्य लगता है, किन्तु
| २११
इसकी भाषा-शैली पर प्राचीन ग्रन्थों का ही प्रभावदहै। काव्यकौदृष्टिसे भी यह प्रशंसनीय है । इस ग्रन्थ को अर्वाचीन पुराणों कौश्रेणीमे भी रवा जा सकता है, यथा ~ ब्रह्मवैवतं, गरुड इत्यादि । प्रारम्भं कं तीन अध्यायो तक वेदों, उपनिषदों एवं पुराणों ( विशेषकर श्रीमद्ागवत एवं देवी भागवत ) का प्रभाव है। चौथे से छठे अध्याय तक शाक्त-शं वादि तन्त्रो का प्रभाव परिलक्षित होता है। सातवे से सोलहवं अध्यायो तक इनका मिध्ित प्रभाव दुष्टिगोचर होता है । सत्रहवं अध्यायसे चौबीसवें अध्याय तक स्पष्टतया पौराणिक शली मे कथा कं माध्यमसे राधा-कृष्ण कौ उपासना- पद्धति पर शाक्त सम्प्रदायकी त्रिधुरसुन्दरीकी साधनाका प्रभाव लक्षित होता है । अन्त में पचीसंवे अध्याय से जठादसवें अध्याय तक चंतन्य सम्प्रदाय की साधना प्रणाली को प्रच्छच्नरूप मे कहते हुए राधा-कृष्ण के श्बृङ्खारमय युगल-स्वरूप के वणंन से यह ग्रन्थ समाप्त होता है ।
पूवेपीटिका
फेखा प्रतीत होता कि जिन प्राचीन संहिताओंकं नाम रसिकः सम्प्रदायो मे दिखायी पडते है, उनका प्रभाव किसी-न-किसी अंश मे चंतन्य सम्प्रदाय पर पड़ादहै। साथ ही कतिपय शाक्तादि तन्त्रोंका भी प्रभाव दन पर दृष्टिगोचर होता है । जिस प्रकार गौतमीयतन्तर, सनत्कृमारस हिता, आलबन्दारसं हिता, सुन्दरीतन्त्र इत्यादि आगम ग्रन्थोंने लीला विषयक साहिव्यों को प्रभावित किया है, उसी प्रकार श्रीकृ्णयामलमहातन् ने भी राधाकृष्ण की लीला को अवश्य ही प्रभावित कियादहै। इस प्रन्थमें त्रिपुरसुन्दरी की उपासना कं साथ श्वीकृष्ण-लीला का घनिष्ठतम सम्बन्ध दर्शाया गया है । चैतन्य सम्प्रदयमें गुप्त ह्पसे श्रीयन्त्र कौ उपासना प्रचलित है ।
धगवत्साधना के अनेकं भेद दिखायी पडते हँ । इसका कारण जहाँ तक समन्ञमे आतादहै, इस साधना भक्तिकं साथ साथ विविध प्रकार कौ योगाधित साधनाभोंकाभी प्रवेणहै। भक्ति-साहित्य मे रस-साधनाकी एक स्पष्ट धाराका निदशंन दृष्टिगोचर होतादहै। इस रस-साध्नाका सम्बन्ध रसब्रहमा कीलीला से है, जिसकी स्पष्ट क्षांकी हमे त त्तिरीय उ पनिषद् में मिलती है । यहां ब्रह्य को रसस्वरूप कहा गया है ओर समस्त सृष्टि की प्रवृत्ति उसके इसी स्वभाव से बतायी गयी हे । ब्रह्मसूत्रकार
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बादरायण ने 'लोकवततु लीलाकंवल्यम्' का उल्लेख क्रिया है । विष्णुपुराण मे भी कहा गया है-'क्रीडतो बालकस्येव क्रीडा तस्य निशामय ।' यहाँ लीला अथवाखेल का सङ्केत आनन्द अथवा रससे हीदहै। भक्तिसाधनामेदो धाराओं का निदशंन प्राप्त होता है-प्रथम भावरूप ओौर द्वितीय रसरूप ।
भक्ति का भावरूप में अनुसन्धान न कर सकने प्र ही चित्तम रसलरूपका साक्षात्कार किया जा सक्ता है ।
भक्ति-साधना के इतिहासमे इसी कारण वैराग्यमागं तथा रागमागं को कल्पना की गयी । मुक्ति के उद्देश्य से वैराग्य-मागं का तथा भगवद्धाम मं प्रविष्ट होकर लीला-साक्षात्कार के प्रयोजन से राग-मागं का प्रचलन हमा । राग-मागं की धारा मात्र वैष्णवोंमे ही नहीं, अपितु शेवों ओर शक्तोमे भी प्रचलितथी। इसमागंमे भी वैराग्य, ज्ञान इत्यादि का उदय भगवद्विषयक रागसे यथा समय होता रहाहै। यह् धारा स्पष्टरूप से कृष्ण की उपासना में विशेष रूप से प्रवाहित हई, जो हमें श्रीकृष्णयामल- तन्मे भी दिखायी पडती है। इस ग्रन्थ की रचना का प्रयोजन भी यही लगता है। भक्ति-सम्ध्रदाय -भारतवषं मे भक्ति-साधना के निभिन्न सम्प्रदाय प्रचलित रहे है भौर ये प्रायः वेष्णवोंकेही रहैहै। श्रीर मानुज श्री-सम्प्रदाय के, श्रीनिम्बाकं सनकादि या हंस-सम्प्रदाय के, श्रीमध्व ब्रहमा-सभ्प्रदाय के तथा श्री विष्ण स्वमी नौ र तदनन्तर श्रीवल्लभ सुद्र-सम्प्रदाय के प्रवतंक रहे है । ये सभी वैष्णव थे। इनके दाशंनिक मत भी भिन्नथे, यथा-श्री-सम्प्रदाय नें विशिष्टाद्रत, हंस- सम्प्रदायमेद्रताद्रत, ब्रह्म-सम्प्रदाय मद्वत तथा शटद्र-सम्प्रदाय में शुद्धाद्रत मान्यहे। बंगदेश मे चेतन्य महाप्रभ् का गौडीय सम्प्रदाय तथा उड़ीसामें उत्कलीय वंष्णव सम्प्रदाय भी रहा है। इसके अतिरिक्त उनकी छोटी बड़ी अनेक शाखाएः भी हैँ, जिनमें राधावल्लभी, हरिदासी, प्रणामी, श्रीनारायणी इत्यादि विशेषरूप से उल्लेखनीय हैँ । श्री-सम्प्रदाय से पूवं द्रविड देश में भआलवारगण भक्तिमागं की रागमागं शाखा के साधक ये।
१. इस ्रन्थ की प्रस्तावना ओर उपोद्धात मे दिये गये अधिकांशतः विवरण म०म० गोपीनाथ कविराज एवं प्रो० ब्रजवल्लभ द्विवेदी के निबन्धो पर आधारित हैं ।
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शंव-भक्तों मे भी इसी प्रकार के भेद मिलतेरैँ। इन सम्प्रदायोंकी साधना-पद्तियों मे ज्ञान का प्राधान्य होने पर भी भक्तिको पणं सम्मान प्राप्त था । सिद्धान्त-शैवमे दासमागं, सहमागं इत्यादि नामोसे मागं- चतुष्टय का विवरण मिलता है। उत्पलाचायं की शिवस्तोत्रावली तथा अभिनव गुप्त के महोपविशति इत्यादि स्तोत्रां से स्पष्टहोतादै कि अद्र त- शवोंमेज्ञान के साथ साथ पूणं भक्तिका समावेशथा। ये शुष्कज्ञानी नहीं थे । त्रिपुरा सम्प्रदाय के प्रसिद्धग्रन्थ (हरितायन संहिता' नामक त्रिपुरा रहस्यः के ज्ञानखण्ड (२०.३३,३४) कं अनुसार अद्रतमें प्रविष्ट होकर प्रतिष्ठित होने पर भी भक्ति का अस्तित्व सुरक्षित रहता है।
इससे स्पष्ट होता दहै किं साधना पद्धतियोमे विभिन्नताका अवसर होते हए भी उनमें भक्तिका भी पूणं समावेश था। प्रकृत ग्रन्थ कृष्णयामल- महातन्त्र' को दष्टिगत करते हुए अबहम कुछ बातें चँतन्य-सम्प्रदाय के सन्दभं मे कटेगे ।
चैतन्य महाप्रभ् का जन्म सन् १४८५ ई०्में हुआ था। इनकी गुर परम्परा मे उनके संन्यासी गुरु केणव भारतीका नाम आतादहै, जो माध्व- सम्प्रदाय के संन्यासी भे । इनके दीक्षा गरु ईश्वरपुरीथे। केशव भारती व ईश्वरपुरी दोनों ही श्रीमन्माधवेन्दरपुरी के शिष्य थे । यद्यपि कतिपय विद्वान् चैतन्य द्वारा प्रबततित गौडीय सम्प्रदाय का अन्तर्भाव माध्व-सम्पदायमें मानते दै, तथापि इनके दाशंनिक सिद्धान्तो भौर साधना प्रणाली में पर्यप्ति भेद है ।
एेसा प्रतीब्र होतादै किं गौड़ीष सम्प्रदाय कें उपासकों ने अपने सिद्धान्तो के पोषण मे पाञ्चरात्रागम, शाक्ततन्त्र ओर महायानादि बौद्ध साधना प्रणालियों बरे बहुत कृष ज्रहण किया है। परन्तु इन लोगों ने अपने मत को वैदिक मतकंरूपमें प्रचारित करिया गौर उपनिषद् तथा पुराणों क प्रमाण भपने सिद्धान्तो की पृष्टिमेंदिये। सम्भवतः इन पर उसधारा काभीप्रभावथा, जो निगम भौर आगमको एक मानते चले आ रहे थे। प्राचीनकाल मे भागवतमत तथा पाञ्चरात्रमत भिन्नथे। महाभारत को नारायणीय खण्ड मे पाञ्चरात्रमत का उत्लेख है । वहाँ यह मत साच्वतगणों के धमं कं रूपमे दर्शाया गया है। शह्षंचरित' मे पाञ्चवरात्र ओर भागवत सम्प्रदाय का पृथक्-पृथक् उल्लेख मिलता दै । भागवत-सम्प्रदाथ विशेषतः
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श्रीमद् भागवत पर आधारित था। जीव गोस्वामी ने इसकी टीका में तथा षट्सन्दभं टीका मे पाञ्चराव्रसम्प्रदाय कं साथ भागवतमत का समन्वय कियादहै। इन दोनों सम्प्रदायो का एकीकरण इनके भक्तिधमं कं कारणही हु होगा, क्योकि इन दोनों ही धर्मो मे भक्ति की प्रधानता थी ।
पाञ्चरात्र आगम कं मृल ग्रन्थ संहिता नामसे प्रसिद्धै । इनकी संख्या लगभग २५० कं आसपास बतायी जाती दहै, यद्यपि इनका प्रकाशन अत्यल्प मात्रामेंहीदहो पायादहै। इनमें द्रंतवाद भौर अद्रं तवाद का सन्निवेश है। इनका अद्वतवाद भी कश्मीर कं अद्रंतवाद कीतरह् शङ्कुराचायं द्वारा प्रवतित अद्रतवादसे भिन्न एवं विलक्षण है। इनके अनुसार जब पराशक्ति परमेश्वर मे विलीन रहती है, तब प्रलथ-अवस्था होतीदहै ओर उस समय शक्ति निष्क्रिय रहती है । यह् अद्रय अवस्थादहै। इस सम्प्रदाय का अद्र तवादः शक्ति जौर शक्तिमान् का समन्वयम्लक टै । स्पन्द, प्रत्यभिज्ञा, क्रम तथा कौलादिदशंनों मे भी "अदैत' शब्द का तात्पयं “शिव-शक्ति कासामरस्य' समन्ला जातादै। बौद्धो कं महायान सम्प्रदाथमे भी प्रज्ञापारमिता की सत्ता मानकर बोधिसत्व की स्थापना का यही प्रयोजन दहै । दैष्णव-आचार्योने शक्ति की निष्क्रिय अथवा अव्यक्त-अवस्था मे भी सत्ता मानीदहै।
वैष्णव सम्प्रदायो मे शक्तिमान् ओर शक्ति करमशः विष्णू तथा लक्ष्मी केरूप में उपास्यर्हँ। निम्बाकं सम्प्रदाय में राधा-कृष्णकी उपासना दै। श्री चैतन्यने भी राधा-कृष्णकाही कीतंन द्वारा प्रचार किया । यद्यपि पाञ्चरात्रागमों में विष्ण् तथा लक्ष्मी कीही उपासना की प्रधानता है, तथापि नारदपाञ्चरात्रादि ग्रन्थों में रधा-कृष्ण की उपासना तथा बृन्दावन काभौी वणन मिलतादहै। श्री चैतन्य का ब्रह्मसंहिता नामक ग्रन्थ को दक्षिण भारतसेलाने का विवरण मिलतादै। इस म्रन्थमे भी बृन्दावन का वणन है। सनत्कुमारसंहिता राधाकृष्ण तत्तवं का प्रतिपादक ग्रन्थहै। इन सन्दर्भो के निष्कषं केरूपमे हम महान् विचारक म० मऽ गोपीनाथ कविराजजी के एक वचन को भी यहां उद्धृत करना चा्हँगे । वहु कहते टै- श्त समद्यता ठै कि प्राचीन कालम भागवत सम्प्रदायने राधा-कृष्ण तया वृन्दावन की महिमाका विशेष प्रचार कियाथा। जवर उक्तं सम्प्रदाय पाञ्चरात्र सम्प्रदायमें मिल गया, तभीसे इस साद्कुयं का आविभवि
१. भारतीय संस्कृति भौर साधना, भाग २ ( प° १८६)
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हा होगा । तत्त्व अथवा रसास्वादन की दिशा छोड देने पर भी यह प्रतीत , होता है कि देवकीनन्दन कृष्ण “वासुदेव' तथा यशोदानन्दन कृष्ण गोपालः की आख्याधिकाओं मे साम्प्रदायिक अथवा एतिहासिक कूठ रहस्य निहित हैँ ।'
उत्कल वैष्णव-साहित्यों मे चैतन्य-शाखा कं पञ्चसखाों का विवरण मिलता है, किन्तु उनकी साधना-पद्धति बंगीय वैष्णवोपासना से विलक्षण प्रतीत होती है । उत्कलीय वैष्णव-साधनाकं मृल में उत्कल मे प्रचलित उत्तरकालीन बौद्रधमं, नाथ-पन्थ, शंव-शाक्त आगम, पौराणिक कृष्ण तथा विभिन्नमार्गीय रस-साधना का प्रभावं दुष्टिगोचर होतादहै, साथ ही श्री चैतन्य के जीवन-दशंन का तथा मध्ययुगीन सन्त-साधना का भौ । इसके अतिरिक्त चैतन्य-सम्प्रदाय की साधना-प्रणाली को प्रभावित करने में शंव- शाक्ते आगमो काभी हाथ रहाहै।
भगवदगीता मुख्यतः भक्ति, प्रपत्ति एवं शरणागति का प्रतिपादक ग्रन्थ है । इसमे कमं गौर ज्ञान का भक्ति मे समन्वय किया गया है । इसक चतुथं अध्याय में वणित योग की परम्परा महाभारत के शान्तिपवं के नारायणी- योपाख्यान मे वणित पाञ्वराव्रकंसमानहीदहै। शतपथब्राह्मण मे एक पाञ्चरात्रसव्र का उल्लेख मिलता है। छान्दोग्य-उपनिषद् क घोर भद्क्िरस कं शिष्य देवकीपुत्र कृष्ण के उपदेश वेसनगर् कं गरुडध्वजः शिलालेख मे देखने को मिलते हैँ। इस प्रकार यह स्पष्ट होतादहै कि शिव-भक्ति परम्परा मे पाशुपतादि शेवो की भांति विष्ण्-भक्ति की परम्परा मे पाञ्चरात्र मत प्राचीन कालसे ही प्रतिष्ठित रहा है। तमिल-जालवारों की भक्तिभाव पूणं रचनाभों का प्रेरणा स्रोत पाञ्चरात्र जागम ओर गूप्तकाल का पौराणिक वाङ्मयदहीथा। कालान्तर मे पाञ्चरात्र की परवर्ती साहित्यों का विभाजन राम जौर कृष्ण कं उपासको मे हो गया । तमिल- आलवारों ओर पाञ्चरात्र-आगमकी कृष्णधाराका विकास मथूरा एवं वृन्दावन मे हृ । वहाँ से यह् बंगाल मे पहुंची । कष्णधारा पर भागवत- पुराण के प्रभाव से वल्लभाचायं, चेतन्यमहाप्रभ् ओौर उनके अनुयायी भी अनुप्राणित थे । निम्बाकं ओर मध्वाचायं भी इस प्रभाव से अछते नहीं रहे ।
भक्ति-दशन
अब हम भक्ति कं दाणंनिक सिद्धान्तो को अत्यन्त ही संक्षेप मे प्रस्तुत कर रहे है । भक्ति चित्त का भावमय प्रकाशविशेषदहै। इस शन्दका वाच्यां
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वं दिक कमं-काण्ड, ज्ञान-काण्ड या उपासना-काण्ड मं स्पष्ट नहीं होता । यद्यपि वंदिक ग्रन्थों मे ^एकायन-मागं' का निदेश मिलता है, किन्तु इसके विपुल प्रचार के प्रमाण वहाँ नहीं मिलते । भक्ति-सूत्ों कं रचयिता शाण्डिल्य भौर नारद हैँ । इन दोनों का पाञ्चरात्रमत से सम्बन्ध है। प्रसिद्धि है कि शाण्डिल्य छऋषिने चारोवेदों मे परमश्रेयस तत्वकोन पाने पर ही पाञ्चराच्र का जाश्रय ग्रहण किया था मौर तृप्त हए । शाण्डिल्य-संहिता का उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में भिलतादहै। नारद भी पाञ्चरात्र मतावलम्बी थे। महाभारत के नारायणीयोपाद्यान तथा नारद-पाञ्चरात्रादि श्रन्थों से इसकी पुष्टि होती है। छान्दोग्योपनिषद् के नारद-सनत्कृमार संवादसे भीनारदके मन्त्र-विद्या विरोधी होने का समथंन भिलता है ।
भक्ति-शास्त्र भक्तिके ही माहात्म्य का प्रष्यापकदहै। शास्त्रम कहीं भक्तिको मुक्तिका साक्षात् कारण कहागयाहै ओर कहीं पर भक्तिको भक्तिकाही कारण अर्थात् अपरा भक्तिको परा भक्ति का साधक माना गया है । भक्तिमागं मे शक्ति का अस्तित्व स्वीकार करना अपरिहायं है। शक्ति कं विशुद्ध तथा निमंल स्वरूप को अस्वीकृत कर देने चे ईष्वर, जीव, जगत् तथा उनके परस्पर सम्बन्ध इत्यादि, सभीं अज्ञान (माया) कल्पित होनेसेहियहो जाते दँ तथा भक्ति, करुणा ओौर कमं इत्यादिकं स्रोत सख जते हैं ।
भक्ति ह्लादिनी शक्ति की एक विशेष वृत्ति है । ह्वादिनी शक्ति महाभाव. स्वरूपा है, अत एव शुद्धभक्ति को महाभाव का ही अंश कहा गया है। भाव काविकासहीप्रेमहै। साधना का क्रम विकास भगवद्धाम की प्राप्ति है। ये धाम एक होने पर भी भाव-वंचिव्य के अनुसार अनन्तदहैँ। इसधाममे भगवद्लीला कौ उपकरणभूत अनन्तवस्तुए*, भोग्य, भक्त अर भगवान् के लीला-विग्रह, सभी सत्त्व से रचित होते हैँ । इसी को आगमो परे (बैन्दव- जगत् कहा गया है । अशुद्ध मायासे सर्वाश मे विलक्षण होने से यह् महामाया का साम्राज्य' इस नामसे भी विष्यात है ।
१. प्राचीन उपनिषद युग मे "दहर-विधा' प्रकरण मे वणित अन्तरा- काशवर्तीं ब्रह्मपुर ही भगवद्धामदहै। उस आकाश को हदयाकाश भी कहा जाता है वस्तुतः वह चिदाकाश ही है ओौर लील) स्थान भी । पुराणसंहिता (३२.१२) में का गया है-“चिदाकाश्चो मह्ानास्ते रीराधिष्टानमदूञुतम् ।'
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„ भव स्थायी ओौर् सञ्चारीभेदसेदो प्रकार कं होते हैँ । सञ्चारी-भाव आविभ्रूत होकर तिरोहितभीदहो जति, किन्तु स्थायी-भाव तिरोहित नहीं होते । सञ्चचा री-भाव से रसास्वादन नहीं हो सकता, किन्तु स्थायी- भावसे रसास्वादनदहो सक्ता) सञ्चारी-भाव से स्थायी-भाव तक पहु चना ही स्थायी-भाव है । यह् स्थायी-भाव ही भावदेह का नामान्तर है तथा इसका सम्बन्ध हृदय प्रदेश से होता है । वंष्णवों मे यह् अन्तरङ्ग हृदय अष्टदल कमल से विवेच्यटहै। इसीलिए स्थायी-भावमभी मल स्थायी-भावं मे विवततित होकर प्रकाशित होता है। इस अष्टदल तक एक-एक दल एक एक भावका स्वरूपहै ओौर भावम प्रविष्ट होकर साधना दवारा उसे महाभाव मे परिणत करना ही भाव-साधना का रहस्य है।
यहां पर एक बात हम पूरी तरह स्पष्ट कर देना चाहते है कि वँष्णवों मे हृदय-प्रदेण के अष्टदल की कल्पना पूरी तरह से षट्चक्रों कं हृदय-प्रदेश की कल्पनासे पृथक् है। षट्चक्रं मे हृदय-कमल द्वादशदल युक्त है । इस प्रक्रिया मे आज्ञाचक्र कं भेद के पश्चात् अन्तलंक्षय की प्राप्ति बतायी गयी है किन्तु वष्णवों मे अन्तलंक्ष्य की प्राप्ति के विना अष्टदल मे प्रवेश सम्भव नहीं होता । ' वंष्णवों कं इस अष्टदल को एक प्रकार से सहस्रदल से अभिन्न भथव। उसके अन्तगंत माना जा सकता है। इनका अष्टदल भाव- राज्य है भौर षट्चक्रं मे वणित द्वादशदल भाव-राज्य का आभास मात्रहै। दादणदल को व्याख्या कं अनुसार भक्ति कं पश्चात् ज्ञान की अवस्था आती है, किन्तु अष्टदल की व्याख्यामें ज्ञान के पश्चात् भक्तिकी अवस्था है। मै समन्ता हुं कि भक्ति केदो सोपानों अपरा-भक्ति एवं परा-भक्तिकी कल्पना का यही रहस्य है।
भक्ति के दाशंनिक विकासके क्रममे प्रसङ्खतः हम यहौ महाभारत की दो घटनाओं का उल्लेख करना चाहे । प्रथम, देवत्रत ( भीष्म ) की कथा ओौर द्वितीय, श्रीकृष्ण-जन्म की कथा । प्रथम मे णाः तनु गौर गङ्खाकाएक निश्चित शतं के अनुसार विवाह का होना, अपने ही गभं से उत्पन्न सात पत्रों कोस्वय ही नदीम फकना, आठवें सन्तान के जन्म के पश्चात शतं का भङ्ग होना, गङ्गाका वापस चली जाना तथा बारह वर्षो तक पृत्र की सेवा कर किशोरावस्था प्रारम्भ होते ही अपने से पृथक् कर देना इत्यादि है । दूसरी घटना मे वसुदेव गौर देवकी का विवाह होते हीकसद्राराकारागारमें डाल देना, देवकी के सात बच्चों की हृत्या स्वयं कस के हाथों होना, आठवी
सन्तान के रूपमे कृष्ण का अवतरित होना, तत्क्षण योगमायाका नन्द के यहाँ आविभवि होना, वसुदेव का यमुना नदी को पार करके नन्द के यहाँ पहुश्चवना तथा वहाँ से लायी कन्या को कस के हाथों सौपना इत्यादि है ।
यहाँ हमारा लक्ष्य इन घटनाभों को काल्पनिक कहना नहीं है । व्यक्ति के सत्कर्मोसे प्रभावित होकर उनमे देव की कल्पना करके एतिहासिक पृष्ठभूमि में भी आध्यात्मिक रहस्यो को निहित करना हमारे यहाँ के तत्त्व वेत्ताओों की परम्परा रहीदहै, जिसकी सलक हमे विशेषकर पुराणोमं मिलती हैँ । अस्तु, ये दोनों घटनाए पृणंरूप से भक्ति-साधना मे वणित अष्टदल कमल की व्याख्या से सम्बन्धित हैँ । शास्त्रों मे 'वसु' शब्द का तात्पयं अहङ्कार' से है ओरये शापित होकर जन्म ्रहण करते हैँ । इसके सात खण्डोंका विकासही भवां खण्ड होकर देवव्रत बनता दहै जो आजीवन बरह्म चयं -व्रत का पालन करतादहै। इसी प्रकार आठ भावोंकी समष्टिके रू्पमेंकृष्णके साथही योगमाया का प्रादुर्भाव होता है, जिसकी सहायता से उनका शेष कृत्य सम्पादित होता है ।
इस प्रकार स्पष्ट है कि अन्तजं गत् मे प्रवेश के पश्चात् तथा जाभास के त्याग के साथ-साथही अष्टदल की प्राप्ति होतीदहै। इस अष्टदल की कणिकाके रूपमे जो बिन्दुहै, व्ही अष्टदलका सारदहै गौर इसका नामान्तर है-महाभाव । वस्तुतः अष्टदल, महाभाव का ही अष्टधा विमक्त स्वरूप मात्र है अथवा ये अष्ट-भाव, महाभावके स्वगत अङ्खगमात्रहै ओर इनकी समष्टिही माभाव का स्वरूपदहै।
शास्त्रों मे भावसे महाभावमें जाने केदो प्रधान मागं बतलाए गये टै प्रथम आवर्तन क्रमसे तथा दूसरासरल रूप से । आवतं-मागं का अवलम्बन कर भाव से भावान्तर मं चलते-चलते क्रमशः महाभाव मे पहु चा जाता दहै। इससे भिन्न सरलमागं से भी महाभावमें पहुचाजा सकता। लेकिन इस मागंसे महाभावका पृणणंस्वरूप अधिगत नहीं होता, क्योकि इस मागं से बिन्दु के साथ केवल उस विशिष्टदलका ही सम्बन्ध होता है, अन्य दलों का नहीं। हमारी समज्न के अनुसार महाभारतकी दोनों घटनाएः भावसे महाभावमे जनेके दोनों मार्गो के सङ्कृत हैँ । यह अष्टदल कमल बाह्य ओर आन्तरभेदसेदोप्रकारसे समजले जा सकते हँ । आभ्यन्तरीण कमल “विन्दु
१. भारतीय संस्कृति भौर साधना, भाग २, (पृ° ७२-७३)
स्वरूप टै ओौर बाह्यदलं कमल इस बिन्दु की आठ दिशाओं के जरु दलों की समष्टिटै। यह बाह्यदलही भावराज्यसे अभिप्रेतहै। ये अष्टभावही वैष्णवों के अष्टकालीन लीला के कालातीत आठ विभागे । इनकी साधना पूणं होने पर माधुयं मय मध्यविन्दु मे प्रवेश प्राप्त होता है। अष्टभावही मध्य बिन्दु के अवयव होने से (कला'पद वाच्य हँ जौर अष्टसखीः नाम से र्वाणित है । इनके विकास की चरम परिणति ही श्रीराधा-तत्व है। इस अवस्था मे पूणंतम रस की उपलब्धि मं पुणंतम मिलन भौर सामरस्यहोताहे। खौखा-धाम
शास्त्रों मे लीला के तीन भेद कल्पित किये गये हैँ । अद्रं त-वेदान्त मत मं पारमाथिक, व्यावहारिक तथा प्रातिभासिक भेदसे सत्यके तीन रूप कहे गये हँ । बौद्ध विज्ञानवाद में स्वभाव के परिनिष्पन्न, परतन्त्र तथा परिकल्पित भद से तीन भेद माने गये हैँ । आलबन्दार संहिता में वास्तविकः, व्यावहारिक तथा प्रातिभासिक भेद से लीला तीन प्रकार की बताई गई है । यहाँ वास्तविक लीला अक्षरब्रह्म के हृदय मं सम्पन्न होती है । अक्षरब्रह्म का यह स्थान अनन्त कोटि ब्रह्याण्डों से परेटै। वह॒ असीम ओर अनन्त दहै तथा ब्रह्याण्डातीत महाशून्य से भी अतीत है । वहाँ पञ्चमहाभरुत स्वयंप्रकाश एवं चिदानन्दमय हैँ । उस चिन्मय भाकाश मे आनन्दमय सुधा-सिन्धु में मणिद्रीप ( चिन्तामणि द्वीप ) विराजमान है । उसमे नवरसमयी लीला के लिए नव- खण्ड-भूमि टै । उसके मध्यमं श्यृद्खारशाला है । “पुराणसहिता' मेभी इसी तरह का विवरण उपलन्धरहै। वहां प्रातिभासिक लीला का सम्बन्ध नित्य बृन्दावन से तथा व्याहारिक लील। का सम्बन्ध ब्रजभूमिसे बताया गयादहै। आलबन्दार संहिता में नित्य-वृन्दावन का वणन प्रातिभासिकसरूप सेदहै। श्चं तन्थचन्द्रोदय' के त्रतीय अंकमे नित्य-वृन्दावन का स्थान विरजाके उस पार चिन्मय भूमिरूप परव्योमसे अभिन्न दहै । षट्सन्दभं' मे विरजा नदी का स्थान त्रिगुणात्मिका प्रकृति के बाद बताया गया है । उसके अनन्तर परव्योम अथवा त्रिपादविभूति में “नित्य-वृन्दावन' की स्थिति बतलायी गयी है । स्वयम्भू आगम' के ८५ वं पटल मे ^नित्य-वृन्दावन' का स्थानं कालिन्दी के उसपार बताया गयादै तथा वृन्दावन अथवा गोकूलकोही 'गोलोक' कटा गया दै । “लघृब्रह्म सं हिता मे सहस्रदल को गोकुल कहा गया हे । वहाँ इसके बाहर का चतुष्कोण शवेतद्रीप ओर श्वेतद्वीप का अन्तमंण्डल दही बृन्दावन बताया गया है । पद्मपुराण के उत्तरखण्ड मे श्रीकृष्ण को नारायण
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का नवम मवतार माना गयाहै तथा परमव्योम के. उऊध्वंभाग मं उनकां धाम बतलाया गया है, किन्तु स्वयम्भु आगमः के अनुसार उनका धाम भावरणात्मक न होकर स्वतन्त्र है गौर नारायण के ऊध्वं में स्थित है।
श्रीमद्भागवतमे राधाकृष्ण की लीला का स्वरूप परवर्ती साहित्यों मे वणित लीला-स्वरूप जंसा नहीं है । राधाकृष्ण की लीला परवर्ती कल्पना केरूपमे ब्रह्मवंवतंपुराण गौर गगंसंहिता मे प्राप्त है। गगंसंहितानुसार कृष्ण सवदा गोलोक मे निवास करते हैँ । वैदिक वाङ्मय मे पृथ्वी को कृष्णा" मौर सूयं मण्डल को @ृष्ण' कहा गया है । निरुक्त भी कृष्ण को पृथ्वी, सूयं भोर चन्द्रमा मानतेर्है। शतपथ ब्राह्मणमें कृष्ण को भ्यज्ञ' माना गया है भौर सौरमण्डल के साथ उनका सम्बन्ध बताया यया है । भगवद्गीता मं “आदित्यानामहं विष्णुः से तीनों की एकता सिद्ध होती है । “गो'शब्द का किरण प्रक अथं करने पर कष्ण ही सूयंरूप “गोविन्द' हैँ । प्रसिद्धिहै कि खादिरवनः में गोवधंन महापर्वत पर लीला हई थी गौर यहीं पर श्रीकृष्ण नित्य-वृन्दावन के पति हुए थे एवं गोविन्दत्व को प्राप्त हुए ।
यहां एक तथ्य गौर विचारणीयदहै कि जिस प्रकार पौराणिक कृष्ण देवकी के जाठवे पुत्र कहे जाते है, ठीक वैसे ही सूयं मण्डल के स्वरूप से विष्णु भी अदिति के आयवे पुत्र कहे गये हैँ । पौराणिक कृष्ण की तरह इन्दं भी माल्रू-पितरवियोग सहना पड़ा था । आदित्य को देवता स्वीकार करने पर ही ष्ण का धाम गोलोक स्वीकार कियाजा सक्तादहै, जो सूयंलोक के भी उसपारमें स्थित है)
महाभारत के शान्तिपवं मे गोलोक को ब्रह्मलोक के समान माना गया है । हरिवंशपुराण मे "गवां लोकस्य गोलोकः' कहते हए श्रीकृष्ण का स्मरण किया गया है । ब्रह्मवेवतंपुराण में कोटिसूयं से प्रकाशमान, मण्डलाकार तेजःपुज्ज के अन्तराल मे भगवान् श्रीकृष्ण के नित्य-धाम को गोलोक कहा गया हे। पद्मपुराण के ब्रह्मखण्ड के प्रकृति-खण्डमे इसे वेकुण्ठ के पञ्चा- शत्कोटियोजन ऊपर बताया गया है। वहीं इसे वृन्दावन से आच्छन्न तथा विरजा नदी से सुशोभित कहा गया है । ब्ृहत्सं हिता मे गोलोक को भगवान् श्रीकृष्ण का नित्य-धाम बताते हुए इसे देवी मौर महेश के धामो से उत्तम कहा गया ह । अनन्तसंहिता मे इसकी स्थिति महावैकुष्ठ के ऊपर है। गोलोक कौ महिमा का वणंन पद्मपुराण ( पाताल-खण्ड), गरग॑संहिता (८ गोलोक-खण्ड ), बृहृत्सं हिता, नारदपाञ्चराव्र तथा ब्रह्मवैवतं इत्यादि
[ रप#। पुराणोम द्रष्टव्य है। नित्यलोकके रूपमे इसका वणन नारदीयपुराण तथा देवीभागवत के नवम स्कन्धमे दहे)
वैकुण्ठ-धाम चतुर्भुज नारायण का लीला निकेतन है, किन्तु गोलोक धाम द्विभुज श्रीकृष्ण की नित्य विहार भूमिरहैँ। इसका जपर नाम श्वेत- द्वीप है । साधना केक्षेत्रमें साक्षात् रूपसे इस धाममें प्रवेश प्राप्त होता है, किन्तु क्रम-मागं का आश्रय करने पर वंकुण्ठ भेदके पश्चात् ही इसको प्राप्ति होती है। यह स्वरूप-विग्रह्, लीलाप्रभरृति माधुयं गत उत्कषं की दष्टिसे श्रीकृष्ण ही स्वयरूप' है एवं वंकुण्ठ-घाम के लीला-नायकं
नारायण उनके विलास होने से उनके एकात्मकूप हं ।
| गोकुल-धाम भगवान् कृष्ण कौ बाल क्रीडा-स्थली है । इसका नामान्तर
ब्रजभूमि है । श्रीमद्भागवत में इसको सर्वाधिक महत्त्व प्राप्त है। पद्मपुराण ( पाताल-खण्ड ) मेभी इस धाम का विशद विवेचन उपलब्धहै। श्रीरूप गोस्वामी ने अपने लघ्-भागवत मे इसकी महिमा का वणंनर्वेकण्ठ धाम की अवेक्षा जधिक तत्परता से कियादहै। यह धाम भगवान् कृष्ण के नन्दनन्दन स्वरूप का धाम दहै।
गोकुल ही भांति वृन्दावन की लीला भी रसिकहूदय-भक्तो को सवंदा आकृष्ट करती रही दहै। ब्रह्मपुराणमें श्रीमर्वृन्दावन को रभ्य, पूर्णानन्द- रस का आश्रय भौर भभृतरसपूरित कहा गया है। गोपालतापिनी उपनिषद् मे भगवान् कृष्ण के क्रीडाधाम वृन्दावन को गोपालपुरी कहा गथाहै। कृष्णोपनिषद् ` मे यह् कृष्ण की नित्य क्रीडास्थली प्रोक्त है । गगंसंहितामें भी मथूरा, वृन्दावन, यमुना इत्यादि का महत्त्व वणित है । जयदेव के भ्गीत-गोविन्द' की रचनाका यही माधाररहादहै। ब्रह्मवेवतंपुराण के श्री ष्णजन्म-खण्ड मे वृन्दा कौ तपस्थली को वृन्दावन कहा गया है, जिसकी चर्चा श्रुति मे राधा की सोलहवी सखी के रूपमे कौ गयी दहै ।
पुराणों में नित्य एवं अनित्य भेदसे वृन्दावन दो प्रकारका है, किन्तु इस तन्त्र-ग्रन्थ (कृष्णयामल' मे दिव्य, भौम मौर भौत नाम से वृन्दावन के त्रिविध रूप कहे है । पद्मपुराण के पाताल-खण्ड में वृन्दावन की स्थिति समस्त ब्रह्माण्ड के ऊपर कही गयी है । बृहत्संहिता मे समस्त वनों की अपेक्षा वृन्दावन को दिग्यतम भौर सर्वश्रेष्ठ वन माना गयाहे। प्द्मवुराणमें बृन्दावन के साथही मथूराका भी गुणगान मिलता दै।
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उत्कल के वंष्णवों ने चँतन्य महाप्रभ् से बनुप्राणित हौकर भावराज्य की साधना कौ । श्रीकृष्ण-लीला एवं नित्य-लीला प्रसंगमें वंगीय वैष्णवों इनका पाथंक्य था । चंतन्यके प्रभावसे तान्विक-साधना के अनेक गुह्य रहस्यों का समवेश उत्कलीय वैष्णव-सम्प्रदायों मे हज । महापुरुष यशोवन्त- दास ने प्रेमभक्ति की आलोचना के सन्दभं में श्रीकृष्णतत्तव, राधातत्त्व, युगल- रहस्य, योगमाया-तत्व एवं नित्य-लीला के वशिष्ट को स्थापित किया । उनके अनुसार चार प्रकार की भक्तियों मेंप्रेमभक्ति सर्व्ेष्ठ हे । नवधाभक्ति मे भी प्रम-भक्ति को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। प्रेम-षोडशी का मन्त्र प्रेम- साधना के लिए द्वार स्वरूप है ।
भगवान् कौ जनन्त शक्तियों के अनन्त भावरहँं। इसी कारण उनकी अनन्त लीलाए* तथा अनन्त धामों का व्णंन शास्त्रों मे वणित है । अनन्त लीला वंचित्य का यह् अनुसन्धान साधकों को अपने अपने प्रा रन्धवशात् मिलता है । प्राकृत देह मं व्याप्त अहंभाव को अप्राकृत देह मे प्रतिष्ठित करने पर ही अप्राकृत जगत् में प्रवेश एवं लीला द्थंन करने की योग्यता बनती हे । प्राकृत देह की संरचना त्रिगुणात्मिका प्रकृति के अन्तगंत होती है तथा इसके अन्तगंत ही कारण, सुक्ष्म भौर स्थूल देह होते हैँ। विशुद्ध सत्त्वरूप प रमोजज्वल भगवद् विभूति कौ स्थिति इस तिगुणात्मिका प्रकृति के ऊध्वं -देश मे होतीदहै। इसे आगमोंने “विन्दु पद से वणित किथा है। इस स्थिति के लाभ के अनन्तर ही प्राकृत देहु अथव बैन्दवं देह अथवा महाकारण देह की प्राप्ति होती है, किन्तु यह परिवर्तन योगमाया अथवा अधंमात्राके आश्रय के बिना सम्भव नहीं होता । इस सिद्ध-देह की प्राप्ति ही लील।-धाम मे प्रवेश की योग्यता ह । इसका जाकार अलौकिक होते हृए भी नित्य ओर विभू होता दहै। यह् प्राकृत-शरीर में बानन्द-स्वल्पमेः ति रोहित रहता है । इस आनन्द के तिरोधान के साथ साथ अणुजीव निराकार चिन्मात्र रहता है तथ अनन्दके प्रादुभविसे उसीमें पुनः साकारत्व आ जाता है । इस सन्दभं मं ब्ृहृद्वामनपुराण कौ यह् उक्ति द्रष्टव्य है-
अकरं चिन्मयं प्रोक्तं ज्ञानरूपं निराङृतिः । नित्यमेव ए्रथगध्रतो ह्यानन्दोऽपि हि साङृतिः ॥
भाव वस्तुतः एक ही अद्रय एवं अखण्ड-तत्व है । वहु स्वतन्त्र एवं परमानन्द स्वल्प है । आनन्द ही उसका स्वभाव है । इती लिए जाप्तकाम
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ध स्पृहाहीन होने पर भौ स्वभाववश यह भाव लीला अथवा क्रीडा-मरन रहता है । एक ही भाव अपनी ही भित्ति पर अपने ही आनन्द के लिए एकं से अनेक बन जाता है गौर अनन्त गुणो को धारण करता है । रूप अनन्त है, क्रियाए* भी अनन्त ह तथा जानश्रय ओर विषय मेद से भाव के आलम्बन भी अनन्त हैँ । यही रसस्वरूप है अौर रस का भोक्ता भी है, अर्थात् भोग्य ओर भोक्ता अभिन्न । भोगकी भी यही स्थिति है । निपुरसुन्दरी के ्रसङ्खमें प्रसिद्ध उक्ति श्रीखुन्दरीसेवनतस्पराणां भोगश्च मोच्तश्च करस्थ पव मे “भग'शब्द का यही तात्पयं है । यहा “ भोग'शब्द से लौकिक उपलन्धियों का ग्रहण न होकर तान्त्िकों का ्रवृत्ति-मागं ही निदिष्ट दै ओौर यही मोक्ष का भीदहेतुदै। इसी तथ्य को स्पष्ट करते हृए अभिनवगुप्त 'प्रबोधपञ्चाशिकाः में कहते टै-
तस्या भोक्त्या स्वतन्ड्यायाः भोभ्यैकार एव यः । स॒ एव भोगः सा सुक्छिस्त्देव परमं पद्म् ॥ एक स्थल पर उन्होने यह भी स्पष्ट किय! है-^एष देवोऽनया दभ्या निस्यं क्रीडारसोस्सुकः' अर्थात् यही क्रीडा ही शिव-शक्ति का सामरस्य है तथा यही परमतत्त्व दै ।
लोला-स्थल मे अनन्य वंचिव्य अवश्य हे, किन्तु यहाँ स्थायी-भावही होता है। यहाँकादेश जौर काल भी अप्राकृतिक दै । यहांदेश का तात्पयं चिदाकाश अथवा अनन्तव्योम का धाम अर काल का तात्पयं “अष्टकाल है । यह् अष्टकाल “कारः पच ति श्रूतानि' के सिद्धान्त का अनुसरण नहीं करता । यहां काल की सत्ता लीला परिकरकेषूपमे रहती है। यहांका उपादान विशुद्ध-सत्त्वकमं' से भथवा 'काल-प्रभाव' से परिणामको प्राप्त नहीं होता, अपितु भक्त की इच्छा के अधीन ईश्वर की) इच्छा मात्र से अथवा भगवान् की इच्छा के अधीन भक्त की इच्छा से अथवा लीलाधिष्ठात्री महाशक्ति ध्योगमाया' के अधिष्ठान के अनुरूप लीलोपकरण रूप में परिणति- लाभ करता है। यहाँ योगमाया स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वसुन्मीख्यति' के सिद्धान्तसे लीला करतीहै। यहाँ धाम भी वहीहै, काल भी वहीदहै, उपादान भीवहीदहै गौर निमित्त भी वही है । इसे द्वितीय की अपेक्षा नहीं
१. बीसवीं शती के महान् वंज्ञानिक आडइन्स्टीन के सापेक्षता का सिद्धान्तः की कल्पना वैश्णव के “अष्टकाल से सम्बन्धित प्रतीत होता है ।
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भगण |
दे । यह स्वयं लीला की द्रष्टरी दै, स्वयं ह मभिनेत्री है ओौर स्वयं ही अपने भभिनय की प्रक्षिका भी। यही समस्त रसोंके मास्वादन कौ हेतु है। यहाँ का प्रधानरस श्बुङ्खार-रसदहै।
भओराधा-ङृष्ण पवं कामकला प्राकृत एवं अप्राकृत दोनों ही प्रकार के भाव जगत् मे काम की शक्ति रति होती है। इनमें अन्तर केवल इस अंण में है कि प्रथम भाव जगत् भाक्त एवं त्रिगुणात्मक है भौर द्वितीय अप्राकृत, त्रिगुणातीत एवं विशुदध- सत्त्वात्मक । ये दोनों मूलतः एक होते हए कायंतः भिन्न होते दँ । अप्राकृत जगत् के काममें प्राकृत जगत् के काम की समस्त वृत्तिर्या प्रकाशित रहती दँ । ज्ञानाग्निसे प्राकृत कामका शमन किया जाता है। पुराणों मे शिव के तृतीयनेत्रसे प्राकृत कामके दग्ध होने की कथा भिलती है, किन्तु अप्राकृत कामको दग्धकरसकनेका सामथ्यं ज्ञान में नहीं होता, क्योकि ज्ञान कौ घनीभ्रुत अवस्था ही आनन्द है । वहाँ भप्राकृत काम ही आनन्द का नामात्तर बन जातादहै। इस प्रकार भगवान् की आनन्दमयी नित्य-लीला का मूल उपादान प्रङ्त-काम दग्ध होकर आनन्द अवस्था को प्राप्त रोता है। इसीलिए शास्त्रों मे भगवती ललिता की अपाङ्गदृष्टि से मन्मथ. के उज्जीवित होने की बात कही गई है । यह् प्राकृतिक उपादान से रचितन होने के कारण ज्ञानाग्नि का विषय नहीं बनता । इस काथं ओर कारण की भभेद विवेचना में श्रीकृष्ण का ललिता से सम्बन्ध जोडा गया है । यथा- -कदाचिदाद्या रुलिना पुंरूपा कृष्यवरिश्रहा ।' यहां ललिता श्रीविद्या.सम्प्रदाय कौ कामेष्व री-तत््व हैँ भौर कृष्ण के साथ उनका घनिष्ठं सम्बन्ध है । श्रीकृष्ण अग्राकृत-काम एवं राधा अग्राकृत-रति है ओर इनकी श्ुङ्खार-क्रीडा ही काम-कला का विलास दहै। काम-तत्त्वके स्फ्रणके साथ-साथ विन्दु-विसगं की क्रीडा होती है| इस क्रीडामे एक ही अद्रैत बिन्दुदो रूपों में परिणत होकर अकृष्य-आकषंक सम्बन्ध स्थापित करतादहै ओर पूनः ये बिन्दद्रय संकुचित होकर एक में लीन होते हैँ । यथा- । अहं च रुलितादेवी राधिका या च दीयते । अहं च वासुदेवाख्यो निव्यं कामकलात्मक्ः ॥ सत्ययोषित्स्व रूपोऽहं योषिच्चाहं सनातनी । अहं च ठकङितादेवी पुंरूपा ङृष्णविभ्रह्। ॥
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[ पणी कामकला कै इस विलास को तन्त्रो मे अग्नि, सोम गौर रवि-इन तीन- बिन्दृओं की क्रीडा से स्पष्ट किया गया दै । अग्नि ऊध्वंशक्तिदै ओर सोम अधःशक्ति। अग्नि शिखा से उद्गत होकर चन्द्रविन्दु पर आधात करने स यह् बिन्दु द्रवीभूतं होकर अमृत का क्षरण करता है। अग्तिगौरसोमकी साम्यावस्था ही रविहै। काम इसीका नामान्तर हं। चन्द्रविन्दु षोडशी कला का नामान्तर है तथा पञ्चदश कलाए प्रतिबिम्बरूप मे अग्निमण्डल ( कालचक्र ) के आकार मे चक्कर काटती रहती हैँ । षोडशी कलारूप चन्द्रविन्दु पर अग्नि-शिखा के आाघातसे निःसृत अमृत-धारा का काम रूपी रवि सवं प्रथम आहरण करता है । तत्पश्चात् अग्निमण्डलस्थ पञ्चदश- कलात्मक चन्द्रम सञ्चरण होता दहै) इन्हीं पञ्चदश कलाओं से अनित्य जगत् की सृष्टि होती है । नित्यधाम की सृष्ट षोडशीरूपा अमृतकला से होती है। यही अमृतकला क्षुब्ध होकर आनन्दमय भावराज्य का निर्माण करती है । यही राधा-कृष्ण के मिलन जनित रस-प्रवाह् का नामान्तर है । प्राकृत देह अग्निके दोनोंषूपों ( ज्ञानाग्नि ओर कालाग्नि) सेदग्धहो जाता है, किन्तु षोडशी कला से निमित देह कौ दग्ध कर सकने का सामथ्यं अग्निके किसीभीषरूपमें नहीं होता) श्रीराधा-द्ृष्ण तथा रिपुरछन्दरो श्रीकृष्ण ओर राधा दोनों ही तत्त्व त्रिपुरसुन्दरी के साथ घनिष्ठतम सम्बन्ध रखते ह । त्रिपुरसुन्दरी को ललिता नामसे कुञ्जाधिष्ठात्री मुख्य सखी के रूप मे वृन्दावन-लीला में स्थान प्राप्त है। 'वासुदेवरहस्य' नामक ग्रन्थ म महादेव के अदेश से वासुदेवके द्वारा त्रिपुरसुन्दरी की उपासना का संकेत मिलता है। उसके अनुसार यह् सुन्दरी दशमहा विद्याओं में श्रेष्ठ है तथा शिवके हृदयम स्थितदहै। वाग्धवकूट, कामराजकूट व शक्तिकट सम्मिलित भाव से इस महाविद्या के मन्त्र कहै गये हैँ । यहीं वासुदेव की तपस्या से प्रसन्न होकर त्रिपुरा के प्रकट होने तथा उनको ( वासुदेव को ) शक्तियुक्त होकर कुलाचार अवलम्बनपूवंक साधना करने का निदेश त्रिपुरा दवारा प्राप्त होता है । इस ग्रन्थमे हरिनाम रूप महामन्त्र के ऋषि वासुदेव, छन्द गायत्री एवं देवता स्वयं त्रिपुरा हैँ । ग्रन्थ के अनुसार लक्ष्मी त्रिपुरा कौ अंशभूता है । हरिनामद्वारा दश से दादश वषं तक कणं शुद्धि की मनिवायंता परजोर देते हए, देवी का वचन मिलता है-'हरिस्तु त्रिपुरा साक्ञत् मम मू तिनं संशयः ।.
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गगणं 11 ]
राधा-तन्त्र के अनुसार कृष्ण शक्ति के प्रचण्ड उपासक ये । शक्ति कै प्रति समपित भाव ही उनके दिव्यत्व का रहस्य है। यहाँ राधाको त्रिपुरा कौ अनुचर "पद्मिनी का अवतार बताया गया है। साथ ही राधाके गणसमूहों के साथ ङृष्ण का कौल स्वल्प भी वणित है। इस तन्त्र-ग्रन्थ के अनुसार बृन्दावन दित्य-शक्तिका निवासस्थानदहै गौर यहाँकेदो प्रधानं वृक्ष तमाल ओौर कदम्ब, काली भौर तारा से सम्बन्धित कटे गये है ।
परकृत ग्रन्थ शश्चीकृष्णयामलमहातन्त्र' में श्रीकृष्ण जौर त्रिपुरा का सम्बन्ध स्पष्टरूपसे निरदिष्टहै। यहाँ त्रिपुरीसुन्दरी कृष्णसे ही उत्पन्न एवं स्वथं कृष्णरूपा, चतुभृजा ओर रक्तवर्णा बतायी गयी हैँ । यहाँ लयतालयुक्त नाद एवं मातृका-शक्तियों के आवाहन करने पर भृवनेश्वरी उत्पन्न होती है, जो गायत्री की अधिष्ठात्रीहै। राधाको वशमें करने के लिए संक्षोभिण्यादि मुद्राओं से तत्तत् मुद्रा के नामानुसार राधिकाकेदेहमें क्षोभणादि क्रियाओं के उत्पन्न होने का वणंन यहां मिलता है गौर अन्ततो गत्वा सवं त्रिखण्डामृद्रा से राधा वशीभूत होती है । शुकसं हिता में पञ्चदश धारणाओं का उल्लेख है । यहां इन धारणायों केज्ञानसे ही पूणं कलाभों के विकासका बणंन किथा गया है । कलाओं के विकसित होने पर योगी स्वयं कान्त होकर कान्ताशूपी भगवान् को प्राप्त कर, पूणं व सहज अवस्था की उपलन्धि कर, मुक्तिलाभ करता है। “ऊर्ध्वाभ्नायतन्त्र' में राधा को महाविद्या कहा गयादहै। षोडश अक्षर विशिष्ट मन्त्रको धारण करने से वहु षोडशी-विद्याके नामसे विख्यात है । यहां षोडशी राधाकाही नामान्तर दै।
शास््रोमें षोडशी को ललिता कहा गयादहै। यह् कृष्ण-लीला में कुञ्जाधिष्ठात्री रूपमे, रास-लीलामे द्वाररक्षिणी रूपमे, राधा की अष्ट- सखियों में सवं प्रधान स्खीकेरूपमें स्थान प्राप्त करती है, इसका वर्णन अनेक स्थानों पर मिलता है । वस्तुतः ललिता अथवा त्रिपुरा का आश्रय लिये विना कोई भी साधक कृष्ण जौर राधा की गह्य-लीलाका साक्षात्कार नहीं कर सकता । इसकी कथा पद्यपुराण के पाताल-खण्डमें वणित दहै। इसी पुराण के उत्तर खण्डमे दण्डकारण्यवासी मुनियोंके गोकूलमें गोपीरूपसे जन्म ग्रहण कर पति रूप में भगवान् रामको प्राप्त करनेकीकथाभीदहै। इसी तरह के आख्यान हमें ब्ृहद्वामनपुराण मे भी मिलतेरहैँ। यां उपनिषदो एव श्रूतियों के भी ब्रजधाममे गोपीभावधारण करने की कथा वणित है। पञ्चपुराणके सृष्टिखण्डमें तो स्वयं गायत्री के गोपीभाव प्राप्त करने का उल्लेख मिलता है ।
[ ऋष
इस पूरे विवेचन का हम यह निष्कषं निकाल सकते दै कि विविध सम्प्रदायो मे अपने-अपने उपास्थ देवता को किसीन करिसीरूपमेंश्रीविद्या के साथ जोड़ने की परम्परा रही है । यह् परम्परा स्वंथा अप्रामाणिक भी नहीं दै । प्रत्येक सम्प्रदाय के विशिष्ट आचायंगण, जो साधक होते थे, गुर लम्प्रदाय से इस रहस्य का ज्ञान प्राप्त करते थे । ब्ह्माण्डपुराण के ^मोकतेक- हेतु चिद्या तु श्रीविद्टा नात्र सं्ञयः के अनुसार अन्तिम भूभिकामे सामरस्य लान्न के लिए श्रीविद्या का आश्य लेना ही पडता था । अन्य महा विद्याओं की उपासना की आम्नाय पदति मे भी श्रीविद्यासम्मेलन से ही पणंता मानी जाती थी, यह एक तथ्य है । श्रीविद्या प्रधानतः देवतां की उपास्य देवता है । ब्रह्मयामल में कहा गया टै- यत्पादा्चनतो देवा देवध्वं प्रतिपेदिरे । तां नमामि महादेवीं महात्रिपुरसुन्दरीम् ॥ यह केवल अथंवाद ही नहीं है, अपितु वैदिक, पौराणिक तथा तान्त्िक- प्राणप्रतिष्ठा विधिसेभी इसी परा प्राणशक्ति का आवाहन कियाजातादहै। द्सका ध्यान है- रक्ताम्भोधिस्थपोतोललसदरुणसरोजाधिरूढा करान्जैः पां कोदण्डभिकषुद्धवमलिगुणमप्यङ्कुकं पञ्चवाणान् । विश्चाणाऽसृक्कपालं त्रिनयनलसिता पी नावक्तोरुहाढध। देवी बाराकैवर्ण भवतु सुखकरी प्राणशक्तिः परा नः ॥ यही कारण रहै कि वैष्णवागमों मे अथवा श्रीकृष्णोपासना में श्रीतरिद्या का सम्बन्ध देखा जाता है। श्रीविद्यासम्मेलनतन्त्र कै अनुसार तत्तद् देवताभों के मन्वोंमे श्रीविद्या के मत्त्र-कट मिलने का विधानदहै। इस प्रकारकी परभ्पराको हम काल्पनिक नहीं कह सकते, जंसे-वेष्णवों में गोपालसुन्दरी विद्या इत्यादि प्रसिद्ध हं । दसी परम्परा के निवंहन में चंतन्य- सम्प्रदाय मे श्रीविद्या-साधना का सम्बन्ध पौराणिक शली मे इस श्रीकृष्ण- यामलमहातन्त्र' मे भी हुआ है । अस्तु, अपने स्वल्पज्ञान के अनुसार अपनी कष्ठ बाते आप सुविन्ञ पाठक- जनोंके समक्ष रखी गयींहै। हम यह् समञ्षते हैँ कि इस ग्रन्थ की समालोचना मे बहुत से रहस्यो का भेद यहां सम्भव न हीदहो सकाटै। फिर भी कु प्रयास अवश्य किया गयाहै मौर भविष्यमें भी होता रहे, एेसी हमारी कामनादहै।.
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आभार-प्रद्ोन
सवंप्रथम हम भारतीय वाङ्मय के महान् विचारक एवं अपने विभाग के संस्थापक शिवसायुज्य प्राप्त म० म० पं० गोपीनाथ कविराज का स्मरण करते हए उस महापुरुष के चरण-कमलों मे श्रद्धा-सुमन जपित करते है । इनके निबन्ध सदैव ही हमारा मागंदशंन करते रहते हैँ । तत्पश्चात् हम इस विभागकेआगमशाश्व के पूवं अध्यापक एवं "चिद् गगनचन्दरिका' के टीककार श्रीगुरुचरण स्व° पं० रघुनाथ मिश्रजी के सादर-चरणों मेँ प्रणाम करते है । इस शास्त्र मं हमारा प्रवेश, प्रवृत्ति ओौर प्रेरणा इत्यादि इन्हीं महापुरुष की देन है। यद्यपि कालचक्रके दुर्योगसे हम इनके चरण-रज से अपने मस्तक को सूना पाते है, किन्तु इनका आशीर्वाद हमे जन्म-जन्मान्तर तकं मिलता रहे, यही हमारी प्राथंना है । श्रीगुरुचरण इस संसार से कू च करते-करते मुज्ञ दीन को प्रो व्रजवल्लभ द्विवेदी जी के श्रीचरणों मे छोड़ गये थे । इनके दायित्व का निर्वाह प्रो° द्विवेदी साज तक कर रहै है भौर अन्त तक करते रहै, हमारी उनसे यही प्राथंना है । प्रो° द्विवेदी कविराज जी द्वारा रज्ज्व लित कौ गयी तन्त्रशास्त्रीय दीपमालिका कै प्रामाणिक भौर अन्तिम चिराग हँ । प्रस्तुत ग्रन्थ शश्रीकृष्णयामलमहातन्त्र' का गोधपुणं सम्पादन ईनकाही आशीर्वाद है । इसी करम मे पुज्य पिताश्री स्व० डा० सुशील कुमार उपाध्याय कोभीहम प्रणाम करते हैँ। इस सांसारिक जीवन की कठिनाइयों के मध्य शास्त्रसेवा का सौभाग्य मिलता रहे, इनसे हम।रो यह॒कापनादहै। इन अवतर पर हम स्व ठाकर जयदेव हका स्मरण करते हैँ। जब भी भी हमे इनके दशंन का सौभाग्य भिलता था, अनायास ही वे अपने ज्ञान को उड़ लना ओर तन्तर-शास्त्र के गम्भीर रहस्यों को समन्नान। प्रारम्भ कर देते थे । अपने वतं मान विभागाध्यक्ष प्रो ड° रामजी मालवीय की महैतुकी कृपा को जीवन प्राप्त करने कौ अभिलाषा है। इनकीकृपासे ही हम भगे भी कुष्ठ कायं कर सक्ते हैँ ।
वषं १९८६ का जनवरी मास मेरे जीवन का सर्वाधिक विस्मयकारी काल सिद्ध हुआ, जबकि इस विश्वविद्यालय के साहित्य विभाग के पूर्वं अध्यक्ष प्रो° बदुकनाथ शास्वी खिस्ते जी से हमारा सम्पकं हुआ । ये महान् तान्त्रिक, प्रातः स्मरणीय, माच।यं श्रीभास्कर राय कौ श्रीविद्योपासना की परम्परा के प्रामाणिक आचायं एवं महान् साधक भो हँ । संस्कृत साहित्य जगत् में इनकी प्रसिद्धि सवंविदितहै ठी । इनकी कृपासे हमे श्रीभास्कर राय
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के सम्प्रदायगत साहित्य के मािक रहस्यों का अवबोधनदहो रहा है, साथ ` ही श्रीविद्याके साहिव्यके प्रति हमारा स्न्लान भौर ललकभी बढ़ी है क्योंकि पूवंकाल के विद्यार्थी जीवनमे प्राप्त विज्ञान के संस्कार (क्यों गौर कंसे) से हम अपने को मृक्त नहीं कर पति हैँ । इसी वषं के मध्यमे हमें जपने विश्वविद्यालय के पूवं एवं महान् कुलपति प्रो° वी वेद्कुटाचलम् जीका हादिक आशीर्वाद भी मिला। इनके आशीर्वादिएवं प्रेरणाने हमारे जीवन को अवश्यदही प्रभावित कियाहै ओर जीवन मं कुष्ठ करने का संकल्प भी जागृत हुआ है। भविष्यमे भी आशीर्वाद की कामना करते हए इनके श्रीचरणोंमें हम नमन करतेर्है।
अपने विभाग के अध्यापक स्वंश्री पऽ जगन्नाथ शास्त्री तंलङ्क एवं प° गणपति शास्त्री एेताल के प्रति हम कृतज्ञ हैँ । ये दोनों ज्ञान-वृद्ध पग-पग पर हमारा मागं-दशेन ओर सहायता करते रहते हैँ ।
प्रकाशन के क्रम मे सरस्वती भवन के ग्रत्थाध्यक्ष डं० विजय नारायण मिश्रके हम सर्वाधिक आभारीरहैँ। इनकी दही प्रेरणासे इस ग्रन्थ का प्रकाशन मानवसंसाधनविकास मन्त्रालय की वित्तीय सहायतासे सम्पन्न हो रहादहै। कृष्णयामल की पाण्डलिपियों को सुगमता पूवक उपलन्ध कराने में अन्प- पुस्तकालय, बीकानेर गौर एशियाटिक सोसायिटी बआंफ बंगाल, कलकत्ता के अधिक।रियो व कमंचारियोंके भी हम अत्यन्त आशभारी रहैगे ।
ग्रन्थ के प्रकाशन मे प्राच्य प्रकाशन, जगत्गंज, वाराणसी के श्री प्रदीप कुमार राय एवं उनकै कम्पोजीटर श्री लालचन्द चौहान के प्रति भी हम तज्ज है। श्लोकानृक्रमणी मं श्द्धापूवंक सहयोग करने वाली चिरजीवनसङद्कखिनी श्रीमती उमिला उपाध्यायके निरन्तर सहयोगकीभी हमे आकाक्षाहै। महाशिवरात्रि, संवत् २०४८ रीतला प्रसाद उपाध्याय वाराणसी
उपोदृघातः
अभिनवगुप्तपादैः श्रीतन्त्रालोके प्रथमे आशीर्वादात्मके मद्धलरलोक उक्तम्- विमलकलाश्रयाभिनवसुष्टिमहाजननी भरिततनुश्च पश्वमुल्यगुप्तरुचिजंनकः । तदुभययामलस्फुरितभावविसर्गमयं हूदयभनुत्तरामतकुलं मम संस्फुरतात् ^ ।\ इति !
मम आत्मनो हृदयं जगदानन्दादिगब्दवाच्यं तथ्यं वस्तु, सम्य्देहप्राणादि- प्रमातरतासंस्कारन्यक्कारपुरःसरसमावेशदशोत्लासेन दिक्कालाद्यकलिततया स्फुरतात् कालत्रथावच्छेदशून्यत्वेन विकसतादित्यथंः । तच्च कोदुक् ? इत्यक्तम्- इति । 'तत्' आद्या्थंव्याख्यास्यमानं च तत् “उभयं तस्य यामलम्, 'तयो््यामकं रूपं स॒पंघट इति स्मृतः' इति वक्ष्यमाणनीत्या शक्तिरक्ति- मत्सामरस्यात्मा संघटुःर, अर्थात् नास्ति उत्तरं यस्मात् तद् अनुत्तरम् । अमृतजञ्चेति एतारक् कुलं शुद्धस्त्रातन्त्यशक्तिरूपमेव, तत्र विमलकलाश्रया- भिनवसृष्टिमहाजननी शक्तिरेव ।
वर्णकलाया आधारेण "वागेव विश्वा भुवनानि जज्ञे' इति जगत्सृष्टयनु- रूपा । अभिनवायां सृष्टौ बही ङूपतायां स्वातन्त्यलक्षणं महत्तेजो यस्याकार- स्तथोक्ता । इत्येव गुणानां सृष्टिदिचदानन्दघना शक्तिरेव संविदपरपर्याया । नान्यस्य साम्यम्, एतादग् अलौकिकसम्भारपरिपूर्णं भवितुमर्हति । जनकोऽपि परप्रमातृरूपः शिवः पचशक्तिरूपेन्द्रियदृत्तिभिः स्वसामथ्यंबलेन परिरक्षितो निखिलभावग्राससमर्थः समुद्दीपितपरप्रमातृभावः स्वात्ममात्रपरिपूर्णंः शिव एव । एतादृग् अपूरव॑शक्तिपम्भूतः प्रकाशितुमर्हेत् । एतादृशं विलक्षणम् उभययामङ्स्फुरणस्य भावविसरगेस्य केन्द्रीभूतं हृदयं सवंशक्तिघ्रोतःस्वरूपं तदेव हदि विकसेत् चेद् जीवनयात्राया: परमं मङ्कलावहं भवेत् । तदेव च शक्तिशिवात्मकथामल्भावस्य शादवतं स्वरूपम् ।
अत एव जयरथो विवेके शिवशक्तितत्संघट्राद्ययो गिनी वक्तराख्यदक्षिण-
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१. श्रीतन्त्राखोके, प्रथमाल्िके, प्रथमः इलोकः २. तत्रैव, प° ४ ३. तत्रव, पृ० ४०-४२.
ववत्रादभेदप्रधानानां चतुष्वष्टिभ रवागमानां प्रादुरभावि श्रीकण्ठीसंहिताप्रामाण्येन प्रदर्लधति। तत्रैव ब्रह्म-विष्णु-स्वच्छन्द-रुरु-माथवंण-सद्र-वेतालाख्यानां याम- लानां नामानि वर्ण्यन्ते, अत्र सप्तैव यामलानि परिगणितानि । अष्टमस्य नामन दृश्यते । देवीयामलमत्र अष्टमत्वेन परिगणयितुं शक्यते, तस्य तन्त्रालोकतद्विवेकयो बहुशः स्मृतत्वात् ।
तक्तिशक्तिमतः सामरस्यरूपं यामल्तत्त्वम् । इदं परानपेक्षरूपेण स्वतः सिद्धम्, स्वरत एव स्फुरति-इति अङक्ार-हकारयोः समाहाररूपेण निष्पन्नमहंरूपं पराहन्ताप्य॑वसितम् । वस्तुगत्या अनुत्तरं सर्वोत्करष्टं वस्तु, तदेव बोधस्वा- तचत्यषमरसीभूतं तत्तवं दर्शं नस्यास्यत्मभूतं प्राणभूतं हृदयभूञ्च रहस्यम् ।
महेश्व रानन्दः प्रकाडापिमर्शात्मिनः परमेश्वरस्य यामलोल्लासादेवोभय- विसर्गारणिस्वभावादुल्लासाद् उन्मेषनिमेषशक्तिद्ितययौगपद्यानुभूतिचमत्कारा- देव॒ शब्दार्थात्मनां षडष्वनामुत्पत्ति पर्॑न्तपश्वाशिका-विरूपाक्नषपचचाशिका- चिद्गगन चन्दरिका-सौ भाग्यह्दय-स्वच्छदतन्व -विज्ञानभ रवादिप्रामाण्येन प्रति- पादयति! । महाकवेः कालिदासस्य "वागर्थाविव सम्पृक्तौ" इति प्रसिद्धरलोक- मपि सोऽत्रैव स्मरति। तेनैव शिवयोगिनां यामलीसिद्धिरपि चिताः । प्रकागतरिमशं घामरस्यात्मकं यामलोल्लासस्वभावं च परमेश्वरस्य प्रदद्यं शिवशक्तिमेलापरूपं रद्रयामलं व्याव्यंते । तत एव शद्रयामलादीनां शास्त्राणां प्रादुरभावि इति च ।
यमस्य भावो यामलम्, युगनद्धभावत्वम् । यमह्पस्य; यमललरूपस्य, युग्मरूमस्य, भिथो मिलितिरूपस्य, परस्परं स म्मिलितस्वरूपस्य परिचिन्तनं मननं स्वानुभूतिभव्यभावनं यामलस्य निरिचतोऽथंः । एतादृरमथं गभेशास्त्र "यामलम्" शास्त्रेषु सवंत्रानुशास्यते । यामलेऽपि शिवशक्तिसामरस्य रहस्ये मनीषा प्रतिष्ठाप्यते ।
हा महेश्वराचार्येगाभिनवगुप्तवादमहोदयेन लिखितम् “यामलं सङ्कटः" निधिभागप्रदनोत्तररूपस्वरूपप्रसरादारभ्य यावद् बहिरहन्तापरिगणनीयसृष्टि- संहारशतभासनं यत्रान्तः तदेतद् कुलोपसंहृतमेवेति' 3 । वस्तुत एकव परा कालस्य कर्विणी शक्तिः चक्तिशक्तिमतोरभेदेन यामलत्वं प्रपद्यते । प्रकाश-
१. महाथं मञ्जर्याम्, प° ६९ २. तत्रैव, पृ° १६४ ३. श्रीतन्त्रालोके तृतीयाह्िके, इलो ° - ६८
। । = ध ॥
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तिमरशंलक्षणमौपाधिकमेदमवभास्य यामलतामेति१* । यामल्स्य प्रत्यवमशे परिपुर्णोऽहमात्मकः परमशिवः प्रद्योतते ।
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. , यामलशब्दस्याथेः | तत्र कोऽयं यामल्पदा्थं; ? इति जिज्ञासायां विविधग्रन्थालोडनपुरस्सरं शास्त्रीयमभिमतमुपस्थाप्यते। शब्दकत्पदूमे3 यामलपदस्य युगलम्,
तस्व्रशास्ज्ञविशेष इति चाथंद्रयं प्रदर्श्यते । यामलभावस्य दाशंनिकी व्याख्या, ततः प्रसृतानां यामल्तन्त्राणां नामानि च तत्र परिगणितानि । यामलशास्त्र- लक्षणच-
सृष्टिश्च ज्योतिषाख्यानं नित्यकृत्यप्रदीपनम् ।
क्रमसुत्रं वणेभेदो जातिभेदस्तथेव च ॥
युगधर्मइच संख्यातो यामलस्याष्टलक्षणम् ।। इति ।
तच्च यामं षडविधम्, आदि.ब्रह्म-विष्णु-रद्र-गणेश-आदित्ययामल-
स्ेदादिति च वाराहीतन्वप्रामाण्येन तत्रैव प्रदर्यं॑ते । एतदेव व्याख्यानं वाच स्पत्येऽपि४ दृश्यते । वामनञशिव राम-आष्टेमहोदयेन संस्कृत-हिन्दीकोशेऽपि स एवार्थं; प्रतिपादितः । वाचस्पत्ये५ यामलानि रलोकसंश्यानिरदेशपुरस्सरं निदक्शितानि वाराहीतन्त्रप्रामाण्येन--
यामलाः षट् च संख्यातास्तत्रादावादियामले । द्राविक्रच्च सहस्रणि त्र्यस्त्रिराच्छतानि च ॥ द्वितीये ब्ह्यसंजञे ते द्र्वश्तिश्च संख्यया । सहस्राणि शातान्यत्र तन्येव कथितानि च तावत्संख्यसहल्राणि दातानि परिसंख्यया । विशतिहच तथा संस्या शलोकार च विष्णुयामले ।। कालसंख्यसहस्राणि बेदसंख्यशतानि च। परश्चषष्टिस्तथा श्लोकाः कनिष्ठे रुद्रयामले ॥ नवर्लोकसहस्राणि त्रयोश्यारातानि च । दाविशतिस्तथा श्लोका गणेदाया मलोत्तमे ।। र विसंख्यसहस्राणि आदित्याख्मे तु यामले ।। इति ।
१. तत्रव, इलो ०-२३४
२. तत्रैव इले ०- २३५
३. चतुर्थो भागः, प° ४०
४. षष्ठो भागः, प्र ४७७७
५. चतुर्थो भागः, प° ३२२४
आ =.
सौन्दयंलहर्या † व्याख्याकारेण लक्ष्मीधरेण यामलविषये एतदुक्तम्-'यमला नाम कामसिद्धाम्बा, तत्प्रतिपादिकानि तन्वाणि यामलान्यष्टौ। तेषां गणो यामलाष्टकम्' इति ।
नागरीप्रचारिणीसभ।सम्पादिते "हिन्दीशब्दसागर'ग्रन्येः यामलं यम- जसन्तानो प्रन्थविश्ेषदचेत्येव प्रतिपादितम् । “शारतीयदर्शंन' कता श्रीबल्दे- वोपाध्यायेन 3 आगमानां व्रिभागव्रयं निहूपितम् । तत्र सात्विकागमास्तन्त्र- रूपेण, राजसागमा यामलकूपेण, तामसाइच डामररूपेणाभिधीयन्ते ।
डां प्रबोधचन्द्रबागची महोदयस्तन्त्राणां विभागद्रयं प्रकटयति । तत्र प्रथमं गास्त्रानुवतिरूपम्, अपरच् शास्व्राननुवतिरूपम् । आद्ये आगम-यामलानां तथ तत्सम्बद्धानां तन्त्राणां स्थोनम्, द्वितीये च कुलाचार-वामाचार-सहजयान- वज्रयानतन्त्राणां समावेशो वतंते ।
'लक्ष्मीतन्त्र, धमं ओर दशन" इत्याख्ये ग्रन्थे“ डां° अशोककु मार- कालिया महोदयेनाभेदपरकाणां भैरवागमानां विभागे तन्त्रालोकविवेकधृत- श्रीकण्ठीसं हिता प्रामाण्येन यामलाष्टकस्यापि स्थानमुपन्यस्तम् । एतच्चास्माभिः प्रदं यिष्यते परस्ताद् विस्तरेण ।
मातुकाभेदतन्त्रे भूमिकायां* तन्त्रशास्त्रम् आगम-यामल-तन्त्रनेदतः प्रधानतस्त्रिधा विभक्तम् । एतदतिरिक्तं डामरनामकोऽन्योऽप्येको विभागो वणित: । चतुर्णा समुच्चयस्तत्त्रनाम्ना तत्र व्यवद्धियते । तत्र वाराहीवचनं च-
आगमं त्रिविधं प्रोक्तं चतु्थंमेश्वरं स्पृतम् ।
कल्पदरचतु्िध्ः प्रोक्त आगमो डामरस्तथा ।\
यामलङच तथा तन्त्रं तेषां भेदाः पुथक् पृथक् \! इति । तन्त्राणि प्रधानतरचतुष्षष्टिसंख्याकानि तत्र॒ कथितानि "चतुष्षष्टिरच
तन्त्राणि यामलादीनि पार्वति !' इति । कुर्म॑पुराणे* पूवंभागे दादशाध्याये यामलं मोहनाथं शास्त्रमिति कथ्यते । यथा-
१. लक्ष्मोधरीटीकायाम्, इलो ° --३१
२.भब्र <, षर ४०६८
३ भारतीय दर्शन, प° ४७६
४. स्टडीज इन तन्त्राज्, भाग १, प° ४४-४५
५. प्रथमे संस्करणे, प° २-३
६. सं°-- चिन्तामणि भट्टाचार्य, पृ° २-३
७, सं ०--डां° रामश्चंकर भट्टाचायं, इलो ०--२५८
0.
कापालं भैरवं चैव यामलं वाममाहंतम् । कापिलं पाश्चराच्रं च डामरं मोहनास्मकम् । एवंविधानि चान्यानि मोहनार्थानि तानि तु|! इति ।
यामलोद् भवः सर््ोल्लासतन्तरे ! यामलानां समुद्भवः समुपवणितो वतंते । तत्र प्रथमो- ल्लासे यामस्य निगमस्य च संख्यापि प्रतिपादिताः । तथाहि- सक्ष्नेऽपि नि्मेखा या च स्थले सा यामलं रिवे । यामलोक्तं स्थलखरूपं सर्वंशास्त्रस्य बोधनम् ॥ चतुष्षष्टचागमः प्रोक्तः पच्चधा निगमस्तथा । यामलं च चतुर्थोक्तः तस्माच्छास्त्रं प्रकाशितम् ।\ निगमादागमो जात आगमाद् यामलो भवेत् । यामलाद् वेदसज्जातं वेदाज्जातं पुराणकम् ।। इति । नारायणीतस्त्रे3 उमाशिवसंवादद्वारा यामलस्योत्पत्तिविषयकमाख्यानं भ्रकटीकृतम् । तत्र शिवः शिवां प्रति यामलोत्पत्ति प्राकाशयत् । यथा-- निगमात्मा सहेश्ानि परमात्मागमो घ् वम् । जीवात्मा यामलं प्रोक्त बाह्यात्मा भेदरूपकम् ॥। अङ्कानि च पुराणानि अङ्धस्याङ्खस्मृति श्रिये । अन्थानि यानि शास्त्राणि तनुरूहाणि पार्वति ॥ शास्त्रेण देवतारूपं जायते युगभेदतः\ इति । तत्र यामलानां च॑तुष्षष्टिप्रकाराः प्रधानतया प्रतिपादिताः । तदेवमुद्- चोषयता चतुर्युगीनं मत मूपन्यस्तम् । यथा -- सर्वयामलसंगीतं चतुष्बष्टिभ्रकारकम् । प्रधानमेतद् विज्ञेयं चतुर्युंगमतं ध्वम् ॥ इति । सर्वोल्लासतन्त्रानुसारं^ वापुदेव-गणेगकथाप्रस ङ्गेन विभिन्नानां निगमा- गमानां निगमो निदिचतो दृहयते । तद्यथा--
१. प्रथमोल्लासे, पृ०३
२. तत्रैव, इछो ° १९-२१
३. तत्रैव, इलो ° २७-२८
४, तत्रैव, द्वितीयोल्लासे, इलो ° --२० ९९. प्रथमोल्छासे, इलो ° १७-१८
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६८ दई)
|} वासुदेवोऽपि तच्छत्वा उवाच मणेशं प्रति । नन्दीदवराय तद्वाक्यं निममागमसम्मतम् ।। गणेशेन प्रवक्तव्यं यामलेषु प्रकाशितम् । एवं परस्परं व्याप्त आगमो निगमः कितो ॥
॥ षडाम्नायतन्त्रे परब्रह्मणः परमात्मनः, तथा च शब्दन्रह्यणो वेदात्मकाद् याम्ादिकं प्रादुर्भूतमिति दलोकारूयानेन प्रतिपादितम् । तत्र॒ निगमाद् आगमस्य, तथा आगमाद् यामलादिकस्योत्पत्तिः कथ्यते ^ । सच्चिदानन्द वाचकं ब्रह्मसूत्रं निगमेषु, परमात्मनिरूपणं प्राज्ञपुरुषवर्णनं चागमेषु ° । सकलं निष्कलं च सूत्रं यामेषु प्रकारितमिति वर्णितम् ।
षड+म्नायतन्त्रे प्रेमास्पदं विज्ञानात्मा स्थूलः सूक्ष्मः स्वयंप्रकाशश्चेति त्रिधा निरूपितः“ । काण्डद्वये प्रतिपादितं सकलं यामलं सिद्धं सम्पादितम् ` । तथा च वृत्तिभाष्यसमन्वितं निगमसूत्रं तदुत्तरे प्रतिपादितम्“ । अन्यत्र च | यामलेभ्य एव चतुर्णां वेदानामाविर्भावः प्रदशशितः । तथा हिं ब्रह्मयामलसम्भूत- | स्त्रिगुणात्मक ऋर्वेदः८ । श्रज्ञानं ब्रह्म' इति तदीयं महावाक्यम् । ज्ञानविज्ञान- | | संयुतः सामवेदो विष्णुयामलात् समभूत् ^ । "तत्त्वमसि ' इति तदीयं महावाक्यम् । ।
| पितृदेवक्रियादिशक्तिज्ञानप्रतिपादक आथर्वंणो वेदः शक्तियामलतः समभवत् ` ° ¦
॥ "अयमात्मा ब्रह्म इति तदीयं महावाक्यम् । रुद्रयामलाद् यजुर्वेद संभूतः । | “अहं ब्रह्मास्मि" इति तदीयं महावाक्यम् ।
पूनरत्रैव निगमागमयामल्लक्षणानि श्रदद्यं चतुविधं यामलं प्रदश्यंते । तदन्यदुपयामलमिति प्रोच्य च क्रान्तभागे प्रचारितानि त्रिषष्टिचतुराणिः (१९२) तन्त्राणि सूचितानि । अत्रैव वेदाचार-पर्वाचार-वामाचारलक्चष-
१. षडाम्नातन्त्रे, प्रथमे पटके, इलो ० --३ २. तत्रव, इलो ° - २३ ३. तत्रव ४. तत्रैव, इलो०- २४ ५. तत्रैव, इलो ०- २६ ६. तत्रव, इलो ०-२७ ७. तत्रैव, इलो ०-२८ ८. तत्रव, इलो ०-२९ ९. तत्रैव, इलो ०-- ३० १०. त्रैव, उलो ०- ३१ ११. तत्रव, इलो °- १२८
ऋ 1. = >; = 3. ` ब ~न
9 1
णानि प्रदश्यं पुनरपि चिदात्मा निगमः, विद्यात्मा आगमः, अन्तरात्मा च यामलमिति व्यते! ।
वराम्बायाः पराया: भियो मुखाम्भोजाद् यामलकिञ्ज ल्कजन्मेति शद्रयाम- लस्य मतम्२ । निगमादागमस्य, जागमाच्च यामलादितन्त्राणां प्रादुर्भावोऽप्य- त्रैव प्रददयंते ।
यामानां विवरणम्
यामलतन्त्राणि प्राचीनतन्त्राणामेकं महत्वपूणं म ङ्गम्, किन्तु तानि सर्वाणि न प्राप्यन्ते । यामलशब्देन रिवशक्त्योमू लावस्था, अ थंतोऽद्रौ तावस्थंव द्योतिता अवति । यामलशब्दस्य तात्पयं तन्त्रागमस्य कतिपयगुप्तविषयार्णा प्रतिपादने- ऽपि भवितुमर्हति, तथापि व्यवहारतो यामलग्रन्थानामन्यतान्तिकग्रन्थार्ना च मध्ये विभ्राजनमसाध्यमिति प्रतिभाति । सामान्यत्तयेदं स्वी कर्तं शक्यते यद् बहूनि यामलानि लाक्षणिकतया भ्रैरवतन्त्राणि सन्ति, यानि जैवमतान्तगंतशक्ति- सहकृतविचारधारा निरूपयन्ति । सवै यामलग्रन्था एवमेवेति वक्तुं न समीची- नम् । मुख्यतो यामलग्रन्थानां विष्टयमिदमेव यत् शिवशक्त्योर्यामल भावस्य वर्णनम् । यतः शाक्तगरन्ेषु केवला शक्तिः, शे वग्रन्थेषु केवलः दिवो व्यते । केषुचित् कौलशाक्तम्रन्थेषु परमतततवस्य यामलभावो वण्यते, परन्तु तत्र शक्तेः पू्णंहूपेण पुरुषविहीनत्वं न मन्यते । अन्यच्च महस्वपूर्णमिदमस्ति यत् प्राचीन- ग्रन्थेषु यामलानां कौलस्लोतस्त्वं मन्यते, यथा--ब्रह्मयामलादि । एवं प्रकारेण स्पष्टीभवति यद् यामलतन्त्रोक्तविषयस्तु ीवागमाद् भिन्नोऽस्ति ।
यामलतन्त्राणां प्राचीनत्वं स्वीकूवन्ति विद्वांसः, यतो विज्ञान रवतन्तरं हद्रथामलपरिरिष्टमिति मन्यते । अभिनवगपा ब्रह्मयामल-देवीयामलयोः सन्दभें स्वीयतन्त्राङोके यामलपदस्य विशदं व्याख्यानं कृतवन्तः । कदा रचना जातेति कालनिर्धारणं तु कठिनमेव । विदुषां मतान रेण नव मशतकात्पूर्वं तद्रचनाकाल इति स्वीकत्त शक्यते ।
एवं प्रतिभाति प्राचीनकाले यामलानां नामानि देवता अधिकृत्यैव भवन्ति स्मेति । अभिनवगुप्ा ब्रह्मयामल-देवीयाम लयोरतिरिक्तान्यपि यामलानि परिचि- न्वन्ति स्म । यतोऽष्टयामलानां जयरथोद्धृत चतुष्षष्टितन्त्रेषु वर्णनं वर्त॑ते । तन्त्रचिन्तामणि-नित्याषोइशिकाणंवादिसूचीतोऽपि तेषां परिज्ञानं भवति । तद्यथा-
वक गीं
१. तत्रैव, इलो ° --१२९ २. परात्रिशिकायाम्, प° १७८
"ब्रह्मयामल-विष्णुयामल-र्द्रयामल-स्कन्दयामल-उमायामल-लक्ष्मीयामल- गणेशयामलान्यष्टौ' इत्यथ रत्नावली कारः? । परन्तु सेतुबन्धैऽष्टयामलनामक्रमे कंडचन वयुकत्क्रमोऽवलोकषयते । नामान्येतान्येव । कुलचूडामणिभूमिकायां तु वयुतक्रमविध्रमेणान्य एवाथः कल्पितः, ग्रहयामलस्य च तत्र॒ समावेशोऽकारि । श्रीकण्ठी संहितायां वु ब्रह्मयामल-विष्णुथामल-स्वच्छन्द-रुर-अथवंण-रुद्र-वेताला- खप्रान्यष्टावेव यामलानि परिगणितानि, परन्तु नामानि सप्तैव प्राप्यन्ते । लक्ष्मीधरसम्मत्या भास्कररायसम्मत्या च वामकेड्वरतन्व्रानुसारेण चतुष्षष्टि- तन्त्रेषु एतानि यामलाष्टकनाम्ना वर्णितानि, तेषां नामानि च ब्रह्मविष्णु. रद्र-लक्ष्मी-उमा-स्कन्द-गणेश-जयद्रथया मलानि 3 । सर्वोल्लासतन्त्रोद्धृततोडल- तन्तरानुसारेण चतुष्षष्टितन्तरेषु कस्यचनापि यामलतन्वस्य नाम नोपलभ्यते । दाशरथीतन्त्रे द्ितीयाध्यायेऽपि चतुष्षष्टितन्त्राणां विवरणं प्राप्यते, परन्तु तत्रापि तत्समानमेव । रघुनायतकंवागीशविरचिते आगमतत्त्वविलासे ग्रन्थारम्भे एव तन्वम्रन्थानामेका सूची ग्रन्थकारेण दत्ता । अरिमिन् ग्रन्थे ब्रह्म-आदि-ष्दर- बृहद्-सिद्धयामलानि सन्ति* ।
पूवंवतिसमयाचारतन्त्रं॒ब्रह्म-विष्णु-शिव-शक्ति-गणपति-स्कन्द-सूयं चन्द्रा दीनां यामलानां सूचीं प्रस्तौति । वडाम्नायतन्तरे ब्रह्म-विष्णु-शक्ति-दद्रयामलानां चर्चा प्राप्यते । नरपतिजयचर्याक्िते स्वरोदये“ ब्रह्म-विष्णु-रुद्र-जादि-स्कन्द- देवीयामलानीति सप्तविध्यामलानां विवरणं दश्यते । एवं वतंते यामलनाम- विषये संड्याविषये च शास्त्रकारण।नां मतवेंभिन्न्यम् ।
महासिद्धिसारतन्त्रे तन्त्रज्स्त्रे त्रयाणां विभागानां कल्पना क्रियते-- रथक्रान्ता, विष्णुकान्ता, अदवक्रान्ता चेति । तत्र स्वदृष्टिभेदेन प्रत्येकस्मिन् विभागे चतुष्षष्टितन््राणि सन्ति। विष्णुकान्ताविभागे चतुष्षष्टितन््राणां विभाजनक्रमे ब्रह्मपापल (क्रमसं० ३०)-यामल (क्रमसं० ४२)-षद्रयामङ (क्रमसं० ४८)-सिद्धथामलानि (क्रमषं° ५९) दृदयन्ते । रथक्रान्ताऽदवक्रान्ता- विभागयोनं कस्यचन यामलस्योत्लेखः ।
१. नित्याषोडशिका्णवः, सं०--त्रजवल्लभ द्विवेदी, भूमिकायाम्, प° ४३ २. तान्त्रिक साहित्य : गोपीनाथ कविराज, भूमिकायाम्, पृ० १९
३. तत्रव, भूमिकायाम्, पृ० २०
४, नोटिसेज् आफ संस्कृत मैनुस्करिष्ट ब।ई राजेन्द्रलाल मित्र, सं०--३.८६ ५. मङ्खलाचरणे, रलो ०--३
६. तान्त्रिक साहित्य : भूमिकायाम्, प° २३
र क चक्र ष्कच्ककक् ऋ 57 ` ऋ क
(र ।
ब्रह्मयामले १९तमेऽध्याये पीठानुस्ारं तन्त्राणां ५ क्रियते, यथ) विद्यापीठ-मन्त्रपीठ-मुद्रापीठ-मण्डलपीठानीति । तत्र विद्यापीठेऽष्टयामलानि सन्ति। तानि यामलानि रद्र-स्कन्द-ब्रह्म -यम-वायु-कुतेर-इन्द्रनामभिः स्था तानि+। जयद्रथयामले प्रथमे षट्के ४ १ततेऽध्यायेऽष्टप्रकाराणां यामलार्ना विवरणं दत्तम् । तत्राष्टयामलानां मूलं ब्रह्मय मलमिति कथ्यते । अन्येषु यामलेषु श्द्रयामल-पमयामल-वायुयामल-इन्् यामानि तत्रोपलभ्यन्ते । जयद्रथयामले ३६तमेऽध्याये विद्यापीठस्य तन्त्राणां विवरणं दत्तम् । तत्र सद्रयामल-विष्णुयामल-ब्रह्मपामल-हरि ( यामल \-स्कन्द( यामल )-गौतमीय- यामलानि प्राप्यन्ते * ।
सम्मोहनतन्त्रस्य षष्ठेऽध्याये जञैव-वैष्णव-गाणपत्य-सौ रादिभेदेन तन्त्रा दीनां यद्विवरणं प्रस्तुतम्, तत्र यामलग्रन्थानामपि विवरणं दत्तम् । वे भेदे द्व यामले, वैष्णवे एकं यामलम्, सौरे चदे यामले तत्र दुश्यन्तेउ । सवं विद्यानिधान- कवीन्द्राचायंषरस्वती षं कलितेग्रन्थसं प्रहे वैदिकतन्तराणां सूच्यां यामलाष्टकतन्त्र- मस्ति । तत्र मन्त्रशाश्त्रप्रकरणग्रन्थसूच्यां इद्रया मल-विष्णुयामल-ब्रह्मयामल- दविवयामल-देबीयामलानां च उल्लेखो वतते " । अनूपपुस्तकाल्ये चन्द्रोन्मी- लनग्रनये९ सद्रयामल-ब्रह्मयामल-विष्णुयामल-उमायामल-बृदयान > नि उद्धरण- रूपेण दृश्यन्ते । राजेन््रलालमिव्र शूच्यां समयाचारतन््र तन्त्र-यामलादीनां. संख्यानिर्देशो वर्त॑ते । वाराहीतन्वस्य पाण्डुच्प्यामपि यामानां संख्याः, अवान्तरभेदाः, इोकसंख्याः, लक्षणानि च वण्येन्ते इति पूर्वंमेवास्माभिः सूचितम् ।
करौलसाहित्यस्या चा रप्रतिपादकेषु ग्रन्थेषु हद्रयामङं देवीयामलं च प्राप्यते । रुद्रयामजे म्रीयामर-विष्णुधामल-शक्तिपामल-तरह्मयामलानि व्यन्त । तत्र रुद्रयामलमेव तेषां यामलानामुत्त रकाण्डस्वलूपं मन्यते । अत एव प्रतीयते यदिदं यामलं सरवप्रचछितं सवंसमथितमिति ।
एवं च षडाम्नायतन्त्रे चतुविधयामलम्, वाराहीतन्त्रे षडविधयामलम्, नपरतिजयचर्यास्वरोदये सक्तविधयामलम्, श्रीकण्डीसंहिताभ्रभृतिषु चाष्टविधं
1 ता 3 १, स्टडीज इन तन्त्राज : पी ०सी ° बागची, प° ६
२. तान्त्रिक साहित्य : भूमिकायाम्, १० २४ ३. तत्रैव, प° २४ | ४. तत्रैव परिशिष्टे, प° ७३८
५. तत्रव, पु9 ७४०
६. मातृका सं ०-१२६३
1. यामलमित्युक्तिः प्रायो वादमात्रम् । विशिष्टश्रकाराणां तन्त्राणां संज्ञा यामल- मित्येव वक्तं युज्यते, संख्यानिर्धारणं तु दुःशकम् । मृद्रितरूपेण सात्ुकारपेण वा यानि यामलानि समूलभ्यन्ते, तत्र यामल्लक्षणं घटते न वा? इति परीक्षणी- यम् । किञ्च, तेषां स्वकीयं वंशिष्टचयमिति वतंते साम्प्रतं गवेषणाया विषयः । ||| एतावता पूरा अष्टयामलपक्नो बहुप्रचारितं आसीदिति प्रतीयते । गच्छता ॥। कालेन नामविषये संख्याविषये च महान् विसंवादः समजायत । फलतः
| साम्प्रतमस्मद् गवेषणानुस्ारं ७० संख्यकानि यामलनामानि प्राप्यन्ते । एतेषां
यामलानां यावदुपलञ्ध्रः परिचयो म या प्रस्तूयते--
१--अघोरयामलम् ~ न्यूकैटलागस केटलायरम्' ^ सूच्यामस्य यामल्स्य
विवरणं दत्तम् ।
|| २--असिताङ्गादियामलम् --केत्कारिणीतन्त्रेऽस्य यामलस्य विवरणमुद्धरण- | रूपेण प्राप्यते २ । | | ३--अथवंगयामलम् -श्रीकण्ठीसंहितायां वणितेषु चतुष्षष्टयद्रं तागमेषु यामलाष्टकेष्वस्य विवरणं दत्तम् । | | ४--आदियामलम् - न्यू कटलागस केटलागरमुः सूच्यामस्य- यामलस्य
॥ विवरणं दत्तम् । एतदतिरिक्तं नरपतिजयचर्यानुसारं वणितेषु सप्तयामले- । ष्वस्य चर्चा क्रियते । उद्धरणल्पेण तन्त्रसारे, नक्षत्रसमुच्चये, आगमततत्व- | विलाप, सदाशिवजृतज्योतिनिबन्धे, कोश लागमे, शिवराजकृतज्योतिनिब- | न्धसारे, लक्ष्मीधर रकृतसौन्दयं कह रीटीकायामृपलभ्यते ।
॥ ५--आदित्ययामलम् --तन्त्रसारे, पुरइ्चयणिंवे, नक्षत्रसमृच्चये च अस्थो- ॥ । ल्लेवो वतते । "कंटलागसकेटलागरम्'* सूच्यामिदं यामलं "आदि-
। | यामलम्' इति नाम्नाऽभिहितमस्ति । | ६ --इन्द्रयामलम्-ताराभक्तिसुधाणेवेऽस्योल्लेखो वतते ।
॥ ७--ईदव रयामलम् - अस्य बगलामुखीपञ्चाङ्घमाव्रं प्राप्यते । विवरणमिदं ॥ जम्मूस्थितरघुनाथमन्दिरपु स्तकाल्यसूच्यां ^ वतंते । | ८-उमायामलम्-नक्षत्रविज्ञानस्य स्रोतो भ्रन्थोऽयम् अनुपपुस्तकाल्ये बीकानेर । "चन्द्रोन्मीलन' इति नाम्ना प्राप्तः । दामोदरछङृततन्रचिन्तामण्याम्,
१. प्रथमे खण्डे (द्वितीये संस्करणे), प° ५७ २. कैटलागस कटलागरम् : भाग १, प° ३७ ३. भाग २, प° ८६ ४. भाग १, प° ४५ ५. पत्राङ्क--४८५१
१
शिवदासङ़ृतज्योतिनिबन्धे चास्य उद्धरणानि प्राप्तानि। “एशियाटिक सोसायिटी आफ बंगा'पुस्तकाल्येऽस्य परमरिवसहस्रनामस्तोत्रमात्रं प्राप्तम् \ । यामकाष्टकेऽयं ग्रन्थोऽन्यतमो वतते । स्यू कंटलागस केटलागरम्' सृच्यामस्य विवरणं दत्तम् २ ।
९. कल्पसूत्रयामलम्--योगिनीतन्व ऽभूमिकायामुल्लिचितमिदं यामलम् । नास्ति किञ्चिद् विवरणमन्यत्र ।
१०. कालीयामलम् --चन्द्रशेखरकृतकुलप्जनचन्दरिकायाभिदं यामल- मुद्धरणरूपेण प्राप्तम् । महाविद्याक्रमस्य सवं प्रयमदेव्याः काल्यास्तत्त्वबोधाथं- मयमुत्कृष्टो ग्रन्थः ।
११. कालोत्तरयामलम् - योगिनीतन्तरभरूमिकायामस्योत्लेखो वतते ” ।
१२. कुबेरयामलम् -भैरवपरम्पराया ग्रन्थोऽयम् । यामलस्यास्य विवरणं नेपालस्थिते दरवारपुस्तकाल्ये ब्रह्मयामलान्तगंते सोतोनिणंये प्राप्यते । श्य् कैटलागस कौटकागरम्' सूच्यामस्य विवरणं दत्तम् ° ।
१३. कुल्यामलम्-- "तन्त्र ओौर आगमो का दिग्दशंन' इति ग्रन्थे (पृ० ४५) म म° गोपीनाथकविराजमहोदयेनोक्तं यदयं कुलसाधनाया उपजीव्यो ग्रन्थोऽस्ति । न्यु कौट ० कट ०'सूच्यामस्य विवरण दत्तम् ।
१४. कूमंयामलम्-- नरयतिजयचर्यास्व रोदये, विइवप्रकाशपद्धत्याम्, राङ्क रकृतशिरोमण्याम्, शिवदासङृतज्योतिनिबन्धे, शिव राजकृतस्वररा स्त्रसारे चास्य यामलस्य चर्चा उद्धरणल्पेण प्राप्यते । स्वतन्त्रा मातृकाऽस्य नोपलन्धा । ^्यू कौट ० कौट ० सूच्यामस्य विवरण दत्तम्“ ।
१५. कृष्णयामलम्--ग्रन्थस्यास्य विवरणं प्रस्तावनान्तगेतं द्रष्टव्यम् ।
१६. गणेशचयामलम् --अष्टयामदेष्वस्य चर्चा प्राप्यते । त्रिवेनद्रमविरव- विद्यालयस्य पृस्तकाच्येऽस्य गणेशऋणहरस्तोत्रमात्रमुपलभ्यते । न्यू कंट० कौट ०" सूच्यामस्य विवरणं दत्तम् ।
१. स०्-६ ७४४
२. भाग २, प° ३९५
३. योगिनीतन्त्रम् : सं ° -विर्वनारायण शास्त्री, भूमिका पृ° १९ ४. तान्त्रिक साहित्य : भूमिकायाम्, प° २६
५. सं ०--विइवनारायण शस्त्री, भूमिका प° १९
६. भाग ४, प° २५४
७. तत्रव; पृ० २३९
€. तत्रव, पृ० २६८ ९. भाग ५, पुर २८०
। । |
(प
१७. गुरुयाम चम् -- न्य् कैट० कट ०*१ सूच्परामस्योल्लेखो वतते । एतद- ¶तिरिकतं रजेन्द्रलालमित्राणां संस्कृतग्रन्थानां विवरणेषु इदमुक्त' यद् गुरुगीता- नामकम्रन्थ गुषटयामलतन्त्रान्तगैतं वतते । ग्रन्थेऽस्मिन् गुरुगीताया ऋ षिइछन्द - देवता-वीज-शक्ति-कीलकादीनां वर्णनमस्ति। गुरुराजस्य स्तुतिम॑ंहिमा च विशेषरूपेण वण्यंतेऽस्मिन् तन्तरगरन्थे, हरगौ रीसंवादरूपेण गुरुप चा ङ्गस्य विवरणं च प्राप्यते । अस्मिन् श्रीगुरुपटलम्, गुरुनित्यपूजापद्धतिः, गुरुकवचम्, गुरुमन्त- गर्भसहसरनाम, गुरुस्तोत्रं च सन्ति ।
१८. गौतमीययामलम्--जयद्रथयामलस्य यामलाष्टकेऽस्योल्लेखो वतंते । अस्य मातृका उद्धरणं वा नोपलभ्यते ।
१९. गौरीयामलम् - न्यू कैट० कंट०'* सूच्यनुसारमस्य यामटस्या- नेका मातृकाः समुपलभ्यन्ते । नरपिहकृतताराभक्तिदुधाणैवे, पु रङ्च्यणिंवे चा- स्योत्टेखो वतते । कालीसहस्राक्षरीमन्तरः शिवपञ्चाङ्खं चाध्यान्त्गंतौ । बड़ौदा पुस्तकालयसूच्यनुसारमस्यान्त्गतं समयाचारतन्त्रं २८६३खोकात्मक वर्तंते ।
२०. ग्रहयामलम्- नक्ष त्रपूजाया प्रन्थोऽयमष्टादशपटलेषु विभक्तोऽस्ति । श्राणतोषिणोतन्त्रेऽस्योट्येखो वतते । ग्रन्थस्यास्यानेका मातृका उपलब्धाः । (ट्ण्डिय्रा आफिप, लन्दन' पुस्तकाल्ये* प्राप्तायाः पाण्डल्िप्या व््यंविषया एवं सन्ति-श्रीसवितृविद्यादितान्त्रिकवैदिकसन्ध्याविधिः, अभिषेकविधिः, क्षेत्रा दिषड्वरगदृष्टिफलम्, राशीनां शीलादयः, अष्टादशविधानादयः, पथ्यापथ्य- विवेकः, प्राणायामविवेकः, दशमहामुद्राविवेकः, समाधिविधिः, वास्तुग्रहः, द्विजप्रकरणविवेकः, ग्रहचरितादिनिणंयः, जगद्दुलंभाक्षयकवचमित्येवमादयः राजेन्दधलालमित्राणां संस्कृतग्रन्थानां विवरणेषु अस्य चर्चा उपलभ्यते । ल्यू० कैट० कट ०› सूच्यामस्य विवरणं प्राप्तम् ` ।
२१. चन्द्रयामलम्--नवमीरसिहकृततन्त्रचिन्तामण्याम्, ताराभक्तिसुधाणेवे. चास्योल्छेखो वर्त॑ते । न्यू कौट० कैट ०" सुच्यामस्य विवरणं दत्तम्. ।
१. भाग ६, प° ७९ २. भाग ६, प्र २४१ ३. सं ° - ५६६४ ४. सं ०-- २६३२ ५. भाग ६, प° २५७ ६. भाग ६, प° ३६५
=.
२२. चिदम्बरयामलचक्रम्-- न्यू कंट०ः कैट० सूच्यामस्य विवरणं दत्तम् ।
२३. जयद्रथयामलम् २--जयद्रथयामलस्य २४००० दलोकात्मकस्य मातृका नेपालदेशे समुपलन्धा । तदभिन्न एष ग्रन्थो भिन्नो वेति न साम्प्रतं किमपि वक्तुं शक्यते । एतदर्थ न्यू कट ०कंट० (भाग ८, १०१७ ९) इत्यत्र विवृता मातृका परीक्षणीया । पिङ्खलामतं जयद्रथयामलं चत्रह्मयामलस्य परिशिष्टे इति प्रतिप दयति डा० बागचीमहोदयः स्टडीज इन दि तन्त्राज' ( पृ० ७) इत्यत्र । जयद्रययामलमेव शिरदछेदनाम्नाऽपि प्रसिद्धचतीति तत्रव ( प्र ८) प्रतिपादयति सः । श्रीकण्डचां शिखाष्टकेषु शिरश्छेदस्य परिगणनं दृरयते । अत्र च _ -.भैरवस्लोतसि विद्यापीठे शिरर्छेदे श्रीजयद्रथयामलमहातन्तरेः इत्येवं पुष्पिका वतते । ने वी° (भाग १, प्ृ९ २४३) इत्यत्र “पिङ्खलामते जयद्रथा- धिकार" इत्येवं पिङ्गलामतमातृकापुष्पिकावाक्येषु दृशयते । एष एव ग्रन्थो नारायणकण्ठेन स्मृतः स्यात् । पिद्कलामतं दीवोपागमेषु श्रीकण्ठीपतितेषु. चतुष्षष्टितनत्रेषु च दश्यते ।
२४. जयप्रदयामलम्-- न्यू कंट० कंट०ः सूच्याम्य विवरणं दत्तम । जयद्र थयामल्मेव लिपिकारदोषाञ्जयप्रदय।मलं संजातमिति प्रतीयते ।
२५. जाम्बुयामलम् -- भारद्राजकृतजाम्बुयामलसूनम् ( देवीयासलसूत्रम् .) एव यामलस्प्रास्यान्तर्गेतं प्राप्यते । न्य् कट० कँट०' (भाग ७, प° २४४). इत्यत्र विदृता मातृका परीक्षणीया ।
२६. ज्ञानयामलम् -मन्तरमुक्तावल्पामस्य यामलस्य चर्चा प्राप्यते । न्यू कैट० कैट०' (भाग ७, प° ३३३) इत्यत्रत्यं विवरणमपि द्रष्टव्यम् ।
२७. तत्व यामलम् -- रामेर्व रतत्वानन्दकृतप्रबोधमि हिर) दये ( शकाब्दे १५९७ रचिते ) ग्रन्थेऽनेकेषां ग्रन्थानां वचनानि उद्धृतानि । तत्र तत्त्वया. मलतो गृहीतानि च वचनान्युदधूतानि सन्ति ।
२८. तन्त्रसारधतयामलम् --अस्य यामलस्य मातृका नोपलब्धा । मातृका-- मेदतन्त्रे ४ अस्य यामलस्योद्धतानि वचनानि दृदयन्ते ।
१. भाग ७, प° ५०
२. विवरणमिदं लुप्तागमसंग्रहस्य द्वितीयभागस्य भूमिकामाश्रयति-- ले०-- व्रजवत्लभ द्विवेदी, प° ३४
३. भाग ७, प° १८३
४. सं० चिन्तामणि भद्राच्ायेः, एकादशपटके, रिप्पण्याम् पृ° ६३.
[ + ¬
२९. दत्तात्रेययामलम् -पूरदचर्याणेवे१ दीक्षाप्रकरणे स्मृतोऽयं यामल- श्रन्थः । मातृका नोपरब्धा ।
३०. दीपिकायामलम्-- योगिनीतन्त्रग्रन्थस्यरः भूमिकायामागमतत्त्व- 'विलासवणितानां तन्त्राणामेका सूची प्रकारिता । अस्यां सूच्यामस्य यामङ्स्य सूचना प्राप्यते ।
३१. देवीयामलम् 3 ( देव्यायामलम् )--तन्त्रालोक (२२.३१) प्रामाण्येन ज्ञायते यदीशानदिवः श्रीदेव्यायामलीयोक्तितत्वसम्यक्प्रवेदक इति । ईशान- -शिवोऽयं सिद्रान्तजै वाचयं; । तेन सिद्धान्तक्ञं वागमस्य ग्रल्थेनानेन भाव्यम् । द्यन्ते च भूयांसि वचांसि तन्त्ाोके तद्विवेके च क्र मकुलदशंनप्रतिपादिकानि । डं ° रस्तोगीग्रन्थे (प° ७३-७४) च क्रमदशंनस्य विशिष्टसम्प्रदायस्य प्रतिनि- धिभूतोऽयं ग्रन्थ इति प्रतिपाद्यते । शतरत्नसंग्रहे देव्यामत मूत्रं स्मयंते । देवी मनं चन्द्रज्ञानागमस्य उपागमतया स्मर्यते श्ंवागमग्रन्थेषु । देवीमतं लक्ष्मीधरेण चतुष्षष्टितन््रेषु परिगण्यते । देव्यायामल उक्त तद् द्रापञ्चाशाह्वं आ्धिके ( २८.३९० ) इति तन्त्राङोकप्रामाण्येन विस्तृतोऽयं ग्रन्थः प्रतीयते । तेनेदं -संभावयितुं शक्यते यदस्मिन् बरृहदूभ्न्थे सिद्धान्त-भेरव-क्रम-कुलग्रभृतयः सवं सिद्धान्ता यथाप्रस ङ्ख विता स्युरिति, ईशानशिवेन चात्र काचन व्याख्या कृता स्यादिति । वं रोचनेन ( प्र स०, २.१७८ ) प्रतिष्ठातन्तरेषु परिगणित- मेतत् 1 देवीयामलं ( देव्यायामलम् }, देवीमतं ( देव्यामतसूत्रम् } चा्भिन्नं -भिन्नं वेति निणंयस्तु मातृकोपलब्ध्यनन्तरमेव स्यात् । न्मु कंट० कंट० भाग २, प° १५१ इत्यत्रत्थं विवरणमपि द्रष्टव्यम्, देवीमत( भाग ९, प्र° १४१) "विवरणं च, तान्त्रिक पताहित्य, (प° ३१८) इत्यत्र देव्यागमतन्व्रविवरणमपि । एतदतिरिक्तं नित्योत्सवे । प° १२४), स्वच्छन्दतन्त्रे दशमे पटले (पृऽ १३२, १३९), नरसिहृकृतताराभक्तिसुधार्णंवे, शिवानन्दकृतकुलगप्रदीपे, विद्यार्णेवतनत्त्रे, कतिपयस्तोत्र्रन्थेषु, तारारहस्यवृत्त्ादीषु म्रन्थेष्वस्योल्लेखो वर्त॑ते । दक्षिण- कालिकाम्बास्तोत्रमस्यांशरूपेण कल्प्यते । म० म० गोपीनाथकविराजमहो- -दयानुसारं कौलसाधनाया उक्कृष्टो ग्रन्थोऽयम् । एष प्रन्थः कामीरस्य तान्तिकैः सम्मानितां निर्देशितां परिचालितां च गरुपरम्परां निरिचतरूपेण प्रस्तौति ।
३२. देवीयामलसूत्रम्- न्यु कंट० कंट० (भाग ९, प° १५१) सूच्यामस्व विवरणं दत्तम् । एतच्च देवीयामलादभिन्नमेव स्यात् ।
१. प्रकाराकः चौखम्भासंस्कृतप्रतिष्ठान, वाराणसी, (१९८५ ई०); पृ० ३९ २. प्रकाशकः लक्ष्मीवेङ्कटेदवर प्रेस, बम्बई , -३. विवरणमिदं टृप्तागमसंग्रहस्य द्वितीयभायस्य भ्रूमिकामाश्रयति, प° ४१
[ऋ )
३३. नीलतन्त्रादियामलम्-- अस्य यामलस्य मातृका नोपटन्धा । मातृकाभेदतन्तरे+ उद्धरणरूपेण दृश्यते ।
३४. नवरल्नेदवरयामलम् -न्यू० केट० कंट० (भाग ९, पृ ४०१) - सूच्यामस्य विवरणं दत्तम् ।
३४. पश्चयामलम् ~~ शिवानन्दकृतकुलप्रदीपे यामलमिदमृद्धतम् । न्यू - कैट० कौट० ( भाग १०, प° ४५ ) सूच्यामस्य विवरणं दत्तम् ।
३५. पञ्मीयामलम्--पूर्णानन्दगिरिकृते व्यामारहस्ये* ( पृ° १५१ ) इदमुष्किखितम् । अत्र नवमपरिच्छेदे कुण्डगोलोद्धवादिग्रहणविधिप्रसङ्खं गरन्योऽपमुद्धूतः। एतदतिरिक्तं ॒श्रोविद्याचँनचन्दरिकायां शिवानन्दभदटरैन ` उद्धृतमिदं यामलम् । न्यु कंट कौट० (भाग १०, प° ४५) सूच्यामस्य मातृका परीक्षणीया ।
३७. ब्रह्मयामलम् 3-- डं बागचीमहोदयेन ब्रह्मयामलस्य विस्तृतः परिचयः समुपस्थापितः। अस्यानेका मातुकास्तान्वरिकसाहित्ये (पृ° ४२९-३०), ने° वी० भाग २ (प° १८-२३), आपफरक्टसूच्याम् (भाग १, प° ३८२), (भाग २, पृ ८६), (भाग ३, प° ८१) इत्यत्र विदृताः सन्ति। पुष्पिका वाक्येषु--“भैरवस्रोतति विद्यापीठे पिचुमते द्रादश्साहसिके" इत्यादीनि विरेष- णान्यस्य दुदयन्ते । चतुष्षष्टितन्तरेषु परिगणितेषु यामलाष्टकेषु, श्रीकण्ठीपठित- चतुष्पष्टितन्वरेषु, विष्णुक्रान्ताविभागे चास्य नाम वतते । तन्वालोके ४.५४; ४.६०; ५.९७ इत्यत्रापि यामलमेतत् स्मयते । पिचुशास्वर १८५. इलोका अत्र द्रष्टव्याः ।
३८. बृहदत्रह्मयामलम् - न्यू कंट० कंट० (भाग ३, प° ८४)सच्यामस्य विवरणं प्राप्यते ।
३९. ब्रह्माण्डयामलम्-आपफेक्टसूच्याम् (भाग १, प° ३८८} अस्य विवरणं दत्तम् । अस्यान्तगेतं पञ्चमीसाधनमात्रं प्राप्यते । अत्र हर-गौरीसंवादसूपेण मुक्तिप्राप््य्थं विवरणमस्ति । पञ्चमीविद्या पञ्चकूटरूपास्ति । मद्य-मांस- मत्स्य-मुद्रा -मैथुनानीति तानि सन्ति पञ्चसाधनानि ।
४०. ब्रृहदर्द्रयामलम् -म० म० गोपीनाथकविराजकृते तान्त्रिकसाहित्ये (प° ४२६२७) यामलस्यास्य विवरणं दत्तम् । तदनुसारमत्य मातृका एल्ियाटिक सोसायिटी आफ बंगाल-पुस्तकाल्ये प्राप्यन्ते । डं° हरप्रसाद-
१, सं०--चिन्तामणिभदाचार्याः, तृतीये पटले, टिप्पण्याम्, प्रृ° १३
२. द्वितीये संस्करणे. १८९६ ई०, सं °- जीवानन्द विद्यासागर । ३. टप्तागम्षग्रहः ; सं ° -व्रजवल्लभद्विवेदी, द्वितीयोभागः, प° ५१
( १६ )
+॥ | ॥#,
8 क | 2
| शास्त्रिमहो दयानां संस्कृतग्रन्थविवरणेष्वस्य यामलस्य सूचना मल्ति। न्यू
| कँट० कौट० सृच्याम् (भागर, प° १) बृहद्यामलतन्तरस्यांश एव गायत्रीकव- चमिति सूचितम् ।
४१. बिन्दुयामलम् -- आक्र कटनवृहत्सुच्यनुसारं ( भाग १, प° २७ ) यामटस्यास्य विवरणं द्रष्टव्यम् ।
४२. बुद्धयामलम् --बीकानेरपुस्तकाल्यस्य सूच्या “चन्द्रोन्मीलन नाम्नो ग्रन्थस्य विवरणं ४९ पटकेषु वणितम् । अस्मिन् ग्रन्थे पञ्चयामलाना- मुद्धरणानि विशेषेण दीयन्ते, यस्मिन् वुदधयामलमप्य स्ति ।
४३. भानुयामलम् ~ नरपत्तिजयचर्यायां स्वरोदये रादितुम्बुरचक्रस्य विवरणे रऽस्य यामलस्य चर्चा उद्धरणषूपेण प्राप्यते । मातृका नोपलन्धा ।
४४, भैरवयामलम् - कामकलाविलासचिद्वल्याम्, सौन्दर्यं लहरीटीकयोर- | रुणामो दिनी लक्ष्मी ध रयोडच यामलस्यास्य व चनानि संगरहीतानि । चन्द्रज्ञानवि- | दा[ऽस्यैव नामान्तरं प्रतीयत इति नि० उ०8§ प० २३ -२७ इत्यत्र द्रष्टव्यम् । भैरवतन्व्रस्य भैरवयामलान्त्गंतभ रवस्तवादीनां च मातृकाः समृपलन्यन्तः इति तान्त्रिकसाटित्ये (प° ४४९, ४५१ ) ` इत्यत्र द्रष्टव्यम् । काशी हिन्दू- विहवविद्याल्ये सी ५९१ मातृका संख्याका परीक्नणीया भेरवयामलस्य (प° ७६०), आपरेकटवृहत्सच्याम् ( भाग १, १० ४१५७ भाग २, पृ° ९५; भाग ३, पृऽ ९०) इत्यत्रत्यारच भ्ैरवतर्त्रस्य ।
| ४१. नैरवीयामलम्--दशभहाविदयाक्रमे भैरव्या रहस्योद्धवाटकानां
| विषयाणां विशिष्टतमो म्रन्योऽयम् । अस्य चर्चा. पुरदचर्याणे वादिषु ग्रन्थेषु वतते । अस्य मातृका अन्यत्र नोपलभ्यते । ॥। ८६. मातृयामलम् --आफ़र कटसूच्याम् (भाग २, प° ९७) अस्व विवरणं | वतते । | ७. भित्रयामलम्-तन्त्रसंग्रहे तृतीयभागे (प° ३५२ ) उट्किखितमस्ति । | ५८, यमयामलम् - जयद्र थयामले वणितेष्वन्येषु यामेषु चास्य चर्चा द्द्यते । मातृकारूपेणोदढधरणरूपेण वाऽन्यत्र नोपलभ्यते ) ४९. रत्नावलीकुलो इीशयामलम् उमानन्दनाथविरचिते नित्योत्सवेः
(पृ० ५) अस्य यामलस्य चचा समुपलभ्यते ।
| | १. मातृका सं °-- १२६३ ॥ । २. इलो ०-
| 1 । ॥
। न ॥ 4
२ ( १७ )
५०. रसयामलम् ~ अफरक्टसूच्याम् (भाग १, प° ४९५) अस्य मातृका निदिष्टाः । एत दत्िरिक्तं प्रयोगरत्नेऽस्य नाम दृदयते ।
५१. रुद्रयामलम् - डां °कान्तिचनद्रपाण्डयमहोदयेन “अभिनवगुप्त इति ग्रन्थे (प° ५५२-५५६) सद्रयामलस्य विस्तृतपरि चयः समुपस्थ) पितः । ्नैरव-भै रवी-उमा-माहेरवर-महादेव-पावेतीसंवादरूपैरस्य ग्रन्थस्य प्रदृत्तिः । अस्यानेका मातुकास्तान्त्रिकसाहित्ये ( प° ५६१-५६३ ); माफ़ कःसूच्याम् (भाग १, प° ५३१-५३२), (भाग २, प° १२४-१२५, २२२), (भागे भुर ११३) इत्यत्र विदृताः सन्ति । अस्य प्रसिद्धिः १२५००० इलोकात्मकत्वे- नेति । अनुत्तरोत्तरभेदतो विभक्तोऽयं ग्रन्थः । जीवानन्दविद्यासागरेण, सम्पूर्णानन्दसंस्कृतविडव विद्यालयेन चास्य ग्रन्थस्य कतिपर्येऽशाः प्रकारिता: । श्रीकण्ठीपटितचतुष्षष्टितन्तरेषु, लक्ष्मीधरसम्मत्या वामकेरवरतन्त्रपटितया- मलाष्टकेषु, भास्कररायसम्मत्या चतुष्षष्टितन्तरेषु, महासिद्धिसारतन्त्रानुसारं विष्णुक्रान्ताविभागे, ब्रह्मयामलतन्त्रीयविद्यापीठेऽष्टयामलेषु चास्य नाम वतते । उद्धरणरूपेण सौन्द्यंलदर्था लक्ष्मीधरीटीकायाम्, कुलगप्रदीपे, तारारहस्यदृत्तौ, ताराभक्तिसुधार्णंवे, आगमतत्वविलासे, सर्वोह्लासतन्त्रे, कालिकासपर्याविधौ, आनन्दलहर्याम्, तत्व बोधिनीटीकायाम्, तन्त्रसारे च ग्रन्थोऽयमूत्लिखितः । एशियाटिक सोषायदटी आफ बंगाल-पूस्तकाल्ये रंद्रयामलमतोत्सवतन्त्रस्य (सं ०.५८५८) मातृकोपलब्धोमामहेरवरसंवादरूपेण ।
५२. श्द्रयामरसारः ( मुद्रितः })--अभिनवगप्तेन रद्रयामलसारनाम्ना संगृहीतः शलोकार्धो विज्ञानैरवे ‹इलो० ९३) दृश्यते । “इद्रथामलतन्तरस्य सारमद्यावधारितम्' (इरो° १६०) इति विज्ञानभै रववचनमेवाभिनवगुप्तेन रद्रयामलसारनाम्ना संग्रहीतमिति वक्तुं शक्यते। एवं च रद्रयामलसार इति विज्ञान ए्वस्यैव नामान्तरम् ।
५३. रुर्यामलम् --श्वीकण्ठीसंहितायां वणितेषु चतुष्षष्टितन्त्रेषु याम- लाष्टकान्तर्गेतमुद्धतमस्ति ।
५४. लक्ष्मीयामलम् -भास्कररायसम्मत्या चतुष्ष्टितन्त्रेषु यामलाष्टकेषु चास्योत्छेखो वर्तते ।
५५. वामकेरवरयामलम्--मातृकाभेदतन्त्र सप्तमे पटले ( उलो० ३) उद्धूतमिदं यामलम्।
५६. वायुयामलम्--जयद्रथयामले वणितानामन्येषां यामलानां चर्चा दुश्यते । तत्रास्योल्लेखो वतते । मातृकारूपेणोद्धरणरूपेण वाऽन्यत्र न कल्पते ।
५७. विष्णुयामलम्-- स्पन्दप्रदीपिकरायामूत्पलवेष्णवेनास्य शलोकं संगर हीतम् । यामलाष्टके तदेतत् परिपठचते सरवंत्र श्रीकण्डचामपि च । ज्योत्स्ना-
( १८ )
टीकासहितस्य विष्णुयामलस्य मातृकाः ता० सा० ( पृ° ६०० ), आफ क्ट- सूच्याम् ( १, पृण ५९२; २, पृ २२६; ३, प° १२४ ) इत्यत्र विवृता उवतश्लोकद्रयान्वेषणपुरस्तरं परीक्षणीयाः । एतदतिरिक्तं नित्योत््वे ( पृ° १२४ ), ताराभक्तिपुधाणेवे, सर्वोह्ल्लासतन्व्रे, रूद्रयामलतन्त्र, आचाराकंप्राण- तोषिणी संग्रहे, श्रीकालिकानन्दस्य शिष्येण जगन्नायेन रचिते क्रमदीक्षाग्रन्थे चास्य वचनान्युद्धृतानि ।
५८--विङ्वयामलम् -यामलस्यास्य चर्चा चण्डीपत्रिकायां ( सितम्बर- अक्टूबर, १९८०, प° ६ ) क्रियते । श्रीदक्षिणामूतिविरचिते उद्धारकोशेऽ- व्यस्य यामलस्य इोकद्वयं प्राप्तम् (पृ० ६०, ७१) । काशीस्थसरस्वतीभवन- पुस्तकाल्ये वगलामूखी षहलनाम १९६९० संख्यकमातृका विडवयामलादेव प्राप्यते ।
५९. वीरयामलम्--यामलमेतद् विज्ञानभरवविदृती शिवोपाध्यायेन स्मृतम् । यापलाष्टकनामावलीषु तु कुत्रापि नामाञ्स्य न द्रयते । तान्त्रिकसा- हिव्ये ( प° ६०४ ) इत्यत्र वीरभद्रयामल विब्रतं वतंते ।
६०. वेताल्यामलम् -श्रीकण्टीसंहितायां भेरवाख्येषु चतुष्षष्टितन्त्रेषु यामकाष्टकान्तगंतमिदं दृश्यते ।
६१. शक्तियामलम्- आफ क्टसूच्याम् (भाग १, पर ६२३) भस्य याम- लस्य विवरणं दृश्यते । एतदतिरिषेतं नित्योत्सवे ( प° १७० ), रुद्रयामले, शक्तिरत्नाकरे, परदचर्याणंवे, तन्त्रसं्रहे ( तृतीये भागे, प° ३५२ )› तारा- भक्तिसुधार्णेवे, तन्त्रसार, दाक्तानन्दतरङ्किण्यामिदमूल्लिखितमस्ति । शक्ति- रत्नाकरे प्रन्थेऽस्य यामस्य वचनानि गृहीतानि ।
९२. शिवयामलम् - तन्व्रषं्रहे ( तृतीयभागे, पृ ३५२; दलो° ५९ ),
श्रीविद्या्णैवे (प्र० ३०) चास्योल्लेखो वर्त॑ते । आफ क्टसूच्यनुसारं `
( भाग २, प° २३० ) शिवयामले योगिनीदशाकथनमात्रमुपलभ्यते ।
६३. श्रीयामलम् -नेपालदेशे द रबारपुस्तकाक्ये ` रुद्रयामल्तन्त्रस्य एका मातृका ९३ पटलेषु बणिता । तत्र श्रीयामलमपि दश्यते । तदनुसारं श्रीयामल- विष्णुयामल-शक्तियामल-ब्रह्मयामलानामुत्तरकाण्डरूपं रूद्रयामल्मेव वर्तंते । स्वतत्त्रल्पेण यामलस्यास्य मातृका नोपलन्धा ।
९४ स्कन्दयामलम् - तन्त्रालोके ( २८.४३० ) गुरुपूजाप्रसङ्गं यामल-
मेतद् स्मर्तेऽभिनवगुप्तेन, त्रिकसारवचनेषु ( तत्रैव २३.७९ ) च तत् स्मर्यते । यामलाष्टकेषु तदेतत् परिर्चते । तान्त्रिकसाहित्ये ( प° ७१७ ),
१. सं०--२.२४६ (छ)
( १९ )
आफरे०° (भाग १, प्र° ७४३) इत्यत्रत्यं विवरणमपि द्रष्टव्यम् । प्राणतोषिणी- तन्त्र, श्री विद्याणंवतन्त्रे चास्योल्लेखो वर्त॑ते ।
६५. स्वच्छन्दयामलम्--श्रीकण्ठीसंहितायां भैरवाख्येषु चतुष्षष्डितन्त्रेषु यामलाष्टकेऽस्य यामल्स्य गणना ज्रियते। एतदतिरिक्तं महामोक्षतन्त्र, सौभाग्यभास्करे, सुभगोदये, योगिनीहदयदीपिकायामस्योल्टेखो वतंते ।
६९६ संकषंणीयामलम्--तन्त्रालोकविवेकेऽनामातपंणप्रकरणे प्रमाणतया स्परृतमेतद्यामलम् । यामल्नामावलीषु कुत्रापि न दुश्यतेऽस्य नाम ।
६७. संकेतयामलम् - आफरेक्टसूच्यनु सारं (भाग १, प° ६८४ } बीकानेर- स्थितेऽनूपपुस्तकाल्ये यामलस्यास्य मातृका उपलब्धा । मारण-मोहुन-उच्चाटन- "विद्रेषण- वशीकरण-स्तम्भनादीनां तान्त्रिकानां प्रतिपादनमस्मिन् ग्रन्थे दरयते ।
६८. सिद्धयामलम्--नित्योत्सवे, ऊष्णानन्दकृततन्त्रसारे, आगमतत्त्व- विलासे, मन्त्रमहार्णवे, श्रीविद्याणेवे, ताराभक्तिसुधाणंवे चास्योत्लेखः । आफ क्टसूच्यनुसारं (१, पृऽ ७१७; २, पृऽ १७१) इत्यत्रत्यं विवरणमपि द्रष्टव्यम् ।
६९. हरियामलम् -जयद्रथयामले उरि्लिखिते यामलाष्टके यामलस्यास्य गणना वर्तेते । नान्यत्र विचरणं प्राप्तम् ।
७०. हंषयामलम्-वाराणसीस्थे सम्पुणनिन्दसंस्कृत विश्वविद्यालये सरस्वतीभवनग्रन्थाल्ये एका्पूर्णा मातृका (ग्रन्थसं०-२६२३६) यामलस्या- स्योपरूञ्धा । ग्रन्थेऽस्मिन् ९५५ लोकाः सन्ति । नान्यत्र कापि मातृका समुपलब्धा ।
यामलग्रन्थानां विवरणेनानेनेदं निश्चेतुं शक्यते यद् यामलाष्टकेषु पठितानि यानि यामानि, तेभ्यो भिन्तान्यपि सन्ति बहूनि यामलानि। एवं च यामलगम्रन्थानासपि वरततंते विशालं वाङ्मयम् । एतदन्तगं तमेव वतंतेऽस्माकं कृष्णयामलम् । स्वेप्रथमास्य प्रन्थस्य प्रत्यध्यायं वणितानां विषयाणां संक्षिप्तः परिचयः समूपस्थाप्यते--
कृष्णयामलस्य संक्षिप्तः परिचयः प्रथमाध्याये मङ्खलाचरणानन्तरं ब्रह्य णत्राह्यण्योः संवादरूपेण श्रौ कृष्णया- मलतन्त्र प्रतिपादयितुभिच्छर्नारदो ब्राह्मण्याः शुद्धकुलोद्भूतत्वं प्रतिपादितवान् । दिव्यं भौमं भौतिकं चेति वृन्दावनं त्रिविध्रमत्र वण्यते । एतत्प्रस ङ्ख कृष्णस्यैव प्रतिभूतिः श्रोमत्पुरुषोत्तमसंजञमा इन्द्रद्युम्नेन स्थापितेति उक्तम् । तत्तु परी- जगन्नायपरकसिति मन्यते । अपारभतपाथोधि तत्तुकामा ब्राह्मणी परम-
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॥ ३०
भागवतं दृत्यन्तं मोदयुतं पति पृष्टवती । तत्र नवंविधभक्तिमध्येऽच॑नारूपां भक्तिं प्रतिपादयितुं ग्रन्थस्य सन्दभं इति प्रतिभाति। अतएव पूवमेव “गोविन्दनाम' ( १.३. ख ) इत्यारभ्य (ज्ञानविज्ञानसम्पन्नम्' ( १.८. क )} इत्यन्तं वक्तुविशेषणजातं दत्तमस्ति । एवं वक्तुः श्रोतुश्च शापश्रष्टत्व मुक्त्वा वक्तृगतवं शिष्टचं प्रतिपाद्य ग्रन्थगतगुरुत्वमपि प्रतिपादितं वतंते ।
द्वितीयाध्याये भूगोलं वर्णयति ब्राह्मणब्राह्यणीसंवादरूपेण नारदः । सर्वा- घारभूता ब्रह्मशिला प्रथमा, आधारशक्तिस्वरूपिणी परामूतिद्ितीया, तदूर्ध्वे च महाकूर्मोऽशावताररूपः, तदनन्तरं पातालादिसप्तभरविवरा बणिताः । वितले मत्स्यरूपी जनादेनः, अतले च हयग्रीवः, तदनन्तरं उवेतवराहः, तदृ्वं शेष इति । भूमौ आधारभूतानां सत्त्वानां वणनम् । अत्र चरिकोणा पृथिवीति विज्ञेष उक्तः । तदनन्तरं प्रत्येकस्मिन् वर्षे पृथक्पृथक् तिष्ठतो भगवतः श्रीकृष्णस्य व्यूहभूतस्याचनं मन्त्रश्चोक्तः तन्त्रपुराणादिष्वपि बणितप्राय एव । अत्रापि भारतवषें वतेमानानां पवेतानां नदीनां च विशेषेण माहात्म्यं बणितम् । तदनन्तरं सप्तद्वीपानि यथायथं वणिताति सन्ति। मेरोः पूर्वदिग्भागे क्षीरा्णेवे चतुरोमासान् हरिः सुप्तस्तिष्ठति । शुद्धोदकस्य समृद्रस्य उत्तरे तीरे सवेत- नाम्नि पवते लक्ष्मीसहायो विष्णुस्तिष्ठति । एष एव उवेतद्रीपः । यद्यपि भारत- वर्षं कमेक्षेत्रमिति वर्णितं पुराणेषु, तथाप्यत्र भूर्लोकः कमंभूमिस्च राजसानां महात्मनाम्' ( २.९२. ख ) इत्यनेन भूर्लोकिमाव्रं कर्म॑भूमिरिति प्रतिपाद्यते । तदनन्तरं ऊरध्वंलोकवर्णनप्रसङ्खे वृक्षाग्राद् महीतलात् प्ाशद्योजनोरध्वं पिशाच- लोकः, पञ्वाशत्सहतर योजनान्ते गह्यकलोकः, तदनन्तरं पच्वाशद्योजनान्ते गन्धवंलोकः, तत॒ उपरि साद्धंलक्षान्तेऽक्षरलोकः, ततो लक्षत्रयोध्वं योजने यमलोको वणितः । ततो लक्षयोजनोध्वं भुवलकिः यस्मिन् बलिना याचितो लक्ष्म्या सह विष्णुर्वामनरूपेण वर्त॑ते । भुवर्छोकिस्य सीमान्ते बणितः सूयंलोकः। सूर्यो गायत्रा *आकृष्णेन ०" इत्यादिवं दिकमन्त्रैदचोपास्यमानः शोभते । तदुपरि सुमेरोः पूवंदिग्भागे वर्णितः स्वगंलोकः। सवंमन्यत्र वणितप्रायम् । स्वगं लोकाद् लक्षद्रयादूध्वं चन्द्रलोकः। तदुपरिष्टाद् नक्षत्रमण्डलम् । ततो द्विलक्षे बुधः, काव्य{( शुक्र )दच, ततो द्विलक्षे सुरेज्यः ( बृहस्पतिः ) । ततो लक्षत्रये सौरिः, ततो लक्षद्रये सप्तषंयः, तत ऊर्ध्वं पच्चलक्षे ध्रुवः । भुवर्लोकादारभ्य
आध्रुवं स्वगंलोक इति मन्यते । क्षितेरेककोटियोजनौर्ध्वं महर्लोक, यत्र |
नरवरास्तिष्ठन्ति । तस्योपरि कोटिद्रयोर्ध्वं जनलोकः, यस्मिन् सनन्दनाचै- ज्ञनियज्ञेनोपास्यमानो हयग्रोवस्तिष्ठति। ततो भूमेः कोटिचतुष्टये तपोलोकः, तत्र त्रिविक्रमस्तिष्ठति। स त्रिविक्रमः पाताले, भुवरकिऽत्रच लोकत्रयेऽपि तिष्ठति । अतो भूमेरष्टकोटियोजनोध्वं ब्रह्मलोकः । अस्मिन्
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(५२१ )
छोकेऽधोक्षजो ब्रह्मणा उपास्यमान आस्ते। उत ऊर्ध्वं वेकुण्ठस्याधःस्थाने बलरामस्तमोगुणमयः, पदिचमे कामदेवो रजोगुणः, उत्तरे पाश्वेऽनश्दधो ज्ञानविग्रहः, पूवंस्यां सत्वभूतो वासुदेवः । सत्यलोकत उपरि शर्लोकात् घोडशकोटियोजनोर्ध्वं वकुण्ठलोको वतते । तन्मध्ये विष्णोः परमं पदम् । यत् (तद्विष्णोः परमं पदम्' इति ऋचा गीयते । तदेव वै कण्ठमयोध्या इत्युच्यते । तत्र श्रीरामचन्द्रः स्वयं विष्णुः, सीता लक्ष्मीः, तस्या सखी वेदवती, सा एव अयोनिसम्भवा सीता । लक्ष्मणोऽनन्तः, श ङ्कचक्रौ शत्रघ्नभरतौ । पुराणादिषु रदरस्वरूपो हनुमान् इति वण्यते, किन्त्वत्र खगाधिपः ( गरुडः ) हनुमान् इति विशेषो दश्यते । शङ्कचरूडस्य पत्नी वृन्दा तुलसीरूपेण अवतारिता यत्र, तद्रन्दावनमिति नाम्ना प्रथितमभूत् । विष्णुभक्तस्य शिवपुत्रस्य स्कन्दस्य रोको दर त्रिशत्कोटियोजनोध्वं' कौमारलोक इति प्रसिद्धः ।
ब्राह्मणब्राह्य णीसंवादरूपे तृतीयेऽध्यायेऽस्मिन्, इतः परं करिचल्लोको वतते न वेति वत॑ते ब्राह्मण्याः प्रदनः। तत्रोत्तरम् -महाविष्णोः प्रतिलोम्नि ब्रह्माण्डजातानि वर्तन्ते। महाविष्णोः कृष्णस्य अंशाशभवाः सनातनाः सङ्कषंणादयः प्रतिब्रह्माण्डमुत्पन्नाः । अत एव 'सहलशर्षा पुरुषः सहलराक्षः सहस्रपात्" ( ३.७. ख. ) इत्यादिना स वण्यते । स एवान्यत्र हिरण्यगभं इत्युच्यते । तस्य पुरुषस्य विष्णोः पाश्वे राधिकादेहसम्भूता महालक्ष्मीव्यं जनेन वीजयन्ती वरीवक्ति, एवं ध्यायतस्तस्य पुरुषस्य रोमहषः समजनि, तेन बरह्माण्डान्तराणि समभवन् । राधायाः सचिन्ताया यदशरुधारा व्यजापत, तया वामतो यमुना, दक्षिणतो गङ्गा, मध्यतो गोमती च प्रादुभूताः ।
चतुर्थेऽध्याये ब्राह्मणेनात्र पुरुषलोकादुध्वं ` गौरीलोको वण्यते । चतुष्पष्टि- कोटियोजनानामृध्वं ` गौरीकोकः । समस्तेषु तन्त्रशास््रेषु वण्यं मानानां भैरवी- न्रैरवाणां सिद्धयोगिनीनां सिद्धानां चात्र वसतिः, तत्रैव श्रीमत्त्रिपुरमुन्दर्या अपि। श्रयत्वं चक्ररूपेणात्र वणितम् । त्रिपुरषुन्दर्यां रूपं कृष्णस्व रूपत्वेन वर्णितम्, यथा स्वयं कृष्णस्वरूपा च कृष्णाज्ञावशवतिनो' ( ४.८. क ) इति । त्रिपुरसुन्दरी एव इथामवर्णां सती नीलसरस्वती दुर्गा पराशक्तिरिति । सैव दुर्गा त्रिपुरसुन्दरी, सृष्टि-स्थिति-विनाशकरत्री । ततस्तस्यास्त्रिपु रसुन्दर्या यन्त्रं संवण्यं तत्र तत्तत्स्थाने देवतानां सन्निवेशो बणितः । गौरीरोकाग्रेऽ- वितभ्ूतजननी कालिका श्चरीचक्रस्य दक्षिणे भागे स्थिता कदाचित् श्यामा कदाचिच्च काञ्चनवर्णा प्रतिभाति । सैव उग्रतारा उग्रापत्तारकत्वादुच्यते । यरिचमस्यां दिशि जुद्धसत्वमयी वाग्वादिनी, सैव दक्षिणदिग्भागे पीतवर्णा अवनेदवरी । कदा मुक्ति ददासीति विष्णुना पृष्टा सती क्रुद्धा भूत्वा स्वी
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चिच्छेद । तेन बिभ्यता विष्णुना प्रसादिता मण्डं स्कन्धे निधाय पूरवंस्यां दिजि संस्थापिता सैव छिन्नमस्ता । उत्तरे च डाकिनी-लाकिनीभ्यां सेविता सिद्धयोगिनी वतते ।
अत्रैव १९संख्यकरलोकादारभ्य ३ ९इलोकपयंन्तमेका विशेषा कथा वणिता । समुद्रमथनात्पूर्वं पुरुषोत्तमस्य रूपं धृत्वा दुर्गादिसवंशक्तिभि रावरता परमेदवरी राधा षट्कोणाष्टरलचतुरसप्रान्तदेशसमन्विता चक्ररूपाऽभ वत् । अत्र चक्रेरवरीरूपा स्वयं राधा एव । षट्कोणे श्रातरः, अष्टपत्रेऽष्ट गोप्यः चतुरस सुदामाद्याः प्रान्तदेशे च पुनः गोप्यः प्रतिष्ठिताः । पुनः जलधेः मथने मोहिनीरूपेण स्वे यदा मोहिताः रसरूपे निमज्जतुः, तदा भगवता मनसा संकल्पितं यद् दधिदुग्धादिसमन्विते देशे गोगोपगोपीभिः सह क्रोडितव्यमिति । तदर्थं सर्वे देवा भूमौ जन्म लेभिरे । तस्मिन्नेव समये यदा पावती उत्पन्ना तदा नारायणेन सह पार्वत्या विवाहौ भवत्विति हिमवता चिन्त्यमानेऽपि आग्रहविशेषात् पात्या शिवेन सह् विवाहः सम्पन्नः । विष्णवे एका कन्या देया इति मनसि ध्यात्वा पुनश्च सः गिरिराट् तपसा दृषभानुरूपेण व्रजे जातः, सा मोहिनीशक्तिश्च राधारूपेण पुनः समृत्पन्ना । तां विष्णवे वासुदेवाय दत्त्वा स परां सन्तुष्टि प्राप ।
पंचमेऽध्यायेऽस्मिन्, नारदोऽत्र पुनर््राह्मणव्राह्यणीसं वादं स्मारयति । अत्र गौरीलोकादर्ध्वं शिवलोकस्थितिवंण्यंते । राधाविरहतापतप्तेन कृष्णेन प्रक्षिप्तो लिङ्गरूपी शिवः पञ्चधा विभक्तः । तस्य साकारोनिराकारचेति द्वैविध्यम् । साकारः पश्चवदनदशबाहूत्वादिरूपः, निराकारस्तु पञ्चतन्मात्ररूपः । वद्धमानं लिङ्गं दुष्ट्वा योनिभूता पराशक्तिः त्रिपुरसुन्दरी तमादृत्य स्थिता । अतएव पप्रकृत्यात्मकं लि ङ्खमित्युच्यते । एततिलिङ्गं पुरुष-प्रकृति-शिव-विष्णुभेदेः नाना- रूपं व्णंयन्ति जनाः । तल्लिङ्खमध्ये बिन्दुः, ततो महाविष्णुर्जातिः । तेन सकल सृष्टम् । अत्र॒ विष्णुभक्तानां नित्यत्वं वण्यते । शिवतेवापरः सुखमवाप्य परचात् दुःखजलघौ निमज्जतीत्युक्त्वा कलिकाले प्रायः ल्िवभक्ता भवन्ति विष्णुं निन्दन्ति च । कशी केशवेन निर्माय शिवाय दत्ता। कलौ कायां पालण्डादिभिरावृत्ता जनाः काइयामपि मुक्तिर्नस्तीति वदन्ति । अत्र एवं प्रतिभाति दिवो लोकयात्राथं स्वयं पाखण्डिनो निर्माय नरांडच धर्माद् विचाल्य पापे प्रवतत्य मुक्ति दकंभां चकारेति ।
षष्ठे चाध्याये अत्र ब्राह्मणो वदति यद् बृन्दावनादधः शिवलोकस्योपरि विरजाख्या महानदी वतैते । तस्या पारे मनसाऽपि अगम्यं ज्योतिर्मयं स्थानं वत॑ते । तत्र कृष्णस्य स्थानम् । कृष्ण एव ब्रह्यत्युच्यते । तस्य शक्तिः संव प्रकृतिः सूक्ष्मा सनातनी च । स एव ज्योतिब्रह्म जगत्सृष्टिस्थितिग्रलयकारणं
2.
सर्वस्वरूपं निष्कलं च । एवमत्र ज्योतिमंयलोकस्य तन्निवासिनो निष्कल- ब्रह्मणश्च स्वरूपं वण्यते ।
सप्तमेऽध्यायेऽस्मिन् ब्राह्मणोऽत्र सविस्तरं वृन्दावनाख्यं लोकं व्णेयति यद् अस्मात् परतरं बृन्दावनास्पं सर्व॑भूतमनोहरं प्रेमानन्द रसान्वितं राजते । ए तदेव गोखोकमिस्युच्यते । अत्र सुशीलाद्या लक्षसंख्याकाः गावः, पद्यगन्धपिश द्गाख्यौ बली वदौ, श्रीकृष्णस्य दक्षिणाङ्गाद् विनिगंता अनेके गोपालाश्च सन्ति । ते स्वे यथा श्रीमद्ध।गवते बणिताः सन्ति, तथैवात्रापि कृष्णस्य सहचराः । तैः साकमेको देवः क्रीडमानो विराजते । तेषु सुबल-स्तोकङकृष्ण-दाम-सुदामक- किङ्किणी-भद्रसेन-अंशु-कलवि ङ्ग्य ङ्खर- पुण्डरीक-विकङ्धू- य॒ मत्तेन -विलासि- | मन्दर-अञुंन-गन्धवं-वसन्त-उज्ज्वल-कोकिल-सनन्दन-विदग्य : सुहूत्तमाः, विशाल-दृषभा-ओजस्वि-देवभ्रस्य-व रूथप-म। कन्द-कुसुमापीड -मणिवत्ध-करन्धम- मन्दर-चन्दन-कुन्द-कु लिन्द-कुलिकाः सर्वे सेवकाः, मण्डलीभद्र-यक्-ईन्द्र-भट- भद्राङ्ध-गोभट-तटवधंन - भदरेह-वी रभद्र-महागुण-कुलवीर -महाभीम-दिव्यशक्ति- सुरप्रभ-रणस्थिर-सुस्थिर-स्थिरानन्द-दुरन्दरा ऋषिपदवाच्या भगवत्सेवकाः । एते उग्रैस्तपोभिर्गोविन्दं प्रसाद्य गोपत्वं प्राता गोलोके विहरन्ति । वृन्दावन- प्रान्ते महाकदम्बवनं वतते । तस्मिन् केषाञ्चित् गोपानां वसतिः । तथेव आण्डीरकवटस्याधो बृहदने, आश्नवने, स्थलपद्म वने, मन्दारविपिने, पारि- जातवने, खादिरवने, ताकुवने, अशोकार्पे वने च केषाञ्चित् वसतिः । एकदा राधा रासक्गीडासमये समुपस्थितान् सहचरान् दृष्ट्वा घोरं विपिनं प्रविष्टा । तद् दष्ट्वा श्रोकृष्णो राधिकां सान्त्वयन् वन्दावनं समानीयेदमाह-अच्य प्रभृति अत्रये प्रविशन्ति ते सर्वे स्त्रीत्वमायास्यन्तीति । ततो ये गतास्ते सरवे स्त्रीत्वमापन्नाः । तैः सह एकेन वपुषा प्रेमद्धः, अन्येन वपुषा राधया सह क्रीडति । राधा तावत् करष्णरूपिणी पराशक्तिः । संव रसमथी शाक्तिः । चन्द्रावली नाम च्रिपुरादेहसम्भवा। सा राधा विरहबाधितस्य ईश्वरस्य ऋडार्थं निमिता । अन्या ललिताख्या देवी भुवनेरवरी स्वरूपिणी । तस्या एकांशतो नारदः समभवत् । विशाखा-उयामा-पद्मा-रौव्या-भद्विका-तारा- विचित्रा-गोपाली-पालिका- चन्द्रशालिका-म ङ्गला-विमला-वीणा-तरलाक्षी-मनौ- रमा-कन्द्पमञ्जरी मञ्जुभाषिणी -अञ्जनेक्षणा-कुमुदा-कं रवी-सारी-शारदाक्नी- विशारदा-शाङ्करी-कु ङ्क. मा-ङृष्णा- साराङ्गी-चन्द्रावली-िवा-तारावकी-गुण- वती-षुमुली-केकिमञ्जरी-हारावली-चकोराक्षी-भारती-कामिलाः श्रेष्ठा गोप- कुमारिका राधाङ्खसम्मवाः कोटिशः सन्ति। सुचित्रा-चम्पकलता-र ज्गदेवी- सुदेविका-तुङ्गविच्ा- इन्दुलेखा-मण्डली-मणिकुण्डला-कुर ङ्गक्षी -मारती- माधवी- मदालसा-मञ्जुला - चन्द्रतिलका - सुमध्या- मधुरेक्षणा-मञ्जुमेषा-शशिकला -
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(२ )
गुगचूडा-वराङ्गना-कमरा-कामर्तिका-सुरङ्गी-प्रेममजञ्जरी-माधुरी- चन्दरिका- चन्द्रा-पुबला तनुमध्यमा-कन्दपंपुन्दरी-मञ्जुकेशी-केशवमोहिन्यः राधायाः प्राण- तुल्याः सष: । लासिका -केलिकन्दली-कादम्बरी-शशिमुखी -चन्द्ररेखा-त्रियंवदा- मदोः्मदा-मगरुमती-वासन्ती-ककभाषिणी -रत्नवेणी-मणिमती -कपु रतिलका- उज्ञ्वला-मनोजा-मणिषञ्जरी-चिन्दू रा-चन्दनवती-कोौमुदी-मदिरालसा-कामदाः सख्यः सन्ति राधाज्ञावशवत्िन्यः । मधु-पिङ्गल-पुष्पाङ्ख-हासाङ्काः चत्वारो विदूषक्राः । कडार-भारतीवबन्ध-चारवेषाः त्रयो विटाः, भ ङ्ग.र-भङ्गार-सन्धिक- प्रहिण-रक्तक -पत्रक-पत्रि-पधुकम्ब-पधुत्रत-शालिका-ताकिका-मालि-भानु- मालाधराः चेटा: । ते भर्वे कृष्णपादवेगाः 1 अन्ये शङ्का रप्रसाधना्थं पृथक्- पृयक्त सेवकाः सन्ति। अत्रैव चन्द्रमास-सूथंमाष-प्रभासोद्धास-सुशमं-नमंद- रतिहास-रतिप्रियाः देवगन्धर्वाः ।
एतद्प्रन्यवक्त ब्रह्मगो गोलोके सुशमंनामक्तो गन्धव आसीत् । अनन्य- मनसा सेवां क्वन् क्माच्चित् प्रमादात् परिश्रष्टः प्रथमं मान्धातृतनयो मुवुकृन्दाभिधः सूतवे उत्पन्नः। तदनन्तरं ब्राह्मणत्वं प्राप्य परं धाम जगामेत्यत्र वण्यते । तेन कृष्णयामल्स्य वक्ता एष एव । ब्राह्मणी अपि विगालान्नीनास्नी राधायाः कटाक्षप्रभवा दैवाद् बृन्दावनच्युता सती तत्प्रिया अमवत् । अत्र सुशर्मा वदति यद् मत्सङ्कगिनो नतेंकाः, गायकाः, वाद्यवादकार्च बहवः सन्ति । भगवन्तं सेवयित्वा अनेके महषंथो बृन्दावने किङ्कराः सन्ति । एते वणिताः सर्वे बहद्वने वर्तन्ते । राधिकयाऽपि प्रत्येकस्मिन् कार्ये नियुक्ता विभिन्नाः सेविका वर्तन्ते, यथा -ल्वङ्घमञ्जरी-रागमञ्जरी-गुणमञ्जरी- भानुमती-अमरप्े्ठा-पुप्रिया-रतिमञ्जरी--रागलेखा -कलाकेकि-भूरिदाद्याः । तदनन्तरमत्र गोरोकस्य श्रीकृष्णस्य च वर्णनं कृतम् । विशेषत श्यृङ्गारो- द्दीपनविषयाणां मध्ये एकैकं विषयं पुरस्कृत्य राधाकृष्णयोः शङ्गा वर्णेयता स्तुतिरनुपमा क्रियते । ब्राह्यणस्य भकत्युद्रेको विशेषतोऽत्र निरूपितः । ततः प्रियं सान्त्वयन्त्या ब्राह्मण्याः संवादं वर्णयित्वा तया श्रशान्तो भवे त्यक्तं सति श्रीकृष्णचरित वचया मुक्तिरिति, भक्तानां सुखप्रदाने राधादेग्या वैशिष्टचं चोपवण्यं राधाङृष्णयोः प्रियवस्तूनि वणितानि। अन्ते च श्रीकृष्णस्य वामभागे वर्तमानाया राधिक्राया अनुपमा शोभा संवण्यंते ।
अष्टमेऽध्याये, भगवद्गाथाध्याननिमग्नं ब्राह्मणं ब्राह्मणी पृच्छति-अखिल- ब्रह्माण्डनाधकस्य सहश्चशिरसः शिरोदेशे गोपालाः कथं भवितुमहन्तीति । स उत्तरयति-- सर्व॑स्य ब्रह्मरूपत्वात्, निविकारस्य निरञ्जनस्य ज्योतिःस्वरूपस्य ह्य ग स्वरूपत्वात् तेषामेव न, अपितु वक्षलतादीनामपि रसत्रह्य रूपत्वं गोलोके रतंमानत्वं सर्वेषां कृऽणत्व रूपत्वं च निविवादम् । मनुष्याणां ज्ञानगम्यं यथा
ध.
भवेत् तत्त्वं तथा नरख्येण वण्यते । तथेव राधा तस्याः सेविकारच उभयभेदो नास्त्येवात्र । यथा द्विदलं बीजे शाखापल्लवादिरूपेण नानाकारं -अ्रतिमाति, तथा पुंपरकृत्यात्मकं विश्वं नानारूपेषु प्रतिभाति । वस्तुतस्तु तत्त्व“ मकमेव । तदेवोच्यते --
एकः कृष्णो द्विधा भूतो मुमुश्षुमजनेषिणोः । उपकाराय शुद्धात्मा वेदविदिभः स॒ गीयते । मुक्तो ब्रह्मपदं य!ति तदङ्क ज्योतिरुतमम् ।। इति । ( ८.२६.ख -८.२७ क ) नवमेऽष्मिन् अध्याये वृन्दावनं केन निमितमिति ब्राह्मण्या प्ररे कृते सति ब्राह्मणेन रहस्यं वदता प्रोक्तं यत् कृष्णाग्रजं बलरामं गोपवालकाः तदेव पृष्टवन्तः । ततः गोपबालकैः सहं बलरामो वृन्दावने वतं मानान् वृक्षान्, रताः, पक्षिणः, मृगांङ्च पृच्छति । ते च सर्वे भगवदीयमायया मोहिताः सन्तो वेणुवादनपरं गोविन्दं पप्रच्छः । अत्र कृष्णतत्त्वविवित्सया दिव्यरूपा सरस्वती धीमतो बलरामस्य जिह्वाग्रस्था सती भगवन्तं प्राथेयते । दशमेऽध्यायेऽस्मिन् बलरामेण स्तुतिपूवंकं वृन्दावनविषये कृष्णतत्त्व- राधिकःतत्त्वयोदच विषये प्रहे कृते सति श्रीकृष्णः स्वस्य ब्रह्यरूपत्वं वणंयन् समस्तजगत्स्वषूपं ब्रह्मण एव विवतं इति वक्ति । तथव जगत्स्थितिरपि ब्रह्मण इच्छया प्रचलति । वृन्दावनस्य विषये केशानां वृन्दत उत्पन्नं यत्तत् वृन्दा- वनमिति सविस्तरं तत्र प्रतिपाद्यते । मम पादाम्बुजोत्पन्नया वृन्दया रक्षितमिति कृत्वा वृन्दावनमेतदित्यादिका अनेका व्युत्पत्तयोऽत्र वृन्दावनस्य प्रदत्ताः । सर्गादपि अभ्यदहितं वृन्दावनमेतत् शब्दव्रह्यस्वरूपमिति वृन्दावनस्य माहात्म्या- तिशयोऽत्र वर्णितः ।
एकादजञेऽध्यायेऽस्मिन् श्रीबलरामो वंशौ मधिकृत्य पृच्छति । श्रीङृष्णइ्च प्रतिवदति यद् वंशीनाम सरस्वत्याः प्रलयकालीना तनुः । प्रलयकाले वंशी कथं स्यादिति प्रदने कृते सति आकीटब्रह्यपयन्तं संहारक्रमेण यदा र्नं भवति, तदा भहमेक एव क्षराक्षरस्वरूपेण तिष्ठामि, सरस्वती च ममाधधरमाच्धित्य वंशीषखूपेण स्थिता । तथैव दक्षिणे वामे च भागे आचतुमुंखब्रह्मायनन्तमूख- ब्रह्मपर्यन्तम्, रुद्रमूतेयश्च आपच्चमुखतोऽनन्तमुखपयंन्तं विराजन्ते । अन्येषु अङ्खष्वपि सर्वां देवताः समस्तजीवात्मानरच शक्तिसमेता यथा तथा तिष्डन्ति। सा सरस्वती अधरे स्थातुमिच्छन्ती कृष्णं स्तुतवती । परब्रह्मरूपः श्रीकृष्णो मौनमेवालम्बते । परितः पर्यन्त सरस्तती पुनः स्तौति श्रीकृष्णम् । ततो वाग्देवी ऋतु राजं व्ण॑यामास । ततो देवी सरस्वती कृष्णेन स्थावरतां
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प्राप्तुमादिष्टा सती द्रादशाङ्क लिमिता सप्तदशाङ्ख्.लिमितावा वंशी बभूव । वंशीभरूता सा पुनरपि स्तौति भगवन्तं श्रीकृष्णम् । ततः शब्दब्रह्ममयस्यः श्रीकृष्णस्याघ रसं सगतो नादरूपिणी सरस्वती प्रादुबंभूव ।
द्रादजेऽध्यायेऽप्मिन् श्रीकृष्णस्य त्रिभद्धित्वं वण्यंते। तत्र॒ कि नामः त्रिभद्भित्वम् ? इति चेत्, रसादानन्द आनन्दानुभावो जायते । रन्तुमिच्छः ईदवरः श्रीकृष्णो नारीरूपेणात्मानं यदा भावयति, तदा रसरूपिणी राधा प्रादुर्भवति । तां दृष्ट्वा कृष्णस्य मनसि आनन्दोल्लासोऽनुभावाइच संजायन्ते । तदा श्रीकृऽणो रसमाधुरीमापिबन् ति््यैरग्री वस्तियंक चरणरच भवति । सषा रसमाधुरीभरिता वंशीवादनरता कृष्णस्य आक्ृतिमेनोहारिणी त्रिभद्कखिनाम्ना अध्यायेऽस्मिन् बणिता ।
त्रयोदज्ेऽध्यायेऽस्मिन् बलरामस्त्रि भङ्कित्वप्राप्ट्यनन्तरं किमकरोत् श्रीकृष्ण इति तमेव प्रच्छति । स उत्तरयति-- यद् इच्छायुक्तस्य मम रसरूपाया राधाया आकषेणं कथं भवेदिति चिन्तयत आकषेणोपायानां मणिमन्त्रौषधीनां स्मरण- मजायत । तत्र मणिः चिन्तामणिः, मन्त्रः मोहनाख्यः, ओषधिः तिलका- दिकम् । तत्र चिन्तामणिधारणे कृते सती राधिका अदृद्यतां गता । ततो वदयार्थं सम्मोहनाख्यं मन्त्रं जप्तवानहम् । तेन कामः प्रादुर्बभूव । सच राधां दुष्ट्वा स्वयमेव मुग्धोऽभवत् । सा तं हसन्ती सुस्निग्धाऽभवत् ।
अध्यायेऽस्मिन् चतुदंशे श्रीबल रामं प्रति पुनः श्रीकृष्णो वदति यद् मणि-
मन्त्रौषधिभिवंशमानीतापि सा नातिप्रसीदन्ती मया वद्या स्तुता। वंशीं
मूछठ॑यन् स्वरसपदा युक्तो नादः सप्तविधोऽभवत् । ततः रागाः षड्विधा रागिण्यइ्च षट् समूत्पन्नाः । तालगणाः, ग्रामाः, मूकछनाद्यादचोत्पन्नाः । ततौ भगवती त्रिपदागायत्री, वेदारचत्वारर्च तां देवीं प्रसादयितुं समूत्पन्नाः ॥ अथ र्तः सह् अकारादिहूकारान्तव्णक्रमेण प्रस्तुतैर्नामभिस्तामहमस्तुवम् । तदा प्रसन्नायास्तस्या देव्या देहतदचतुर्भृजा चरिनेत्रा रक्तवर्णां च श्रीभूवनेदवरी प्रादुबेभूव । सा एवं संमोहनमन्त्रस्य अधिष्ठात्री । का त्वमिति प्ररने सति महादेव्या द्वितीया मूर्तिरिति सोवाच । राधाया वशीकरणाथंमुपाये प्रार्थिते सा राधाया अष्टाक्षरमन्त्रं मामुपदिष्टवती ।
बलरामश्रीकृष्णसंवादरूपेऽध्यायेऽस्मिन् पञ्चदशे दत्तस्य वरस्य साफल्यं कुविति भुवनेश्वरी श्रीकृष्णः प्राथयति । सा च वदति यद् राधिकया आनन्द- मय्या सह विहर्तुं वाच्छति चेत् तदर्थं गहं विरचय । ततः पूबक्तिरीत्या कृल्दावनं विरचयामास श्रीकृष्णः । तथं व॒ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तां सकलमृष्टि चकार । तत्र विश्चेषतो बृन्दावने गोलोके धेनूवत्सांश्च स्थापयामास । ततो ब्राह्मणान् सृष्ट्वा अच॑धामास । तेषामाशीर्वादतो नित्यं पुष्पफलिनस्तरवः
ॐ,
पञ्चाला उत्पन्नाः । तेषां पूवंशाखामाध्रित्य ये फलानि खादन्ति, ते बाला अपि तरुण्यस्तरुणा वा भवन्ति । दक्षिणलशाखामाध्रित्य फलानि खादन्तो बद्धा अपि कुमारा भविष्यन्ति। तथैव उत्तर-पदिचमशाखामाशरित्य ये फलानि खादन्ति ते ज्ञानशाछिनो भवन्ति । ऊर्ध्वा लाखामाध्रित्य ये लादन्तिते मत्स्वरूपा भवन्ति । एवं रीत्या परमाइच्यंरूपं गोलोकं दृष्ट्वा कृष्ण जात्मनः स्वरूपं कथयामास । परब्रह्मणः श्रीकृष्णस्य स्वरूपं विज्ञाय भुवनेशी विमोहिता । तदनन्तरं च पुर्भृजस्य गोविन्दस्य रूपं दृष्टवती । तदा विस्मिता सती भृवनेशी कृष्णमाराधयामास । षोडशोऽध्यायेऽस्मिन् श्रीकृष्णो बलरामस्य भुवनेशी ततः किमकरोदिति पररनमुत्तरयति । भगवतः स्वरूपं दुष्ट्वा मोहिताया भुवनेइवर्याः समक्षं
श्रीकृष्णस्त्िपुरसुन्दरीस्वरूपम ङ्गीचकार । तत्र या भगवतो वंशी सैव बाणोऽ- भवत्, मुरली चाभवद् धनुः । उध्वंहस्तद्वये धृतौ तौ, पााङ्कुशौ च अधः- करयोः । इदमेव त्रिषुरसृ्दर्या रूपम् । त्रि भङ्गीस्थानत उत्पन्ना इति त्रिपुरसुन्दरी ।
श्रीविद्यासम्प्रदाये अनङ्खकुसुमादियोगिनीनां महत्तमं स्थानं विद्यते । तत्र व्वंसंक्नोभणाभिधेयेऽष्टारे एता आवरणदेवतात्वेन पूज्यन्ते । तासामूत्पत्ति परभावं च वर्णयन् श्रीकृष्णोऽत्र सप्तदशेऽध्याये बलरामं बोधयति यद् राधा- विरहकातरं मां दुष्ट्वा त्रिपुरसुन्दरी यदा एकाकिनी एव तामानेतुं चिन्तयति, तदा चतुष्कोटिपरिमिता योगिन्यः समूत्पद्यन्ते । ताः श्रीमल्तरिपुरसृन्दरीं कि करिष्यामो वयमिति पृच्छन्ति । सर्वाः संभूय राधां वशमानयतेति समादिष्टा- स्ता राधान्वेषणतत्परा वनं विचेरुः । तासामसाफल्यं दुष्ट्वा त्रिपुरसुन्दरी अष्टदूतिकाः प्रादुर्भावयामास । ता एव अन _्गकुसुमा-अन द्धमेखला-अन _्गम- दना-अन ङ्गरेवा-अन ङ्गवेगा-अन ङ्गाङ्करशा-अन ङ्गमालिनी इत्यष्टौ योगिन्यस्तरि- पुरसुन्द्यः प्रतिमूतंय इव राजन्ते । ता सर्वाः कामदेवेन सह राधां वशमानेतुं प्रायतन्त, किन्तु सफला नाभूवन् ।
अष्टादश्ेऽध्यायेऽस्मिन् तथैव राधां वशमानेतुं षोडशाकषंणशक्तीनां प्रादुर्भावो वण्यते । इमारच देव्यः श्रीचक्रस्याङ्खभूते सर्वाशापरिपुरकाभिधे ये घोडशारे निवसन्त्य: कामाकषिण्याद्याः षोडश आवरणदेवताः सन्ति । ता अपि राधामानेतुं विफलीभ्रूताः ।
एकोनविशत्यध्यायेऽत्र राधामानेतुमेतास्वप्यशक्तासु सवंसंक्षोभिण्यादि-
शक्तीनां तरिषुरमुन्दर्याः प्रभवः समजायत । ताइचतुदंशशक्तयः सवसंक्षोभिण्या- दिसवंदरद्क्षय ङ्करीपयन्ताः सवंसौभाग्यप्रदाभिधेये चतुदंशारे पुजयन्ते । ताः
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( २८ )
स्वस्वशक्त्यनुसारं राधां वशमानेतुं कतोयोगा अपि यदा अशक्ता बभूवुस्तदा राधां प्रतुष्टुवुः । राधया बरन्दावनं सर्वं राधारूपमिति रहस्यतत्वे बोधिते ताः सर्वा राधायाः सेविका बभूवुः ।
विशत्यध्यायेऽत्र एवं मोहिताघु तासु शक्तिषु श्रीमत्विपुरसुन्दरी -सर्वंसिद्धिप्रदादिसवंसौभाग्यदायिनीपरयेन्ताः शक्तयः सर्वारधंसाधकाभिधेये दशारचक्रं निवसन्त्यो विभिन्नेभ्योऽङ्खेभ्योऽसृजत । ता अपि श्रीदेव्याज्ञया राधामन्वेषयन्त्यो राधाया निरतिशयं रूपं दष्ट्वा राधायाः परिचारिका बभूवुः । ततः सवं्ञादिमहाशक्तीनां सवरक्नाकरे दशारे वसन्तीनां सृष्टिरजायत । ता अपि अशक्ताः सत्यः श्रीङृष्णलूपेण राधां ददृशुः । राधाङृष्णरूपयोविपयंयं प्रदयन्त्यो मोहितास्ता बभूवुः ।
एकविशत्यध्यायेऽत्र विमुग्धासु तासु सवंसंक्नोभिण्यादिषु सवेज्ञादिषु च शक्तिषु श्रदेव्या वशिन्याद्यष्टदेवीनां प्राकटच' वण्यते । यत्ते कृतेऽपि राधां मोहयितुमगक्ताः शक्तयस्ता गद्यपद्यादिना राधिकां प्रतुष्टुः। श्रीराधा प्रसन्ना सती स्वस्यानन्दरूपत्वं शक्तिहीनस्य कृष्णस्य अशक्तत्वं च प्रतिपाच्च श्रेमरसं विना वशीकर्तं॑नार्हाऽहमिति ज्ञात्वा श्रीदेवीं निवेदयत । तास्तथेव चक्रुः। ततस्तव्रिषुरसुन्दरी कामेइवर्यादिमहाशक्तीनां सृष्टिं चकार प्रेम्णा च राधां वक्लीकर्तं प्रैरयत् । ताः प्रेमरसेनैव तां वशीकर्तुं यत्नमकू्वेन् । किन्तु ताभिः साफल्यं नावाप्तम् । राधा च सहस वान्तदंघे ।
द्ाविशत्यध्यायेऽ्र सर्वासु शक्तिषु विफकासु पुनः श्रीदेव्याः कामेश्वर्यादि- सवम ङ्गलापयेन्ताः षोडशनित्या शिरोमणितः पादकटकस्थानं यावद् -भिन्नेभ्यः प्रदेशेभ्यो निर्गत्य राधिकां प्रति जग्मुः । कष्णसंयोगं प्रशं सन्तीनां देवीनां पुरतो राधा स्त्रीणां स्वच्छन्दकारित्वं स्वतन्त्रत्वं च निषेधयामास । राधिकावचनं श्रुत्वा ताः सर्वाः श्रीदेवीं निवेदयामासुः । क्रुद्धा सती श्रीदेवी ततो डाकरिनीमाधारात्, योनिरन्ध्राद् राकिणीम्, नाभिदेशतो लाकिनीम्, हृदयात् काकिनीम्, कण्ठदेदतः साकिनीम्, भूमध्याद् हाकिनीं च राधाकषेणार्थ प्रकटयामास । ता देव्यो राधिकां निर्भत्स्यं भीषयामासुः । ततः श्रीराधाया देहाद् बह्वयः शक्तयः प्रति रोधा्थंमत्पन्नाः । ताभिनिरस्ता डाकिन्याद्या योगिन्य- स्तरिपुरसुन्दरीशरणं ययुः । ततः श्रीङृष्णः स्ववामाङ्गादुत्पन्नानां गोपीनां मोहनार्थं दक्षिणाङ्कात् गोपान् प्रकटयामास । गोप्यो गोपाइच राधामायया मोहिता बृन्दावने विचेरुः ।
त्रयोविङत्यध्यायेऽत्र श्रीमत्त्रिपुरयुन्दरी परिवारदेवतानां योगिनीनां च पराजयं दष्ट्वा भगवत्या राधाया वशीकरणारथं मन्त्ररूपा सती स्वयमाकर्ष॑णं
( २९ )
मनुं जजाप, मुद्राश्च विरचयामास । सरवंभूतवश ङ्करीमुद्रां प्रदश्यं वसन्त ~ सुन्दरीनाम्ना मन्त्रेण सह राधामाकषंधितुं प्रायतत । तदनन्तरं स्व॑संक्षोभिणी- मुद्रया सह मन्तरं जजाप । तेन राधा क्षोभिताऽभवत्, विरहेण विह्वलिताऽ-. भवत् । मन्तरेण सह ॒विद्रावणीमुद्रायां रचितायां कृष्ण दशं नार्थं विद्राविताऽ भवत् । पुनव दिगम्बरीविद्यामाकषिणीमुद्रया सहं जजाप । अनया स्त्रियो दिगम्बरीभूय उन्मत्ता इव धावन्ति । एवं कृते राधा चिन्ताकुाऽभवत्, कृष्णान्वेषणे तत्पराऽभवच्च । ततो राधायाः प्रवृत्ति जिज्ञासमाना श्रीकृष्णः स्वपादत उत्पन्नं बरन्दां दूतीं प्राहिणोत् । इन्दा राधासमीपं गत्वा कृष्णस्य गुणान् वर्णयामास । तस्मिन्नेव काले सिद्धयोगिनी त्रिपुरा उन्मादमुद्रया उन्मदा तां कलयामास । तेन कृष्ण-कृष्णेतिवादिनी लतागुल्मादिकं पप्रच्छ राधा । कल्दपदपेवशगां राधां दृन्दा सान्त्वयामास । परिजाततर्मूले यदा राधा क्षणं विश्वामं करोति, तदा श्रौदेवी महाङ्कशां मृदा दशयामास । ततो राधा अक्षिणी निमील्य तिष्ठति स्म । ततश्च सा त्रिखण्डाख्यां मृद्रां रचयामास । तल््भावेण राधा लज्जां विहाय किकततंव्यविमूढा बभूव ।
चतुविशंत्यध्यायेऽत्र ब्दा राघासमीपं गत्वा तन्नाम चरितानि च पृच्छति । फ त्वं परत्रह्मस्वरूपिणः श्रीकृष्णस्य देहाद्विनि्गेता राधाऽसि ? श्रीकृष्णो राधाऽसक्तः सन् वशीकरणा्थं परब्रह्मस्वरूपिणीं त्रिपु रसुन्द रीं जनया- मास । तया मन्त्रेण मुद्राभिरच सर्वा वशी क्रियन्ते । त्वं तु नाद्यापि वशमागता। नाहं किमपि जानामीति राधा उत्तरयति वदति च यदहं केवलं कृष्ण स्मरामि । राधाकृष्णयोः परस्परं प्रणयमवगत्य वृन्दा राधाया अष्टादकनत- नामानि श्रोतुकामा राधां प्राथितवती, राधा च तानि स्रावयामास। अध्यायान्ते चत्र अस्य स्तोत्रस्य फलश्रुतिविद्यते ।
पच्चध्िशत्यध्यायेऽत्र राधा वंशीवदनं कृष्णं स्मारं स्मारं विरहकातरा विललापेति व्य॑ते । वृन्दा राधासमक्षं पुरुषोत्तमस्य श्रीकृष्णस्यापि विरहदर्शां वर्णयति-
कृष्णे ब्रह्मणि राधायामोषद्भेदो न विद्यते । एकमेबाद्रयं ब्रह्य त्युच्यते ब्रह्मवादिभिः ।। ( २५.२३ ) इत्येवमैक्यं तयो; प्रतिपादयति, अन्ते च वृन्दा राधां किमपि रहस्य- मुपदिशति ।
षड्विशत्यध्यायेऽस्मिन् राधिकाया उत्कं; प्रद्य॑ते । वृन्दया श्रीराधिका ्ोधिता सती आत्मना परमात्मन एेक्यं ज्ञात्वा श्रीमत्त्रिपुराम्बास्वरूपिणी
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योगमायां भुवनेरवरीं सस्मार । राघादद्यंनेन संभ्रमिता सा तुष्टाव तामद्रत- स्वरूपिणीं रसामृतान्धिल्हरीम् । आनन्दरूपां तां परमात्मनोऽनन्यरूपां च वणेयामास । राधा सव्रसम्पत्सम्पन्नं कदम्बवनं रचयेति तामाज्ञापयामास । कदम्बवनमेतद् वृन्दावनसदृगमेव रमणीयतरमासीत् । राधया स्मृतमात्र नरा नायंश्च तत्र समाजग्मुः । अत्र गोलोकवासिनां श्रीदामादीनां राधाङ्क- प्रभवाणां च महान् संमदं समजायत । राधापक्षीयेः कृष्णपक्षीयः सुबलो निग्रहीतो राधासमीपरं नीतदच । राधा तं श्रात्ृत्वे कल्पयित्वा ससम्मानं -स्वग्रृहे न्यवासयत् ।
सप्तविशत्यध्यायेऽस्मिन् भुवनेश्वर्या प्रेरिता राव त्रिपुरसुन्दरीभूता कृष्णसमीपं जगाम । स्वविरहज्वरेण विह्वलं स्वसौन्दयंवशीभूतं श्रीकृष्णं स्वनाम श्रावयित्वा राधा तमृदहीपयामास । तदा मुरलीं मुषित्वा हसन्ती पुनः कदम्बवनमाजगाम । मायात्रिषरसुन्दरीरूपा राधा अत्रव मन्तरद्रयं मृषावाद- निवर्तकं प्रचारयामास । श्रीकृष्णो मुरलीं करेऽदृष्ट्दा त्रिपुरसृन्दर्येव हृता सेति मनसि निधाय रोषताञ्राक्षस्तां भत्संयामास । भाद्रकृष्णचतुर्थीचन्द्रदशेनजं फलमेतदिति चिन्तयन्ती त्रिपुरा राध्या हृतां मुरद्ीमानेतुं कृष्णस्य दूती भूत्वा तत्र जगाम । बृन्दावननिवासिनो जनास्तया प्रबोधिता यन्नष्टचन्द्रः कदापि न द्रष्टव्यः । प्रमादात् दृष्टे सति कि करतैव्यमिति प्रष्टा च सा दृन्दावननिवा- सिभ्यो द्वौ मन्त्रौ उपदिदेश्च ।
अन्तिमेऽष्टाविशेऽध्यायेऽस्मिन् राधाङृष्णयोः प्रणयस्य चरमोत्कषं प्रदयन् ब्राह्मणः श्रीकृष्णप्रेरिता त्रिपुरसुन्दरी गोपालान् राधाकृष्णविनोदाख्यं नाटकं शिक्षयामासे'ति वणंयति। तत्र चन्द्रावलीं स्वदेहादुत्पाद्य कृष्णाय ददौ । ततो ज्ञानशक्तिभूतां सरस्वतीं मूरलीरूपां विदधे । सा मुरलीरूपा सरस्वती राधा- न्तिकं गत्वा कृष्णस्य परमात्मनो यज्ञो जगौ । कस्य वशगः श्रीङृष्ण" इति राधया पृष्टा सा भूरलीं हंषीमेतां पृच्छस्वे'त्यक्तवती । हंसी च ततो दुरं गता । मूररीस्वरूपया सरस्वत्या समृुपदिष्टं त्रैलोक्यमोहनं कामराजबीजं जजाप । तेन तुष्टा परमहंस राधां श्रीकृष्ण समागमवरं ददौ । ततस्तवरिपुर- सुन्दरी गोलोकमागत्य श्रीङृष्णाय सर्वं क्तंब्यमुपदिष्टवती । तदनुसारं च श्रीकृष्णो भ्रमरो भूत्वा पुष्पमालां प्रविदय ब्रन्दया साधं वृन्दावनस्थं राधिका- भवनं जगाम । पुरुषश्रेष्ठ श्रौकृष्णं दष्ट्वा राधिका तद्वशगा बभूव । अन्ते चात्र विस्तरेण राधाकृष्णयोर्गोपीगणस्य च रासमहोत्सवो वणित: ।
एवमत्र संक्षेपेण सम्पूणंस्य श्रीकृष्णयामलमहातन्त्रस्य प्रतिपाद्यजातं -समुपरस्थाप्य तद्वक्तृश्नोतृविषयकः प्रासङ्किको विचारः प्रस्तूयते-
३१ )
वक्तारः श्रोतारश्च
पाच्चरात्रसंहितासु सात्त्विक-राजस-तामसभेदेन संहिता विभक्ताः । भगवता -उगदिष्टाः संहिताः सा्तिकषयः, देवषिभिमंदविभिरच उपदिष्टा राजस्य मानवैश्चोपदिष्टास्तामस्य इति । यद्यपि नास्ति कृष्णयामलस्य संहिता- स्वन्तर्भावः, तथापि नारदो देवबिरस्य वक्तंति मध्यमे विभागेऽस्यान्तर्भावः कर्तं शक्यते । कृष्णयामल यद्यपि ब्राह्म णत्राह्मणीसंवादरूपेण प्रामुख्येन प्रवतंते, किन्तु सुशमेनामको गन्धर्वोजत्र ब्राह्मणरूपेण वक्ता । सच राधाकटाक्षप्रभवां दिव्यवृन्दावनस्थां विशालाक्षीं नाम तत्सखी बराह्मणी रूपधरां श्रावयति तद् यामलम् । गन्धर्वो भवति देवयोनिविशेष: । दिव्यवृन्दावनस्थाया विशालाक्ष्या दिन्यत्वं निविवादभिति देवोपदिष्टमेवेदं यामलमिति स्वीकतव्यम् । अपिच पुराणानां सात्तविकादिविभागो यथा विष्णुत्रह्मद्रपरतया योज्यते, तथैव कृते यामलानां विभागो सात्त्िके विभागेऽस्यान्तर्भावो भवति ।
नारदो महषिर््राह्म णव्राह्यणीसंवादरूपेण प्रदृत्तमिदं यामलमुपदिशति, किन्तु ्रथोविशत्यध्पायात् परं नारदस्योत्लेललोऽत्र न दृरयते । ब्राह्मणब्राह्यणी- संवाददच ग्रन्थमापिषयेन्तं विद्यत इति तन्मुबेनैवास्थ यामलस्य प्रदृत्ति- मन्तव्या । दशमाध्यायतो बकराम-श्रीकृष्णसंवादः प्रवतेते । नवमेऽध्याये गोप- बालकास्तरवो कताः पक्षिगो मृगाहच दिव्यद्न्दावनविषयक प्रश्नं बल रामाय पृच्छन्ति, वेणुवादनपरस्थ गोविन्दस्य रहस्यं च ज्ञातुमिच्छन्ति । दिव्यरूपा सरस्वती धीमतो बलरामस्य जिह्व ग्रस्था सती भगवन्तं श्रीकृष्णमेव पृच्छति, अगतरंशव सम्पगुत्तरयति । चतुदंशाध्यायतो भुवनेशवर्याः, सप्तदशाध्यायतस्त्र- चुरसुन्दर्याशच संवादः प्रवर्तते । एवमेव राधायाः, वशिन्यादीनाम्, कामेदवर्या- दीनाम्, बृन्दायाः, श्रीदामादीनाम्, राधाङ्घ्रभवानां च संवादा यथायथमत्र संनिवेदिताः सन्ति । अन्तिमेऽध्ययि च्रिपु रपुन्दर्याः श्री तायाः, सरस्वत्याः परमहंस्यादच संवादमुेन राधाकृष्णयोर्यामलभावो रासमहोत्सवर्च वण्यते ।
अन्तिमेऽष्टात्रिशेऽध्याये राधाकृष्णविनोदाख्यस्य नाटकस्य गोराङ्खस्य च चैतन्यापराभिधस्य चर्चा दृश्यते । संस्छृतवाङ्मयविवरणग्रन्थेषु नैतन्तामकं नाटकमस्माभिरूपलब्धम् । गोराङ्खस्य च चर्चा केवलं घरस्वतीभवनमातृकयोः वतते ।
एवमेव सरस्वतीभवनमातृकायामन्यतमायां षडध्याया अन्येऽपि सन्ति, सा च मातृक प्रन्थक्यास्य प्रथमे परिशिष्टे (पृ २२७-२५४) प्रकाशिता । तत्र ग्रथमे श्रीङकृत्णाविर्भावः, द्वितीये भौमढृन्दावनोपाख्याने दैत्यकुलाविर्भावः, तृतीये भौमदृन्दावनोपाङ्याने विष्णुसमागमः, चतुथे ज्ञानकाण्डे विष्णुमहा-
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( ३२ )
विष्णुक्षंवादे श्रीमदूदढृन्दावनोहशः, पचमे सदाशिवदशंनं सदाशिवस्तोत्रं च, षष्ठे दृन्दावनप्रवेश इत्येते बप्रिषयाः दुर्यन्ते । इतः परं मातुकास्पूर्णा वतते । सवंमेतत् पुनराढृत्तिरूपमिव दुरयत इति नास्माभिस्तस्य भागस्यात्र समावेशः कृतः ।
अयं प्रन्थः कृष्णतत्तवरहृस्यप्रतिपादनायेवाविरभूत इति तन्त्रविदामाशयः । संक्षेपत उपयुक्तं विवरणं श्रीकृष्णयामल महा तन्त्रस्य दिङमात्रनिदंशकम् ।
यामलतन्त्राणां वतते स्वकीयं किमपि दाशंनिकं वैरिष्टयम् । अतोऽत्र कृष्णयामरविषयकस्पास्य परिशीलनस्योपसंहा रात् पूवं केषाचचचन दाशंनिकानां तत्त्वानां निरूपणमावहयकमिति पूर्वाचायेपद्धत्या विज्ञेषतोऽभिनवगप्तपादस्य श्रद्धेयचरणानां श्रीमतां गोपीनाथकविराजमहोदयनां च सरणिमनुसृत्य किमपि सक्षेपेणोच्यते ।
दाशं निकं विवेचनम्
सामान्यतया भारतवर्षे आस्तिक -नास्तिकभेदेन द्वादशदर्शतानि प्रसि- दधानि । तत्र॒ जीवजगद्ब्रह्मणां स्वरूपलक्षणे याथातथ्येन निर्णति स्तः) तत्प्रवतकमहपिभिर्महतोत्साहेन वि चारशास्त्रस्प दृढां स्थापनां कृत्वाऽवयवभृत- पदार्थानां नि्णपेन सह ब्रह्म-ईरव र-अपूर्व नँ रात्म्यताद-अनेकात्तवाद-शरी रात्म- वादादिमतसंस्थापनट्वा राऽयमथंः सम्पादितो विचारित उपोद्बलितइच । किन्तु तत्र ठेशेनापि श्िवशक्तिपदार्थयोः, प्रकाशविमर्शंरूपयोश्चर्चां नायाति । नापि वणं मातृकायां सर्वातिश्ायिप्रकषः प्रष्यापितो विचारितो वा । ` विचारजास्त्र- ्रक्रमद्ष्टया महतीयं त्रुटिः प्रतिभाति । अतः शिवशास्त्रप्रणेतृभिः शिवशक्ती- तिपदार्थदरयं स्फृटीकृत्य अस्या महत्यास्तरुटेः परिमाजनं व्यधायि । गच्छन काठेषु हौ वशाक्तदशंनस्य प्रतिष्ठा साधकजनेषु उपन्र हिता । क्रियारूपेण जन- जीवने प्रतिव्यक्ति महत्या श्रद्धया समादृता च । तत्र लवदशेने शिव-रुद्र- ्॑रवभेदेन तिलो विधा भेद-भेदाभेद-अभेदात्मना निरूपिताः । प्रकादावि मशात्मिक तत्त्वम्
शैवेषु शाक्तषु चाद्रैतागमदजशेनेषु प्रकाशशब्दः शिवतत्त्ववाचकत्वेन प्रसिद्धः । दिवपारम्यवादिनः सैवाः, शक्तिपारम्यवादिनः शाक्ता इत्येव प्रधानो भेद एतेषु दशनेषु दुदयते । प्रक्रियान्तरं प्रायः समानमेव । अनयोदंशंनयोः सवंसम्मत्या षटत्रिशत्तत्वानि स्वीकृतानि । तेषु तत्त्वेषु शुद्ध-मिश्च-अश्ुद्धभेदेन तत्त्वानां
विभाजनमपि प्राप्यते । शाक्तद्शने शक्तिपारम्यमेव महता कण्ठेन समुद्- 1
१. तन्त्रालोकविवेकः (१.१८) २. तन्त्राखोकः (१.१८९)
३ { ३३ )
घोष्यते । अनयोदंशंनयोः प्रतिपादकमागमशास्वरं तन्त्रशास्त्र वा चिरकालात् - समादृतं दृश्यते ।
तन्वागमदशेनं तावदुपासनाप्रधानं दशंनमस्ति । बस्मिन् दशने अखण्डनीययुक्त्या सह अनुभवयोग्यविशेषतायाः सन्निवेशः। अत्र शक्तिसमन्वित- ब्रह्मवादमात्रमस्ति। अत एव शक्तोनां निस्तर ङ्खगता एव निर्गणब्रह्य इति वर्ण्यते । निस्तरङ्गात्मिका शक्तिः व्यापकमहाप्रकाशशिवस्वरूपतां भजते । एषा शक्तिरिचदिति वा अनुत्तर इति वा भण्यते । एष पूणं सत्यस्य आद्यः भ्रक।शः । अस्मिन्नेव पूणस्य स्वसिद्धपरमस्वतन्त्रताऽप्यस्ति । प्रकाशः स्वतन्त्रता च निरवच्छिन्नं तत्त्वम् । यथा प्रकाज्ञः स्वातन्त्यमयः, तथैव स्वातन्त्र्यं प्रकाशमयम् । तदेव आत्मस्वरूपं चंतन्यं च । तन्त्राचार्या एतत्त्वं स्वातन्त्र- मयी चिदिति संविदिति वा बोधयन्ति ।
विश्वोत्तीर्णा विश्वमयी च संवित्
सषा संविद् विरवोत्तोर्णा विइवमयी च भवति। व्िहवोत्तीर्णा संवित् स्वेच्छातो विरवमयी भवति, अर्थात् विदइवस्य सृष्टचादि व्यापारदिचतेः स्वे- च्छातो भवति । सा पराशक्तिः परमशिवतोऽभिन्ना । विदवस्य उत्पत्तिरा- विभावो वा सृष्टिः, परप्रमातृस्वरूपे विश्रान्तिस्तिरोभावो वा संहार इत्युच्यते । सर्वदा सम्पण जगदस्यामनतिरिक्ततया अवतिष्ठते । परन्तु यदाऽस्यामूत्सिमृक्षा भवति, तदा अभिन्ना सत्यपि सा भिन्नेव प्रतिभाति । एतदथंमन्येषामृपादान- कारणादीनामावश्यकता नास्त्येव । एतदेव विश्वसृष्टेः रहस्यमस्ति । एतादश्- सृष्टयादौ देश-काल-आकृति-कायेकारणभाव-आाश्र यादीनां किमपि प्रयोजनं नास्ति । साक्षात् पराशक्तिरेव स्वेच्छया जगद्रूपेण प्रतिभासते । निष्कर्षोऽय- मस्ति यत् चिच्छक्तिः स्वस्वातन्त्यवशात् स्वेच्छानुसारमनन्तानन्तजगद्रूपेण स्फ़रिता भवति । तदुक्तम् - स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति' ^ इति । अपि च--
जगच्चित्रं समालिख्य स्वात्मतूलिकयात्मनि । स्वयमेव तदालोक्य प्रीणाति परमेदवरः: ।। इति । चिदात्मभित्तौ विश्वस्य प्रकाश्ामर्शाने यदा। करोति स्वेच्छया पुणंविचिकीर्षसिमन्विता 3 ।। इति च ।
१. प्रत्यभिज्ञाहूदयम् (सूत्रम्-२) २. महाथंमञ्जरीपरिमखोद्धृतम् (प° १२१) ३. यो गिनीहूदये, चक्रस ङ्कु तनिरूपणे (रलो ०-५६)
८ ४)
चितो विकातेन सह जगत उन्मेषावस्था स्थितिश्च भवति, तथेव संकोचावस्थया सह जगतो निमेषस्तिरोभावो वा भवति । तदुक्तं स्पन्दकारि- कायाम् , --'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रल्योदयो ।' इति ।
आत्मा चैतन्यस्वरूपः २ । चैतन्यमेव तस्य स्वातन्त्र्यम् । अप्रतिहतेच्छा- श्रयमेव तत् । बाह्योन्मुख्यस्थितायाः समस्तज्ञानक्रियाया नित्योऽवाधितो- ऽमेदात्मकः सम्बन्ध एव इच्छागक्तेर्भूमिकायामाविभंवति । तदा विरवमात्म- स्वरूपेण आभासमानं भवति, यचपि इयमाभासता अभेदमूलिका भवति । अन्तमुंखदजायां समस्तविदवभावा विगकितरूपेण महाभावावस्थारूपेण अन्तं दि प्रकाशिता भवन्ति। महाशक्तिद् ष्टचनुकरूलतानन्तरं विदवोन्मुखताया अप- गमनेन सह॒ चितिरूपेण प्रकाशस्वरूपेण वा स्वं प्रकटीकरोति । एनामनुत्तर- महाप्रकाशस्वरूपवित्कलामाध्रित्य इदं जगद् नित्यं प्रकारितमस्ति प्रकाश्यमा- न्च । चिदानन्देच्छाज्ञानक्रियारूपपश्शक्तीनां सामरस्यदश्चव अखण्डमहा- शक्तिरुच्यते । एतासां महाशक्तीनां समरसता अथवा शिवशक्त्योः समरसतेव अद्वैतं ब्रह्मतत्वमुच्यते ! इदं तत्त्वलूपेण विभक्तं सदपि तत्त्वातीत मुच्यते, शिवशक्तयो रविभक्तता तत्र कारणम् । विरवद्ारी रो भगवान्
आत्मस्वरूपस्य परमेडवरस्य विश्वमेव शरीरम् । वस्तुतः शुन्यादारभ्य बाह्यघटपटादिपयंन्तं सर्वं॑दृश्यं वस्तुजातमात्मनः शरीरम् । यथा शरीर धारिकीटादयोऽपिं स्वात्मानुरूपश्रितिमन्तो भवन्ति, तथा विश्वशरीर: पर- मेश्चरोऽपि स्वात्मानुकूलशकतिमान् भवति । योगिनामनुभवानु सारेण परामशं- शू्यतादशायां समस्तबाह्यदुदयविभूतीनामनुभूतयः स्तिमिता भवन्ति, अन्तः- संजल्पस्तेषु प्रादुभवति । अत एव विश्वं आत्मनः शरीरमिति ते वदन्ति । एदादुगनुभरूतिषु जाग्रदवस्थायां पिण्डाण्डवद् ब्रह्माण्डेऽपि सवत्र स्वस्वातन्त्य- शक्तेः स्फुरणमवलोक्यते । सा शक्तिन्मेषनिमेषोभयात्मिका भवति, अर्थात् स्वरूपोन्मेषे विश्वस्य निमेषः, स्वरूपस्य निमेषे च विश्वोन्मेषो जायते । इमौ व्यापारौ तुलाधृतिवत् सम्पन्ने भवतः । अत एव परमेश्वरस्य विश्वात्मत्वं विश्चोत्तीर्णैत्वं च कथ्यते। उभयोः परस्परसखापिक्षत्वादेव सम्रधानता स्वीक्रियते । यथोच्यते महेश्व रानन्देन *--
१. रलो ०-१
२. शिवसूत्र, प्रथमे प्रकाशे (सूत्रम्-१)
३. यततिपिण्डे तद्ब्रह्माण्डे
४. महाथंपरिमलोद्धृतं परास्तोत्रम् (प° ७४)
, ^ 4) > ^ न
त
( ३५ )
एके भजलखानिकानलकलारन्धां बहिः प्रक्रिया- मुत्तोणंत्विषमन्तरेव कतिचित् चित्काकणीमूचिरे । अन्ये केचन यामलामृतसरित्संभेदसंभो गिनो मातस्त्वामपुथक्प्ररोहभुभयो रौचित्यमा चक्षते ।। इति । विश्वस्योन्मेषावस्थायामथवान्तरिकचिच्छक्तेनिमेषावस्थायां षडध्वन उन्मेषदशायाः परिमाण आपेक्लिको भवति । विश्वस्य निमेषावस्था स्वात्मनः अन्तरावस्था वा प्रलयो भवति समस्वभावः । परन्तु तदानीं विश्वस्य निमेषा- चस्था कलनावस्था एव । परात्रिशिक्ायामृुच्यते^ हि-- यथा न्यग्रोधबीजस्थः शक्तिरूपो ममद्र.मः । तथा हृदयबीजस्थं जगदेतच्चराचरम् ।। इति । सर्वाकारस्थितेरभिव्यक्ितिः कलनमित्युच्यते । अस्यां विश्वस्य समस्त- विचित्रता अविभाज्या भवति। अत्र परस्परयोविभागो नास्त्येव । यतो वैचित्यभावदशायामून्मेषस्य सम्भव एव नास्ति, अतो विश्वस्य उन्मेषा- वस्थायामात्मस्वरूपस्य केवलं ति रोधानमेव भवति, अत्यन्तोपप्लवस्तु न । यक्ता एतादृशाद्वैत मतं द्ैतकल्पमेवाभिमन्वते । तदेव संविदुल्लाते उच्यते~-- दैतादन्यदसत्यकल्पमपर रद्रेतमाख्यायते तद् द्वैते बत पर्यवस्यति कृतं वाचाटदुविद्यया । एते ते वयमेवमभ्युदयिनोः कस्यापि कस्यारिचद- प्यालस्योज्ज्ञितसमेकरस्यमुभयोरद्रे तमाचक्ष्महे । इति । सामरस्यम् एतदेव सामरस्यमित्युच्यते । समस्तविश्वव्यवहारोऽपि त्रिपुटः क्र डनमेव । तस्या अतन्राले चिच्छक्तिर्ञान कला वा अधितिष्ठति । इयमेव एकतो विषय- स्वरूपा या ज्ञानविषया, तथैव परतो भोक्तृत्वस्य अथवा वेदितायाः संयोजिका वर्तते। एकतो ज्ञातृत्वं परतदच ज्ञेयत्वम् । एते उभे तादात्म्यसम्बन्धस्य आधारे । एषा एकस्वभावता त्रैकोकस्य प्रकाशिका भवति । वेद्य-वित्ति-वेदकाः, स्थूल-पृक्ष्म-पराः, ज ग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तयः क्रमशोऽवस्थाभेदेन एकस्वभाव- तायास्त्रयः प्रकाराः सन्ति। सत्त्वस्य दृढताया अभावे परस्परयोः पृथक्ता अवर्यम्भाविनी, तथापि प्रायः पृथक्ता न भवति । अतएव त्रैलोक्यशब्द- स्त्रिधाविभक्तानां विश्वस्य त्रिकात्मकानां सर्वेषां बोधो भवति । यथा-- त्रिदेवाः, अग्तित्रयम्, त्रिशक्तयः, त्रिस्वरम्, त्रिलोकी, त्रिपदा, त्रिषृष्करम्,
१. परात्रिरिका (दलो ° -२५) २. महाथंपरिमलोदधृतम् (प° ७५)
( ३६ )
वरिब्रह्याणः; वर्ंत्रयमित्यादयः । एतस्मादेव निमेषोन्मेषयोः कडचन विरोधो नास्त्येव । अतएव स्पन्दसन्दोहे ` उच्यते-'एवमियमेकंव अविभाग वि मर्राभूमिः उन्मेषनिमेषमयी उन्मेषनिमेषषदाभ्यामभिधीयते इति । अतः शवितविमर्शो वा 'सर्वसह'पदेन अभिधीयते । प्रत्यभिज्ञाविमशिनीकार एवमाह -- 'विमर्यो हि सवंसहः परमपि आत्मौकसोति, आत्मानं च परीकरोति, उभयतेकीकरोति, एकीकृतं यमपि न्यग्ावयति'२ इति । अथंतो विमंस्य अप्रतिहतं सामध्यंमस्ति । एतस्मात् कारणादेव परभपदं सदिति, असदिति, सदसदिति, सदसदतीतमिति च व्यवह्ियन्ते । यथा परामतम्रन्थे 3 उच्यते-- परीकत्त' निजं तत्तवं स्वात्मीकत्त तथोभयम् । एकोक्तः न कि कत्त, विमर्शो जगति क्षमः ।। इति ।
संविदुल्लासे व्णितैक्यरसमेव समरसता अस्ति। शाक्तदशंनानुसारेण तुरीयपरमस्थितो सत्यासत्ययोविरोधो नास्ति । “संविदेव भगवती वस्तुपगमे नः शरणम्" अथवा "संविदेव भगवतो विषयसस्वोपगमे शरणम् एतद्गुर- मतेऽपि स्वीकृतमस्ति । ते कथयन्ति -- स्थुरणं भरकाशमानतय अनुप्राणि- तमस्ति" इति । यथाथेपुष्पवत् कल्पिताकाशकुसुमेऽपि स्फुरणं वतंते । अत एव अभिनवगुप्तः `स्पुरत्तव महासत्ता' इत्युक्तवान्, या आकाडकृसुमेऽपि व्यापक- रूपेण वर्तते । समानत्वं नाम कोऽप्यतिरिक्तपदार्थो नास्त्येव, अपितु विकल्प. हीना महाशषक्तिरेव सामान्यम् । समस्ता जगद्रूपा व्यक्तयस्तस्येव विकल्पाः सन्ति । विश्वमात्रं हि अस्या वि षयमस्ति । द्वयोः पदा्थंयोः प्रत्येकस्मिन् एकस्वभावता एव एकरसता । पदाथंद्रयस्य वैलक्षण्यं यदा चिदग्नौ दग्धं भवति, तदा भेदावभासता तिरोहिता भवति ।
विचित्ररूपं सभस्तं विश्वं हि प्रकाश्षवि मयो रन्तगंतमस्ति । द्रयोभदस्तु., ओौपचारिकः, न तु वास्तविकः । उदाहरणार्थं यथा-- किमिच च्चित्र विशेषे दुष्टिभेदेन गजदृषभयोः प्रतिभासो भवति । प्रमातुरनुसन्धानानुसारेण तच्चित्रं एकस्य कृते गजरूपेण अन्यस्य करते दृषभरूपेण भासमानं भवति । किन्तु अभेदख्येण गजशब्दतः, अथवा वृषभशब्दतो वा ज्ञातुं शक्यते । सामान्यतया ज्ञातुं शक्यते हि ्रप्येकपदाथ॑स्याकृतिनिदिचता वर्त॑ते, सा आकृतिः पदार्थं न व्यपोहति । परन्तु स्वतन्त्रतायुक्तादवैतसंविन्मार्गे किम पि तत्तवं स्वव्यतिरिक्ता- ज्ञेषशावात्मकत्वेन अभिन्नं स्वीकृतमस्ति । अत एव सर्वं सर्वात्मकमित्युच्यते #
१, स्पन्दसन्दोहः (प° ९) २. ईदवरप्रत्यभिज्ञाविम शिनौ (१,५.१३ ) ३. महा्थ॑परिमरोद्धृतम् (प° ७७)
( ३७ )
यथा व्यवहारदशायां एकस्य दृष्टौ घटः, अन्यस्य मृत्तिका, तृतीयस्य च द्रव्य रूपो दुद्यो भवति, तथेव एक एव मूलपदार्थो दृष्टिभेदेन विदवमूतिरूपेण ` ब्रतिभासितो भवति । बहवो शाक्तयोगिनः स्वस्य तापेव परमानुभूति यामली- सिद्धिरिति वदन्ति । यत्र प्रकाशविमर्घंयोः शिवशक्त्योर्वा सामरस्यं वतंते । पराध्रििकायामिदमेव सद्रयामलमित्युच्यते । क्षणमात्रमप्यस्य सामरस्यस्वा- नुभावात् जीवनमुक्तिभंवति । तत् केवलं गुरुकृपात एव भवितुमहेति ! यथा अभिनवगु्महोदयाः वदन्ति - "अभ्यासेन विनापि जीवन्मुक्तता परा कौलिक सिद्धिः' इति । प्रबोधपच्ाशिकायामप्युच्यते-
“तस्या भोक्तव्या स्वतन्त्रायाः भौग्यैकोकार एव यः । स॒ एव भोगः सा मुक्तिस्तदेव परमं पदम् ।। इति । शाक्ताः प्रचलिताद्रैतसिद्धान्तं बाह्य द्रैतत्वेन मन्यन्ते । अत्र मात्मा तावत्
सचिचदानन्दस्वरूपः, विश्वातीतः, निमंलः, निराकारः, अनादिः, अनन्तः, सृष्टिस्थितिसंहाराणां भूमिः संविन्मयश्च । अत एव स॒ आत्मा अभावेन असंसृष्टः स्वयंप्रकाशः नित्यमुक्तश्च । शाक्ता आत्मनि अकतृं त्वं ना ङ्खीकु- वन्ति) आत्मा स्वभावत एव कतृं त्वशक्तिमानस्ति । कतुं त्वराक्तेरभावे स विम्शंको न भवितुमहैतीति ते आत्मनो निष्क्रियत्वादिकथनमसत्यं मन्यन्ते । इयं कतुःत्वशक्तिः "जानाति करोति चः इति क्षेत्रयोः समाना । ज्ञातुरध॑मत्ना- देव क्रियासत्यपि तज्जञानमप्यस्ति। अत एव कतुं त्वस्वभावादेव ज्ञानमपि क्रियास्वरूपमस्ति। एतयोः क्रियाज्ञानयोरुन्मुली भावस्येव नाम इच्छा वर्तते । एतत् समस्तं जगदपि इच्छाया एव स्फुरणम् । अत एव शाक्तः कथयन्ति यद् आत्मनः स्वभावो विमं इति । शक्ति-रेहवयं-उद्यम-स्पन्द-स्वातन्त्य-स्फूति- उ्मि-ओजस्-कला अस्यैव नामान्तरमत्रम् । तन्त्रागम शास्त्रेऽस्मिन् विर्भिन्न- दुष्टिभिरेकस्यैव वस्तुनः कतेऽनेके शब्दा : प्रयुज्यन्ते ।
सामान्यतया साम्यभावानां समभावानां वा प्रतीतिरेव सामरः स्यपदवाच्यम्१ । वैषम्यरहिता एव सामरस्यावस्था । कालचक्रस्म श्रमणे साम्य-वैषम्ये क्रमश उदभवतः । एतस्य कारणं इदमेव यत् साम्यावस्थायां वैषम्यस्य बीजं निहितं वतते, तत् कालानु्षारेण अङ्कुरित भवति । साम्था- वस्याया भङ्खे वैषम्यस्य आविर्भावो भवति । सृष्टि रहस्येऽस्मिन्नपि अयमेव कमः प्रचलति। तथैव वैषम्यावस्थायामपि साम्यस्य बीजं वरीवति, यत् कालान्तरे पक्वं सत् साम्यस्य उदयाय कल्पते ।
साम्यवैषम्पयोमेध्ये एका गभीरा क्रीडा विद्यमानास्ति, किन्तु तस्यां द्योः
१, तान्त्रिक वाङ्गमय में शाक्तदुष्टि : गोपीनाथ कविराज, (प° १६०)
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( ३८ )
परस्परं मेलनं न भवति, यत आकषेणस्य अनुरूपा विकषेणात्मिका शक्तिरपि साद्धैमेव क्रियाीला वतंते। अत एव द्रयोमैध्ये व्यवधानस्य व्यपगतिनं भवति । प्रकृतेव्यं वस्थायामयं व्यापारो निरन्तरं प्रचलितो भवति । एताभ्या- माकषंणविकषंणाभ्यां मुक्त्यर्थं उपायौ द्रौ स्तः । तत्र प्रथमस्तु साम्यवेषम्य- योमैध्ये एकैवाकषंणक्रिययोरुन्मेषः । द्वितीयस्तु एकस्याकषेणदलायां परस्य विकषंणमवगुण्ठनम् । प्रथमोपायतो मध्यबिन्दोः प्राप्त्या अव्यवहितरूपेण योगस्य संघटनं भवति । अयं योगो निरपेक्षसमता इत्युच्यते । अस्मिन् आकर्षणविकरषणयोः प्रधानता नास्ति। द्वितीयोपायतो व्यवधानेन सह् क्रमशो योगः संघटितो भवति, किन्तु अयं गरणप्रक्षानभावाभ्यामलून्यतावस्था- रूपकारणात् सापेक्षसमतायोग इत्युच्यते । परन्तु एकदा प्रधान्यनिमित्तकक्षमता- नन्तरं पुनर्वेषम्यस्य प्राधान्यनिमित्तकसमतायाः प्राप्तिर्भवति । एवमेव क्रियाया वारं वारमाविभ्वि सति चरमावस्थायां प्राधान्याप्राधान्ये समाने भवतः । तथव नि रपेक्षसमताऽऽविर्भूता भवति । एतदेव सामरस्यम् ।
एषा सामरसावस्था अद्वयतत्त्वमप्युच्यते, यतोऽस्यां वंषम्यस्य बीजं नास्ति । इयं चिदानन्दमयी अद्रौ तनिष्ठा अस्ति, किन्तु एतस्याः परावस्थाऽपि वतंते । एषा केनचिदपि नाम्ना अभिधातुं न शक्या । एषा बुद्ध चतीता, विचा- रातीता, ध्यानातीता, अव्यक्ता स्वयंप्रकाशा च । इयमेव निविकल्प-निरुत्थान- निद्र न्दरस्थितिरुच्यते । पूणंसत्यः स्वातन्त्यमथ अखण्डप्रकाशोऽपि, सर्वातौतः सर्वात्मकरचापि । वेदोऽप्येनं चकितमिव परयतीति पुष्पदन्त आह -- “अतद् व्यावृत्या यं चकितमभिधत्ते भुतिरपि' इति ।
परत्रह्म-परश्िव-पूर्णादिशब्दा एतस्यैव नामान्तरम् । स॒ सवत्रैव वतते गु्रूपेण मनुष्यशरीरेऽस्मिन्नपि । स कुल-गोत्र-जाति-वणे मयत्वेन बोध्यमानोऽपि एतेभ्यः शन्योऽस्ति । निष्करत्व-सकलत्वादिकं सवंततत्वस्वरूपत्वात् सवं तदेव । स एतान् समस्तान् नित्यलीलालूपेण यदा प्रकटयितुं सन्नद्धो भवति, तदा तस्मिन् इच्छाया आवि्भावो भवति । इयमिच्छा इच्छाहीनस्य ईच्छात्वाद् वस्तुतः स्व।तन्त्यस्य विलासमात्रमस्ति । इच्छाया उन्मेषमात्रेण तत्तवातीतं महाघनस्वरूपं तत््वमात्मन आभ्यन्तरत रिचच्छक्तेविकासमनुभवति, यतः क्रमशः पञ्चशुद्धतत्त्व-अष्टतनु-अण्डव्रह्माण्डादिकालकत्पितप्रपञ्चस्योत्पत्तिर्भंवति । एत- स्थारिचच्छक्ते राविर्भावस्तावत् परमरिवे स्वातन्त्यशूपया निराकारया परा- शक्त्या सह परशिवस्याभिन्नसंयोगेन भवति । चिच्छक्तिविरवजननी, अहन्ता- यारचापि जननी अस्ति । इयमहन्ता चिदणुरूपा चिदंशा च ।
सृष्टेः पूर्वं एकाकी परमशिवः अशब्दोऽरूपरच । सः शिवज्ञानभुक्तः
(\ -३#. )
शिवांशः स्वस्य ज्ञानदृष्ट्या स्वात्मानं परमरिवत्वेन परिजानाति अनुभवति च । इयं ज्ञानदुष्टिरेव आनन्दावस्था इत्युच्यते । एतस्यामवस्थायां शिव अंशी यथा अंशं पयति, तथैव अंशो जीवः शिवमंशिनं परयति । आत्मा तावत् तत्समये देहबीजरहितोऽशरीरी निर्मलस्वरूपः शिवांशो भवति । तपरचाद् आत्मनो विस्मृत्या शिवाहंभावस्य विस्मृत्या च देहेऽहं भावस्य प्रादुभविो भधति । परमशिवतत्तवं बिन्द्रतीतम्, बिन्दुस्तु चिदभाव एव । बिन्दुरत्पत््य- नन्तरम् ऊर्ध्वाधः स्पन्दितो भवति । उध्वंगमनशीलबिन्दोर्योगिन चिति समस्त- तत्वानि गर्भस्थानि भवन्ति । ततरिचतः प्रपच्वस्योत्पत्तिर्भवति । सृष्टयादौ स्वस्य स्वाभाविकं पिण्डं कायं वा विस्मृत्य मिथ्यापिण्डं धारयित्वा जीवौ जन्मग्रहणं करोति । तस्मिन् काले परब्रह्म आत्मनि प्रतिविम्बितं भवति । कालान्तरे च प्रतिविम्बभावः परब्रह्मणि निगीर्णो भवति। एवं रूपेण मायायाः प्रभावो वधंते । इत्थं जन्मजन्मान्तराणि व्यतिक्रामन्ति । आत्मविस्मृतो जीवोऽपि (अहङ्कारयुक्तः) वस्तुतरिचच्छक्तेरंश एव । अत एव॒ स आत्म! चिदणुरित्युच्यते । सद्गुरूणां कृपातो जीवशक्तिर्जाग्ता सती भक्तिरूपेण परिणम्य ऊर््वमुखी भूत्वा प्रवाहिता भवति । ज्ञानशक्त- विकासोऽस्या ऊध्वं मुख्पाः शक्तेविकासस्यैव नामान्तरमस्ति । अयं विकासः स्थाने-स्थाने संघरितो भवति । शिवस्य जीवस्य च, एवं दिवशक्ते जी वराक्तेश्च मेलनम् ऊध्वंमागे प्रत्ये- कस्यां भूमिकायां भवति । यथा यथा उपयुपरि उत्थानं भवति, तथव जीवस्य आत्मनश्च व्यवधानं खण्डितं भवति । एवमेव शक्त्यो योर्व्य॑वधानस्यापि ह्वासो भवति । अन्ते च सामरस्यभावस्य उदयो भवति । तदा जीवस्य भक्तिरूपा शक्तिः शिवस्य चिच्छक्त्या साकं समानरूपेण मिलिता भवति, इयं समरषा भक्तिरित्युच्यते । श्वद्धा-निष्ठाऽ्रधानानुभवानन्दात् परम एष समरसभ।व उदितो भवति। तदा जीवो जीवात्मना सन्नपि हिवस्वरूपौ भवति । एवमेव भक्तिरपि रक्तिस्वरूपा भवति । अयमेव महायोगः सामरस्यं वा। खीष्टमतानुयायिनां धर्मंग्रन्थे या अवस्था (0णााप्रप्रल इत्युच्यते, रहस्यवेदिनो यां 07100, ०५५८ [1 इत्यादि नाम्ना बोधयन्ति, सा सामरस्यस्यैव आभासः । एतस्यामवस्थायां एकमात्रस्वह्पा स्वयंप्रकाशा अद्रयरसतत्त्वा सामरस्यमयी भक्तिरेव वरीवति । इयमेकंव सतः प्रकाशत्वात् ज्ञानम्, एवं ज्ञाने पृथग्भावस्य आस्वाद्यमानत्वात् भक्तिरसस्व- रूपाऽति । इयमद्रैतभक्तेरवस्था । इतः परमेदवरभ्रसादस्य वर्षणं यदा भवति,
तदा समग्रं विर्वमात्मस्वखूपेण प्रतिभासितं भवति । सामरस्य महिमसन्दभे कं दिचदुच्यते -
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कर्ता कारयिता कमं करणं कायंमेव च। स्वंमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेररात् ।, भोक्ता भोजयिता भोज्यो भोगोपकरणानि च । सवंमात्मतया भाति भ्रसादात् पारमेरवरात् । जीवात्मा परमात्मा च तयोभेदश्च भेदकः । सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ।॥ इति । सामरषस्थ मूरमेतावदस्ति यत् तस्मिन् स्वं निहितमस्ति, तत्र च द्वैतं नास्ति। लयनिर्वाणादिभ्योऽप्यतीतमेतत्तत्वं शक्तिशक्तिमतोः सामरस्यल्पं यामलतत्त्वम् । इत एव प्रादुरभैवन्ति यामलादीनि शास्त्राणि । यापमकावस्या साधका: स्वरचिवैचित्रपानुसारं परमतत्त्वं पुरुषभावेन रमणीभावेन वा समाराधयन्ति । प्रत्यभिज्ञ(दर्शतश्य परमशिवः, त्रिपुरामतस्य षोडशीदेवी ललिता वा, वैष्णवमतानुसारं च श्रीकृष्ण एव सच्चिदानन्दस्वरूपभ्रूतः ।
एतदेव हि परमतत्त्वं विभिन्नप्रतीकेषु कलिपतमस्ति । मूरतत्त्वं न पुरुषो न वा प्रकृतिः, किन्तु तयोरभेदात्मकप्ामरस्यमात्रम् । जगतः सौन्दर्यम् अखण्ड
पूणैस्वरूपस्य तस्य कणमात्रं छाया देश्वयं वास्ति । उक्त च-'तस्य भासा सवंमिदं विभाति "^+ । अद्वयं तत्वम्
अद्रैतमतानुसारं विश्वस्य मूले एकमद्रैतततत्वमेव विद्यते । इयं परमसत्ता वाचा मनसा बुद्धया वा न गोचरीकत्त शक्या । इयमखण्डा, एकरसा, निष्कला च वर्त॑ते। इयं परमा पूणंसत्तैव वस्तुतः 'सत्'पदवाच्या । उपनिषदा एतत्स्वल्पनिर्देशप्रसङ्खे परमं साम्यं पूणेत्वं च निगदितम्२ । आगमास्ते एतत्तत्त्वं तत्त्वातीतमथ च तत्त्वात्मकमित्युभयात्मकत्वेन प्रतिपादितम् । एतद् विश्वात्मकं सदपि विश्चातीतम्। एतदेव हि विश्वस्य प्रादुभाविद्रारम् । एतदपरसाम्यम् । एतत्तत्त्वमेव महावबिन्दुरिति कथ्यते । एतस्यां नित्यावस्थायां रिवलक्ति-ब्रह्ममाया-पुरुषप्रकृतयः सर्वाः समरसीभूताः सत्य एकाकारतां भनन्ते। एतत्ततत्वमनन्तवे चित्ययुक्त सदपि स्वरूपतया एकाकारम् । एतत्तत्वातीतं कलातीतं निरञ्जनमखण्ड ततत्वमस्ति3 । कौलान। परमशान्ता
१: कठोपनिषद्, (२.२.१५), मुण्डकोपनिषद्, (२.२.१०), उवेता ० (३.१४) २ ॐ पूर्ण्॑रदः पूणंमिदे पूर्णात् पुणे¶रुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूणंमेवावशिष्यते ॥ ३ पिण्डं कुण्डकलिनीशक्तिः पदं हंसः प्रकीतितः ।
रूपं बिन्दूरिति ज्ञेयं रूपातीतं निरञ्जनम् ।। --गुरूगीता
( ४१)
कूलभूता स्थितिरियमेत्र । एतस्मादेव हि तत्वात् सम्पूर्णस्यापि विश्वस्य उद्भवः, स्थितिः, रयदच भवन्ति । न केवलं विश्वस्यव, अपितु विश्वपितुः
^ > शिवस्य विश्वमातुः शक्तंश्चापि एतस्मादन्यक्तकुलादेव प्रकाशो भवति ।
शिवः अकुलः, शक्तिश्च कौलिकी) ।* एतद् रयं चित्स्वरूपम् । शिवः प्रकाश- रूपः चिदस्ति, शक्तिश्च तत्प्रकाशस्य आत्मविमशंरूपिणी चिदस्ति । ` एतद्द्वयं मूलत एकमेव । अव्यक्तावस्थाय स्फ़रणार्थमेकमपराश्रिम् ।
अत्रायं भावः - शिवं विना शक्तेरस्तित्वकल्पना न कर्त शक्यते । एवमेव शक्ति विना हिवः शव एव 3 चितः शास्त्रीयं नाम अनुत्तरमिति । वर्णमालायाः ्रतीकभूतः "अकार इति भावः । ज 'वणेदरारा अनुत्तरस्य बोधो भवति, “आ'कार आनन्दस्य प्रतीकभूतश्च ।४ यद्यपि परमसत्ता
निरंशभूता, तथापि बोधसोकर्याय एतद् अंशद्रयं कल्पितम् ।* परमतत्त्वं तु
सर्वदा अव्यक्तमन्याकृतं चास्ति । सैव चिरनिगूढस॒त्यस्य गभीरतमा स्थितिः । तदेवाधित्य तस्य प्रकाशदिचदृरूपेण प्रकाशमानो विद्यते । प्रकाशरूपस्य
निवस्य विमक्षरूपिण्याः शक्तेश्च संघटटं विना सृष्टरूपक्रमो भवितुं नाहंति । अयं दिवशक्तिभाव्रो नित्या विभक्तिः। अयं स्वरूपतो विभक्तः सन्नपि उयावहारिकदृष्टचा पूरण॑तामपूणतां च धत्ते ।
पूणतावस्थैव अद्र तस्थितिः। तत्र शिवः शक्तिदच समरसभावेन वर्तेते । शिवः शक्त्यात्मकः शक्तिश्च शिवात्मिकेति भावः । एकमेव हि वस्तु स्वात- ज्टपरमयनोधेन बोधमयस्वातन्त्येण वा परिलक्षितं विद्यते । श वद्ष्टधनुसारं स्वातन्त्यमयबोधं मत्वा परमशिव इति कथ्यते, शाक्तदष्टया च बोधमयस्वा- तन्त्य मत्वा पराशक्तिरिति कथ्यते । वस्तुतः एकस्यैव परमार तत्त्वस्य नामद्वयं विद्यते । इयमेव पूर्णावस्था । यामर्च्ातः
अपरस्यामवस्थायामवस्थादयी लक्षिता भवति--
(क) तत्र एकया दृष्टचा शिवशक्तयो नित्याविभक्तायामवस्थायां द्रष्टृदिद्- क्नाभेदेन एकस्य प्राधान्यं भवति, शिवस्य प्र धान्यं शक्तेर्वा । शिवस्य प्रधान- १. अनुत्तरं परं धाम तदेवाकुल मुच्यते ।
विसरगस्तस्य नाथस्य कौलिकी शक्तिरुच्यते ।।--तन्वारोकः (३.१४) २. मन्त्र भौर माचिका का रहस्य : डं शिवशंकर अवस्थी, (प° १५१) ३, शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शाक्तः प्रभवितुम् ।
न चेदेवं देवो न खल् कुशलः स्पन्दितुमपि ॥ - सौन्दर्यलहरी (श्लो °- १) -४, “अनुत्तरानन्दचिती इच्छाशक्तिनियोजिते'-- श्री तन्त्राखोके (३.९४) । ५. "विद्रषाह्नादप रमो निविभागः परस्तदा"--शिवदृष्टिः (१.४)
( ४२ )
तायामपि शक्तिस्तिष्ठति, शक्तेच प्रधानतायां शिव स्तिष्ठति । तत्र॒ शिव आत्मविश्वान्तो भवति शक्तिरपि आतत्मविश्वान्ता । निरपेक्षावस्थायामेकः परं प्रति उन्मुखो न भवति । चित्स्वरूपं सदपि उभयत्रापि विलक्षणम् । शास्त्रानु- सारमियं स्थितिः "एकबीर' नाम्ना प्रसिद्धास्ति । एतस्यामवस्थायां शिवः शक्तिरच अभिन्नौ स्तः । तत्र मिथः कर््मिरिबदप्यंशे वेरिष्टच' नास्ति ।
(ख) अपरदृष्टचा शिवः शक्तिडच यामलरूपेण अवस्थितौ । विइवसृष्टेः पूवंमियमवस्था अत्यावदयकी । अस्यां स्थितौ शिवः शक्तिश्च मिथ उन्मुखो स्तः२ । अनेन यामलेन भावेनैव सृष्टेरुन्मेषो भवति । इच्छाशक्तावेव विदव- सृष्टेभूमिका निर्मिता भवति । शिवशक्त्योमिथ उन्मुखतया संघटुस्य आनन्द- राक्तेर्वा समुदयः । आत्मन इयमेव उच्छलनावस्थापि कथ्यते । मूलतः प्रकाश- रूपः शिवो विमर्शहूपा परासंविच्च, एतद्द्रयमप्यनुत्तरभूतम् । तत्र एक तत्तवं वर्ण॑नातीतं विरवातीतश्च, अपरं च तत्तवमसद् वर्णात्मक महामायारूपं विश्वा- त्मकं च । एतदद्वयं नित्यं समुदितं भवति, तत्रैकस्य उदयास्तमयभावोन भवति । उक्तं च--'नोदेति नास्तमेत्येका संविदेषा स्वयं प्रभाः इति) एतस्यां स्थितौ एकं तत्त्वं चिद्रूपेण बिम्बस्थानीयम्, अपरं च आत्मप्रकाश- रूपेण प्रतिष्ठितं विद्यते । द्रयोदिचतोरेतस्यामवस्वायां परस्परमाभिभूख्यम् । अनुकूलसंवेदनरूपेण च यद प्रकागो भवति तदाऽयमानन्दः कथ्यते । अयमा-
नन्दो ह्खादिन्याः शक्तः स्वरूपम् ४ । चिदवस्था अनुकूलप्रतिकरूलभावरहिता भवति, आनन्दावस्था च नित्यानुकरूलभावमयी ।
स्फुरणात् पूर्वं योरिचतोमूे यद्यप्येका चिदस्ति तथापि स्फुरणानुसार रूपद्वयं ग्राह्यमस्ति । एतदाभिमुख्यानुसारं द्रयोस्तीत्राकषणक्रिया अनुभूयते । तत्प्रभावेण च एका मन्थनक्रिया प्रकटिता भवति, यया आनन्दाभिन्यक्ति- जायते । इयमेव हि परमसत्तायाः सामरस्यावस्था यामलावस्थावा। अत्र एका चिद्रूपेण, अपरा आनन्दरूपेण चाविभभेवति । इयमन्तरङ्खगकलाद्रधी निष्कलपरमसत्तां पृष्ठभूमौ संस्थाप्य समुदिता भवति । इच्छा ज्ञानं क्रियाच तद्बहिरङ्खकलाः सन्ति ।
चिदानन्दयोरैक्येऽपि स्वंथा एेक्यं नास्ति । आनन्दो भाविविवं गभं धृत्वा सृष्टेरुन्मुखावस्थां प्रतीक्षते । चिदवस्थायामेतद् सवं नास्ति। चैतन्यस्वरूपा
१. तन्त्रालोकः (३.६७)
२. (अनयोः परस्परोन्मुख्यात्मकं यामलं रूपं स्यात्ः-तन्त्रालोकविवेकः (३.६७).
३. पचचदशी : स्वामी विद्यारण्य (१.७)
४, "आनन्द; स्वातन्त्र्यम्, स्वात्मविश्वान्तिस्वभावाह्लादप्राधान्यात् । स्वात-~ तत्यमानन्दशक्तिः'-- तन्त्रसारे प्रथमाद्भिके (प° ६)
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वाद वा का क कका एकक $ क ७१ दद क्क क कु कातततका क् = "क ` जकु ज कि सकवक
( ४२ )
सत्यपि चिन्िराभासा विद्यते । आनन्दस्तु साभासः, किन्त्वयमाभासोऽन्तः स्थिताभासमात्रमेव । एतदथ मेव स चिदात्मकः । चित्सत्तायामेकमेव तिष्ठति, , तत्र द्वितीयराहितव्यमस्ति, किन्तु आनन्दसत्तायामेकमेव हि तत्तवं स्वात्मानं द्विधा परिकल्प्य स्वेन सह स्वयमेव क्रीडति । इयमेव सृष्टेः पूर्वावस्था, अर्थात् सृष्टः सम्पूरणंसामग्या अभिव्यक्तः पूर्वावस्था । एतस्मादानन्दादेव हि सृष्टिरभि- व्यक्ता भवति, उक्तं च उपनिषदि--'आनन्दाद्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते") इति ।
अयं भावः--चित आनन्दात्मिकावस्थाया एव विशवोत्पत्तिर्जायते, जगदि- दभानन्दे लीनं सद् विद्यमानं भवति । युगलभावं विना आनन्दो न जायते, ` आनन्दं विना सुष्टिरपि न भवति । उक्तं च-/तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीय- मैच्छत्' इति२ । आनन्दात्मकस्यात्मानोऽन्तःस्थितस्य विश्वस्य बहिरानयनमेव विसर्गपदेन व्यवद्ियते । सामरस्ये नष्टे सति विन्दु-नाद-कलारूपेण विश्वस्य क्रमानुसारं विकासो भवति । तत्र महाबिन्दुरेव व्यक्तव्यक्तजगतौ नियन्ता प्राणकेन्द्रं चास्ति । भावात्मकस्य विदवस्य उत्सवबिन्दुरियम् । शाक्तदशंने एतदेव हि स्वयम्भूलिङ्खगमिति कथ्यते । एतदेव हि शिवस्य निवासस्थानम् । कुण्ड- लिनी मूरीभरूता ऋणात्मिक शक्तिरस्ति । उक्तं च भानन्दसूवरे "कुण्डलिनीं सा मूलीभूता ऋणात्मिका' इति । एतत्प्रारम्भिकनबिन्दुः मूाधारचक्र ऋणा- त्मककामबीजमिति कथ्यते । एतत्स्वयम्भूलि ङ्गे कुण्डलिनीशक्तिनिवसति । स्वातन्त्र्यम्
एका महाशक्तिरेव मू लशक्तिः । स्वातन्त्र्यमेव तत् स्वरूपम् । एतस्याः परमदा अविभक्ता भवति । तत्र बहूत्वं द्वित्वं युगलत्वं वा नास्ति । स्वयं चा आत्मस्वरूपा नित्या सती विराजमाना । सा रूपवती सत्यपि अरूपा, अरूपवती सत्यपि सरूपा । सा एका अद्वितीया, सैव चरमपरमसत्यस्वरूपा । सा दैताद्रैत-सदसदभावरहिता, सा विश्वातीता विवात्मिका च । तत्र सवं विद्यमानमपि किञ्चिदपि नास्ति। एतस्यामवस्थायां शिवः शक्तिश्च अभिन्न- ह्पेण विराजेते । तत्र विभक्तावस्थायां विभिन्नदष्टचनु सारं विभिन्नाः क्रिया जायन्ते, शाखाप्रशाखाखूपेण च विकासो भवति । एतदथंमेव शक्ते वर्गीकरणमपि अनेकधा भवति । एतस्यां महासत्तायां सहसा एकं स्पन्दनं उत्तिष्ठति, अव्र एतदेव हि सत्यम् । यतो हि सामान्यरूपेण यदेकमस्ति, विशेषरूपेण तदेवा- नेकम् । अत्र हि वैभिन्यदशंने कालतरङ्खेषु यद्यपि स्वाभाविकम्, तथापि
१. तंत्तिरीयोपनिषद् (३.६) २. बृहदारण्य कोपनिषद् (१.४.२)
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( ४४ )
-महाकालस्यैकमेव हि स्पन्दनं कालराञ्यस्य अनन्तस्पन्देषु प्रकटितं भवति । इयं निष्पन्द-स्पन्दरूपा युगलावस्थैव विश्वातीता स्थितिरस्ति ।
यरा कुण्डलिनी
परा कुण्डलिनी शक्तिस्वरूपतो भिन्ना नास्ति, अर्थाद् अकारो हकारर्चेत्ये-
, तद्वयं युगपत्स्थितम् । अविभक्तावस्थायामकारो हकारस्च शिवप्राधान्येन
स्वरूपमात्रे विश्रान्तो वर्तेते । तत्र चिच्छक्तिनिजस्वरूपे विद्य मानास्ति, एतस्या- मवस्थायां सृष्टिनं भवति । यदा शिवः शक्तयुन्मुखः, शक्तिश्च शिवोन्मुखी, तदा शिवराक्त्योः सामरस्यं यामलावस्था वा भवति । एतस्यामवस्थायां न शिवः शक्तिहीनः, न शक्तिर्वा शिवहीना । ताच्तिकपरिभाषायामेतदेव हि संघटुपदेन व्यवहियते \ । स्पन्दस्य आनन्दशक्तंरवां एतन्नामान्तरम् । प्रकाशो 'विमक्ंरच अनुत्तरपदवाच्यौ । द्वयोः सं धट एव आनन्द उच्यते । आनन्दादेव इच्छाशक्तेरदयो विश्वसुष्टिश्च भवतीति पूर्वमेव कथितम् । चयक्रमानुसारं शिवरूपं विश्वोत्तीणंमस्ति, शक्तिरूपं च विश्वमयं वर्तंते । एतदूद्यं विच्छिन्न- रूपम् । संघटृक्च पूणं रूपेण वतंते, यतो हि तदा नियतावच्छेदो न भवति । एतदर्थमेव तस्मिन् विश्वमये विशवोत्ती्णे च कड्चनापि भेदो नास्ति ।
अन्याः क्त्यः
परमेश्वरस्य इच्छाशक्तैरन्मेषेण जगदिदं प्रकटितं भवति । यद्यपि मूलसत्ता एकैवास्ति, तथापि आत्मसंकोचादेव इदंरूपेण बाह्यभावस्य स्फुरणं भवति । एतादृशी पूणेता महंभावे खण्डिते सत्येव जायते । इयमेव महाशुन्यस्य सृष्टिरस्ति २ ! इच्छाशक्त्यैव महाशुन्यमाश्रित्य जगदिदमाविभू तम् । भअब्यक्ता- वस्थायां जगदिदमिच्छाविषयीभूतं सदपि प्रथमावस्थायामिच्छया सहैव अभिन्नल्पेण विद्यमानं भवति । तदनन्तरं ज्ञानशक्तेराविर्भावः सृष्टि्ब॑हिमुख- प्रभावेण जायते । अस्यामवस्थायां जगदिदमब्यक्तावस्थां परित्यज्य अभिव्य- क्तावस्थां प्राप्नोति । एतदनन्तरं ज्ञानस्य तरङ्कितावस्थायां ज्ञाने स्थितं
राद्जञेयरूपेण पृथगाकारतया स्वात्मानं प्रकटयति । तदनन्तरं क्रियाशक्तेरु्मेषे
१. “अकुलकौलिकीशब्दव्यपदेश्ययोः शिवशक्त्योः, संधट इति सम्यक् घटनं चलनं स्पन्दरूपता स्वात्मोच्छलन्ता इत्यथः, अतच प्रकाशविमर्शात्मनो- रनुत्तरयोरेव संधटादानन्दशक्त्यात्मनौ द्वितीयवर्णस्य उदयः --तन्त्रालोक- विवेके श्रथमाद्धिके (प° ८१)
२. अदनं शुन्यभित्युक्तं शुन्यं चाभाव उच्यते । अभावः स समुदिष्टो यत्र भावाः क्षयं गताः ।'--स्वच्छन्दतन्तरम् (४.२९१)
( ४५ )
संजाते तत्स्व्ूपं ज्ञानात् पृथग् भूत्वा कायं रूपतां धत्ते । एतदेव महामायिकः प्राकृतं रूपं वास्ति ।
ज्ञानमभेदात्मकत्वेन चिदस्ति, क्रिया च भेदात्मकत्वेन चैत्यमस्ति । यद्यपि चिच्चैत्ययोर्ञानक्रिययोश्च भेदो तास्ति, तथापि विपये यज्ञानवशाद् मायावशाद् वा भेदः प्रतीयते । तात्तिकद्ष्टचा एतदद्रयमभिश्नमस्ति । ज्ञानं प्रकादादचैव विमर्दाक।रेण आश्यानी भूतं सत् क्रिया कथ्यते । यथा भाकाशलस्य काटिन्यगुणः शब्दः, एवमेव चिदाकाशस्य काटिन्यगुणो विम: । प्रकाश विम्ञयोरभेदो जलावतैबुदबुद्वद् वास्तविको नास्ति। अतएव यथा क्रिया जञानाभिन्ना, तथैव विमवरूपा क्रिया काहिन्यगुणं परित्यज्य विश्रान्तिस्वरूपं दैरल्यमाशित्य ज्ञान मुच्यते । भ्रकाेन सह क्रिया एकरसात्मिका भवति ।: एतदर्थमेव ज्ञानस्य बाह्यल्पं क्रिया, क्रियायाइच वास्तविकं स्वरूपं ज्ञानमिति । एतज्ज्ञानमेव प्रकाशः शिवो वास्ति, क्रियापि विमं: शक्तिर्वास्ति । द्योः प्राधान्यं समानम् । ज्ञानं विना क्रियायादचोपलन्धिनं सिद्धचति । अतएव जानं क्रियायाः क्रिया च ज्ञानस्य कारणमिति सिथः समनियतकार्यंकारणभावः । ज्ञानङ्रिययोः पौर्वाषयं नास्ति, अपितु योगप विद्यते । सुष्टितत्तवम्
सृष्टिवहुस्वरूप। तन्मूलं च एकमेव । एकस्य बहृत्वाथं द्यो रावश्यकता भवति । एतदथंमेव व्याकरणशास्त्रे एकवचन-द्विवचन-बहुवचनानि कल्पितानि सन्ति । अयं द्वितीयो द्रयोरवस्थयोः प्रकादितो भवति, एक एकस्मादभिन्नः, द्वितीय एकस्मादभिन्नरूपेण प्रकाशमानः । दरयो अभिन्नरूपेण सम्पृक्तं तत्त्वमेव यामलसत्ता कथ्यते । तास्त्िकपरिभाषानुसारमियमेव शिवशक्त्योः समरसात्मिका अवस्था । एतत् सामरस्यं नित्यसिद्धम् । बौद्धं रपि सामरस्य- मेतद् युगनद्धावस्थारूपेण कथ्यते । वैष्णवा अवस्थामिर्मां युगलभावेन स्वीकुर्वन्ति ।
एततसत्ताद्वयं विना वृष्टिनं आयते । एकं द्विकं वा यत्र॒ यामरुरूपेण प्रकादामानमस्ति, तत्र द्वयोः सम्मेलनेन परमाद्रैतसत्तायाः प्रकाशो भवति । यत्र एकं द्विकं वा पृथगृरूपेण संस्थितम्, तत्र द्योः सम्मेलनेनास्य भेदमयस्य बाह्यजगतः प्रकाशो जायते । तत्र एकाञन्तरङ्खशक्तिः, अपरा च बहिरङ्क- शक्तिरुच्यते । यामलसाहाय्येन पूणं सत्तार्या प्रवेशो भवति । द्वयोः सम्मेलनेन मेदमयस्य मायिकजगत आविर्भावः । दरयोस्तात्पर्यं प्रथकसत्ताद्वयो नास्ति, अपितु युगलसत्ता वतंते । युगल-युग्म-यामल-साम रस्य-युगनद्धशन्य^ समानाथं- द्योतकाः । अन्यदृष्टचा इयमेव अद्ध नारीइवरस्थितिः। युगलप्राप्तेरियमुपासनव दोडी उपासना । इयमवस्था कालातीतसतता प्राप्नोति । अश्र बहुत्वं नास्ति,.
( ४६ )
"यृथकसत्ताद्रयं नास्ति, -एकस्या एव सत्ताया भागद्वयी वतंते । एतद् भागद्वयं "पृथग् भूत्वा नावतिष्ठते । बहुशब्दस्य तात्पयंमानन्त्यमिति । रहस्यमागे बहुशब्दस्य तात्पर्यं तरित्वमिति । परिणामतस्व्रिशब्देन अनन्तस्य बोधो भवति । त्रयाणां पर्चाद्भागे इयोः स्थितिरस्ति, एतद्द्वयं मिथः संयुक्तमस्ति नतु "पृथक्, एतस्यैव नामान्तरं युगमिति । एत्युगलेन एकस्य मार्गैः परि- चीयते । एतदेकमपि तत्त्वं केवलमेकमेव नास्ति, अपितु एक्मिन् दे -द्वयोशचानन्तमिति ।
अस्मिन् सामरस्ये भग्ने सति क्रमानुसारं विश्वस्य प्रादुभावो भवति। -तदानीं महाबिन्दुरेव शक्तिरूपेण परिणमति । शिवांशः साक्षिरूपेण संतिष्ठते ।
साक्षी अपरिणामी एकश्च, किन्तु राक्तिः क्रमशो भिन्न-भिन्नरूपेण प्रसूता भवति । साक्षी मूलशक्तिशच एकभावापन्नौ स्तः। साक्षी सर्वावस्थासु निरपेक्षो द्रष्टा च वतते। शक्तः प्रसारात्मिका संकोचात्मिका च अवस्था भवति । अयं साक्षी केन्द्रस्थाया आत्मभावापन्नसाम्यरूपायाः शक्तद्र॑ष्टा -सन्नपि तस्याः प्रसारसंकोचनामकावस्थाद्रयमपि पयति । विश्वातीतत्त्वादयं सदा कालचक्रस्योपरि अवतिष्ठते, । कालचक्रस्य नाभिस्वरूपमपि वतते । शक्तेः प्रसार एव सृष्टिः, तत्संकोचश्च संहार इति कथ्यते । संकोचस्य श्रारम्भे अन्ते च साम्यावस्था वतते, मध्ये एतद् वैषम्यं कालचक्रस्य आवतेनं वा। वैषम्येऽपि साम्यावस्थाऽन्तनिहिता भवति । वंषम्यकाले मूलबिन्दो- -रर्थाच्चतुथं बिन्दो बिन्दुत्रयं पृथगूभावेन प्रकटितं भवति । बिन्दोः प्राकटचंन -रेखासृष्टिर्जायते, अयमेव रेवागणितस्य सिद्धान्तः । बिन्दोः कम्पनात् -स्पन्दनात् वा रेखोत्पत्तिर्जायते । परमतत्त्वस्य संकल्प एव स्पन्दस्य कारणम् । आगमशास्त्रे रेखाविन्यासद्रारा तत्त्वमिदं ज्ञायते । परमस्वरूपस्य स्वातन्त्र्यात् -स्पन्दो यदा बिन्दु स्पृशति, तदा बिन्दुः रेखारूपेण परिणमति । हस्वतमरेखा बिन्दुद्धयेन निर्मीयते । एतदनन्तरं सृष्टिः साक्षाद् बिन्दुना न भवति, अपितु -रेखया जायते । तदानीं रेखात्रयी अपेक्षते । रेखात्रयात् त्रिकोणं भवति ।
तदेव सृष्टेः मूलं योनिस्वरूपम् ‡ । अत एव वेदान्ते "योनेः शरीरम्! इति
१. एषा वस्तुत एकैव परा कालस्य कषिणी । शक्तिमदभेदयोगेन यामलत्वं प्रपद्यते । तन्त्रालोके द्वितीयाल्िके (प° २२३) -२. शत्रिकोणं भगमित्युक्तं वि यत्स्थं गुप्तमण्डलम् । इच्छाज्ञानक्रियाकोणं' १००५१५५५०० ५०५००१० || एकाराकृति यदहिव्यं मध्ये षट्कारश्रूषितम् । आलयः सवंसौख्यानां बोधरत्नकरण्डकम् ।-- तन्त्रा ° वि° (प° १०४)
( ४७ |)
सूत्रं स्थापितम् , । एतत् सिद्धान्तं विना शरीरं नोपपद्यते । न्यायदक्लेनानुसारं सृष्टेः क्रम इत्थं वर्तते-- परमाणुः, दचणुकः, त्रसरेणुः । अर्थात् परमाणोद्रंयणुकः , ~ द्रचणुकात् वरसरेणुः । द्रयणुकत्रयं विना व्रसरेणुनंत्पिद्यते । बौ द्धैरपि उक्तम्--
` “षट्केन युगपद् योगात् परमाणोः षडंशता'२ इति । त्रिकोणमेव महा- त्रिकोणम्३, तदेव साधत्रिवल्याकारा भूजङ्गाविग्रहा कुण्डलिनीरूपेण ज्ञायते ।
त्रिकोणतत्वम्
एतत्त्िकोणे परमतत्वस्य निर्गेतधा रान्वये सति त्रिकोणाङृतिः शक्त्याधार- रूपतां विभक्ति । जगतः प्रसवित्री धाराभिमां स्वान्तर्धारयन्ती शक्तिरियं विर्व - प्रप्चमन्मीकयति । परमायाः शक्तैरस्याः स्वात्मीकृतधारयैव अनन्तलोकाः सृष्टा भवन्ति । वेदे रयिप्राणौ यथाक्रमादित्यसोमरूपेण भभिहितौ स्तः । सर्वोऽपि द्य मानपदार्थो रथिरूपेण वतेते, तथेव सवत्रापि परमाशक्तिरेव कार्यं कुरुते । आधुनिकवैजञानिका अपि मैटर-इनजौं' इति तत्त्वद्वयं स्वीकृत्य आरतीयमान्यतामनुमोदयन्ति । श्रीकूपर-सरविलियम क्रक्स-ओोलिवरलाज- पलामेरियन इत्यादिवैजञनिकौः मैटर तत्त्वं स्वतन्वरकमिरूपेण न मन्यन्ते । मैटर, तत्तवं स्वतन्त्र्येण न किमपि कार्यं करोतीति भावः । वज्ञानिकप्लामे- रियनानुसारं “मैटर तत्त्वस्य विर्लेषणप्रस ङ्गे ततत्वमदृश्यं भवति । तदनन्तरं जगत आधारभूता सव॑कायं कारिणी, स्पन्दनात्मिका, नित्यकायेकारिणी राक्ति- रनुसन्धीयते* । प्रो° हैकल मतानुसारं “मैटर'तत्त्वमनन्तप्रसारितव्याप्तपदा्थं- स्थितलू्पेण अनुभूयते । “इनर्जी'पदवाच्यं तत्त्वं बोधात्मकम् । वेदे वणितो रथिपदार्थं एव आधुनिकविज्ञानस्य "मैटर 'तत्वमस्ति । भ्रो° बुकनरमतानुसार 'नैटर'स्य प्रत्येकास्थितिः "इनर्जौ'१दवाच्यस्य क्रीडाविलासमात्रम् । डा° ईैपरमहोदयोप्यमुमेव सिद्धान्तं स्वीकरोति । प्रसिद्धदाशं निकहवंटस्पन्सर- महोदयेनाप्यक्तं यत् साम्थावस्थैव परिणामस्य चरमा सीमा* । वस्तुतः शक्तः
१. ब्रह्मसूत्रे (३.१.२७) २. विशतिका, विज्ञप्तिमात्रतासिद्धिः (श्लो °--१२) ३. अनृत्तरानन्दशाक्ती तत्र रूढिमुपागते । त्रिकोणद्वित्वयोगेन त्रजतः षडरस्थितिम् ।-- तन्त्रालोकः (३९५) ४. स्प्रिचुअल साइंस : सर कूपर ५. फोसं एण्ड मैटर : बुकनर ६. दी कानपिलिक्ट विदट्वीन रिलीजन एण्ड साहस : डां° इपर ७. फर्टं प्रिसिपल : हर्व॑टं स्पेन्सर
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( ४८ )
साम्यावस्थैव मध्यमार्गेः। गौतमवृद्धेन मध्यमागंस्य अनन्तमहिमा वणित: । मन्त्रद्रष्टारो ऋषयो रहस्यवादिनङ्च सिद्धाः परम्पराभिमां स्वीकुवं न्ति । अखण्डमहायोगेऽपि साम्यावस्थेयं कृमारीशक्तिरूपेण स्वीक्रियते । इयमेव वास्तविकी शक्तिपजा । “इच्छाशक्तिरुमा कुमारी" इति शिवसूत्रेऽपि कथ्यते । इच्छाशक्ति ज्ञानक्रियाशक्त्योमंध्यस्था । शिवकशशक्तिसामरस्यं यामलभावोवा
ाक्तदशनानुसारं शिवशक्त्योः सामरस्यमेव अद्रंतम् । उक्तं च-- “ज्िवशक्तिसामरस्यमयं जगदानन्दकूपमित्ययंः' ` । शिवशक्त्योः सम्मिलित- स्वरूपमेव ब्रह्मेति, उक्तं च- दिवश्क्त्यात्मकसंघटुरूपे ब्रह्मणि शावते' इति । द्योः सम्बन्धोऽविनाभावी । शिवशक्त्योः सम्बन्धः दाहेन वह्भरिव, धरवल्िम्ना सह दुग्धस्यैव वतते । शक्तिं दाऽनतर्मुखी भवति, तदा शिवः कथ्यते । दिवो यदा बहिर्मुखो भवति, तदा शक्तिः कथ्यते । अन्तर्मृलबदहिमुंखभावौ सनातनौ । शिवतत्त्वे शक्तिभावस्य गौणत्वं शिवभावस्य प्राधान्यम्, शक्तितत्त्वे च श्िवभावस्य गौणत्वं शक्तिभावस्य प्राधान्यं विद्यते । किन्तु साम्या वस्थायां शिवश्क्त्योरेकरसा स्थितिवेतंते, इयमेव त्ाम्यावस्था । इय मवस्थंव ूर्णाहन्तापदेन परमसंविद्रूपेण च व्यपदिद्यते । शाक्तदशेनस्य परमतत्त्वं यामलरूपेण बगणितमस्ति-"तयो्य्यामलं रूपं स संघ इति स्मृतः, ‡ इति । अयमेव अद्धंनारीदवरः कथ्यते । शिवो ज्ञानशक्तिः, उमा क्रियाशक्तिर्च, शिवः प्रकारः शवितदच विम: । परमतत्त्वं प्रकाशविमशंसामरस्यमय वतंते ।
शिवशक्त्योः संघटधेन भानन्दोदयो जायते । यद्यपि चिद् आनन्दश्च स्वरपततो भिन्नो, तथामि आनन्दोदये सति विसगंः । शिवो विश्वोत्तीणेः शक्तिदच विदवमयी । एतद्द्वयं परस्परं विच्छिन्नम् । अतः कुव चित् एकत्र पू्णष्वं नास्ति । परमाथंतः शिवशक्त्योरभेदे सति पूणं रूपेणेयं विच्छिननता अस्वीकृता वतते । पूणेस्वरूपमविच्छिन्नमस्ति । पूणैस्य विश्वमयत्वात् तत विदवोत्तीणेता तिष्ठति । अतो विच्छिन्नरूपेण स्वीकृतशिव भावशक्तिभाव पेक्षया पुणंभावः श्रेष्ठः । म०म०्गोपीनाथकवि राजमतानुसारं तत्त्वमिदं (यामलम्) सप्त- धरिशत्तत्वरूपेण स्वीकृतम् - ।
केचन इत्थं प्रतिपादयन्ति यदेतस्मिन् विषये न किञ्चिदपि वक्त्नवा
१. तन्त्रालोक विवेकः, आदि ०-२४, (पृ° ८४)
२. तन्त्रालोकः (३.६८)
३. भारतीय संस्कृति भौर साधना ( प्रथमखण्ड } : मन्मरगोपीनाथ कविराज ( प° १७ )
( ४९ )
क्रिमपि विचारधितं शक्यते । एतदेव हि तत्त्वं सर्वेषां चरमलक्ष्यीभूतं वर्तते ।
क चे
एतदेव हवानां परमशिवः, शाक्तानां पराशक्तिः वैष्णवानां च श्रीभगवानस्ति ।
एतदप्यवगन्तव्यं यत् सर्वाणि नामानि केवलं नाममात्रम् । आगमशास्त्र परमशशिवावस्थैव पूणंतायाः परिचाथिकात्वेन आत्मसात्क्रियते, अन्यथा ज्ञान- विज्ञानदष्टयां तत्त्वमिदमव्यक्तमप्राप्यं चान्ति। अव्यक्तं सवदा अव्यक्तमेव भवति, उक्तं च तैत्ति रीयोपनिषदि- यतो वाचो निवतंन्ते अप्राप्य मनसा सह" ` इति । इदं रहस्यात्मक विद्यते । यस्य अन्त्रेषणं भारतीया मनी षिणरचेतनावि- ज्ञानमाध्यमेन बोधन्ञानमाधारीकृत्य कृतवन्तः, स एव सिद्धान्तो विशतिश्चतानब्द्यां महादार्लनिकविटगेस्टाइनमहोदयेन भाषावि्लेषणप्रस ङ्ख कृतः । एभिरुच्यते यद् यस्य सन्दर्भेऽस्माभिः किमपि न वक्तु शक्यते, तत्र मौनमेव वरम् । वस्तुतः किमपि एतादशमपि तत्त्वं विद्यते यत् शब्दद्वारा वक्त न शक्यते, तत्तत्त्वं स्वात्मानं स्वयमेवाभिग्यनक्रिति । रहस्यात्मकमिदमुच्यते, अर्थाद् यस्य सम्बन्धे ऽस्माभिः किमपि वक्तं न शक्यते, तस्याप्यस्ति सत्तामवदयमेव स्वीकत्तव्या । एतदपि वक्तं न शक्यते यद् भाषाद्रारा यस्य॒ साध्यचिन्तनस्य सीमा विद्यते केवलस्य तस्यैव अस्तित्वमस्तीति । सामरस्यरूपेण वा प्रकारितमलीकिक परमतत्तवमेत।दशमेवास्ति, यत्स्वरूपं वाचा लेखेन वाऽवबोद्ध्, न शक्यते । अस्यां स्थितौ करुणापू्णंहूदया भारतीया मनीषिणस्तत्त्वमिदमवबोधयितुं प्रयत्नं कृतवन्तः, यस्य संक्षिप्तं स्वरूपं मया प्रस्तुतम् ।
स्वं एते सिद्धान्ताः श्रीकृष्णयामलेऽपि विसृमराः सन्तीति, तेऽधुना उपसंहारग्याजेन समुपस्थाप्यन्ते ।
उपसंहारः
प्राचीनकाले विभिन्नानां प्रस्थानानामवलम्बनं कृत्वा शाक्तमतं प्रचारितम् । एषु प्रस्थानेषु कौलिकमतं प्रधानमस्ति । अतिप्राचीने काले ऋषिणा दुरवांससा सहास्य मतस्य सम्बन्ध आसीदिति श्रूयते । दुर्वासा श्रीकृष्णाय जागमशास्त्रस्य शिक्षामदादित्यपि प्रसिद्धिरस्ति। युगान्तरे कामरूपपीठाद् मीननाथेन मत्स्येन्द्रनायेन वा इदं मतं प्रचारितम् । किञ्चित् पूवं पुराणसंहिता, इति नाम्ना पुराणविषयक एको ग्रन्थः प्रचारितः । अस्मिन् ग्रन्थे श्रीकृष्णलीला- विषयस्तान्त्रिकदष्टया साधनागतदष्टचा च आलोच्यते । प्रसङ्धतया प्राथमिक- लीला-व्यावहारिकलीला-प्रातिभासिकलीलानां च सूक्ष्मं विवरणं तस्मिन् ग्रन्थे वतते । तत्र प्राचीनवैष्णवसम्प्रदायस्य कतिपये प्राचीना ग्रन्था अपि उद्धताः सन्ति ।
१. तैत्तिरीयोपनिषद् (२.९)
( ५० )
अनेन विवरणेन स्पष्टमिदं प्रतिभाति यद् वैष्णवसम्प्रदाये साधनायामपि लीलारहस्ये मूलतान्त्रिकरहस्यानि प्रतिपादितानि । प्रसिद्धवेदान्ताचायंश्री- मदादिशङ्करभगवत्पादस्य श्रेष्ठगुरुणा गौ डपादेन श्री विद्यारत्नसूत्रम्' इति नाम्ना उक्करष्टतमस्तान्तिको ग्रन्थो लिदधितः। श्रीकृष्णयामलतन्त्रेऽपि योगस्य साधनायाइच दष्टा तान्त्िकदृष्टिरवे ष्णवदृष्टिरच सम्मिलिता प्रतिपाद्यते ।
श्रीकृष्णयामलतन्तरे इदमूल्लिखितमस्ति यदूध्वंलोकस्यान्त गतं स्वगंलोक-
महर्लोक-जनोलोक-तपोलोक-सत्यदोकाः प्रसिद्धाः सन्ति। ब्रह्मलोकस्योपरि
चतु्व्यहस्थानमस्ति । वैकुण्ठस्य दक्षिणतः संकर्षणो विद्यते । वंकुण्ठस्याधस्तात्
परिचिमतश्च प्रद्युम्नः कामदेवो वा। कामस्योपरि उत्तरतश्च अनिर्डो
वासुदेवदच पूर्वे । इमानि स्थानान्येव सत्यलोकस्योपरि वैकुण्ठस्याधर्च अवस्थि-
तानि सन्ति । चतुब्यू'हस्योपरि ज्योतिर्मयवैकृण्ठधाम परमव्योम वा अस्ति ।
इदं चतुव्य् हमुपलक्षितानां चतुरस्राणां मध्येऽवस्थितमस्ति । अत्र वासुदेव-
सं क्षं ण-प्रयुम्न-अनिरुद्धाष्यस्य चतुर्व्यूहस्य तदुपरि परमव्योम्नो ज्योतिमेयव-
कुण्ठधाभ्नदच उल्लेख वैष्णवपाञ्चरात्रागमप्रतिपादितं चतुव्यूहसंवलितं भगवतः
परवासुदेवस्य स्वरूपं स्मारयति, यस्य हि विवरणमहिर्बृध्न्य -ना रदपाचरात्रादि- संहितादिसु समुपलभ्यते । अस्योपरि कौमारलोकः, यत्र ब्रह्माण्डरक्षकः काति-
केयोऽवस्ग्ितः । एषामूपरि महाविष्णोः स्थानमस्ति । स एव सहस्रशीर्षा पुरुषः
श्रीकृष्णस्यांशांशादुद्भूतः । मह विष्णोर्मृलात् कारणस लिलमुद्भूतम् । तस्मिन् सलिले महासंकर्षणोऽवस्थितः । एष संकर्षणः शेषस्यावतारभूतः, यमाश्रित्य शेषशायी भगवान् जामग्रत्स्वरूपे सुप्तवत् तिष्ठति । जगतः सृष्टिः प्रल्यङच अस्य भगवतो निदवास-प्रहवासरूपे स्तः ! कारणसमुद्रे अद्धोन्मीलितेनेत्रमंहा- योगिनो ध्याने निमग्नाः सन्ति। तेषां वामपाश्वं श्रीराधाया अङ्गादुद्भूता महालक्ष्मीरद्धन्मी छितनेवैव्यं जनयति भगवन्तम् । परमपुरुषस्य गोविन्दस्य ध्यानेन महाविष्णोः पुलकोदगमो जायते । प्रत्येकं रोमकूपे ब्रह्माण्डानि आवि-
भंवन्ति । अन्तराले श्रीराधायादिचन्तनेन नेत्रकोणेभ्योऽश्रुधारा निर्गता भवन्ति ।
वामवचक्षुषो यमुना, दक्षिणचक्षुषो गङ्गा, मध्यतइच गोमती उद्भूता भवन्ति ।
तिस्रो धारा पुनः कारणसमुद्रे प्रविष्टा भवन्ति। जगति ता धारास्तमः
(कृष्णवर्णम्), सत्त्वम् (शुश्रवर्णम्), रजइच (रक्तव णम्) इति नाम्ना प्रसिद्धाः
सन्ति ।
इत उपरि व्रिपुरसुन्दरीलोकोऽस्ति । अत्र भैरवा भैरव्यः सिद्धयोगिनो मातृगणाङ्च निवसन्ति भगवत्या त्रिपुरसुन्दर्या सह । भगवती च तत्र श्रीयन्त्र निवसति, यस्य सविशेषं वणैनं नित्याषोडशिकार्णंवादिषु त्रैपुरतन्त्रेषु विद्यते \
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( ५१ }
सौ कृष्णोध्वन्ना कृष्णहमा च स्वयम्, रक्तवर्णा चतुर्भुजा चापि। सा एवं शुक्लवर्णा वाणी, पीतवर्णा भृवनेडवरी, रक्तवर्णा त्रिपुरसुन्दरी, इयामवर्णा कालिका, कृष्णवर्णा नीलसरस्वती चास्ति । पराशक्तिदुं्गा साक्षात्कृष्णस्वरूपा । उक्तं च -षदुर्गाख्या या पराशक्तिः साक्षात् कृष्णस्वरूपिणी' (४.११.क) इति ।
राधाकृष्णयोधिपरीतरत्या दुर्गा रामश्च सम्भवतः । नित्यसृष्टचथं महाविष्णोरूदरे संकषंणः प्रविष्टो भवति । महाविष्णोर्नाडचां गत्वा संकषंणः कृण्डल्याकारो भवति । एवं सहल्नमुखो भूत्वा मुखरन्ध्राद् बहि्गेतो भवति । महाविष्णुरखिलब्रह्माण्डस्य सजंनं धारणं संहारं च करोति । तदृध्वं ` मध्य- कणाचक्रे गौ रीपुरनामकं चक्र विद्यते । तत्र भुवनेश्वरीरूपा दुर्गा वि राजते । तत्र या देवी निवसति, सा कदाचित् इयामा, कदा चित् कनकप्रभा चतुभुजा तथा कदाचित् शङ्खुचक्रगदामुद्गरधारिणी भवति । तस्था निकटे च कालरूपा कालिका तिष्ठति । चक्रस्य दक्षिणतो नीलसरस्वत्या उग्रताराया वा एक जटाया वा स्थानमस्ति । ततः परिचमतः शुक्लवर्णा, शुभ्रसत्त्वमयी, ब्रह्मवाग्वादिनी नित्या अवस्थिता । पीतवर्णा भुवनेदवरी चछिन्नमस्तारूपेण परिणता । चक्रस्यास्थोत्तरतो योगिनीगणो डाकिनी-लाकिन्यादिभिरावृतस्तिष्ठति । तस्य उत्तरतो भुवनेश्वरी, परिचमतरिछन्न मस्ता, दक्षिणतो नीलसरस्वती वाणी तथा पूर्वतः द्यामा दुर्गा कालिका वा तिष्ठति ।
त्रिपुरसुन्दरीभ्रसङ्खेनात्र साकारो निराकारश्च शिवो वर्ण्यते । लिङ्गरूपी शिवः कथं नाम पञ्चधा विभक्तो भवतीति च प्रतिपाद्य लिङ्गस्य पुप्रकृत्यात्म- कत्वं साध्यते । अत्र लिङ्गादेव महाविष्णोरुत्पत्तिः संवणिता । षष्ठे चाध्याये कृष्ण एव परंब्रहमत्युच्यते । तस्य शक्तिः प्रकृतिः सूक्ष्मा सनातनी च । कृष्ण एव ज्योतित्रंह्य जगत्मृष्टिस्थितिप्र्यकारणं सवंस्वरूपं निष्कलं ब्रह्म ।
्ाह्मणब्राह्यणीसंबादरूपेण प्रवते कृष्णयामलमिति जानीमो वयम् ।
अत्र सप्तमेऽध्याये प्रसङ्खवशाद् वण्यते यदेतद् ग्रन्थवक्ता ब्राह्मणो गोलोके सुशमनामको गन्धर्वं आसौत् । कस्माच्चित् प्रमादात् ततः परिश्रष्टः स प्रथमं मान्धातृतनयो मुचुकुन्दाभिधः सूर्यवंशे समुत्पन्नः । तदनन्तरं ब्राह्मणत्वं प्राप्य कृष्णयामलसंकीतंनेन पूनः परं धाम जगाम । अतः सुशमनामको गन्धर्वोऽस्य तन्त्रस्य वक्तेति सुष्टु ज्ञायते । अस्य तन्त्रस्य श्रोत्रौ ब्राह्मणौ विक्ञालाक्षी नाम्नी राधाया कटाक्षप्रभवा ।
अष्टमेऽध्यायेऽत्र सवस्य ब्रह्म रूपत्वं प्रतिपाद्यते । निविकारस्य निरञ्ज- नस्य ज्योतिःस्वरूपस्य ब्रह्मणः सकाशात् पुं्हृत्यात्मकं विश्वमिदं नानारूपेषु प्रतिभासते । इदमेव तद् विश्चोत्तीणं विश्वमयं च॒ तत्त्वम्, यदस्माभिः पूवं
( ५२ )
सप्रमाणं निह्पितम् । विषधोऽपरं कृःगत्स-राविकतित्वोर्थामकभावमाक्तिसय दशमेऽत्प्रपिऽपि वणितः। एतद् वंशाय वस्माभिर्थामिकवस्थाया वैश्च्ेत स्वषूपं विवेचितम् ।
शब्दब्रह्म परब्रह्म चेति द्विविध ब्रह्म शस्त्रेषु प्रतिपाद्यते । श्रीकृष्णाख्यं परब्रह्म यामलेऽस्मिन् प्रतिपाद्यत एव, दशमेऽध्यायेऽत्र वृन्दावनस्य शब्द- ब्रहास्वरूपत्वं वण्यते । भगवती सरस्वती वंशोरूपेण प्रादुर्भूतेत्येकादशेऽध्याये, सप्तविधानां नादानाम्, षड्विधानां रागाणां रागिणीनां च, ताल-ग्राम- मूर्च्छनानां च नानाभिधानं वणेनं वतंते चतुदंशेऽध्याये । तत-आनद्ध-सुषिर- | घनाख्यानि चतुविधानि वाद्यानि चाष्टाविज्चाध्याये वणितानि । तद्यथा- | ततं वौणादिकं साध्वि आनद्धं मुरजादिकम् ।
वंश्यादिकं च सुषिरं कास्यतालादिकं घनम् ।॥ ( २८.२३ ) इलोकोऽयममरकोरे एवं दृश्यते --
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ततं बोणादिक वाद्यमानद्धं मुरजादिकम् । वंर्यादिकं च सुषिरं कांस्यताल्ादिकं घनम् ॥ ( १.७.४ ) एवं परजब्रह्यणा सहात्र ॒शब्दन्रह्य सविशेषं प्रतिपाद्यत इति वतते किमपि वैशिष्टच' कृष्णयामरूस्य । याज्ञ वल्वेयस्मृतावुच्यते--
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बीणाबावनतत्त्वज्ञः स्वरजातिविदारदः । तालज्ञदचाश्रयासेन मोक्षमार्गं नियच्छति ।। (२३.११५)
एवं च कष्णय)मले शब्दब्रह्मसमाराधनेनापि मुक्तिमागं उन्मील्यते । चतुविशेऽध्यायेऽकारादिक्षकारान्ता मातृका स्मयतेऽष्टादशशतराधिकाना- मवणैनप्रसङ्खन । अत्र प्रथमं ककारादिक्षकारान्तक्रमेण तदनु च अकारादि- विसर्गान्तक्रमेण नामानि वणितानि। नामक्रमनिरूपणेऽत्र बवयोरभेद इति सिद्धान्तः सम्यगङ्गीङृतः। मन्त्राणां सुद्राणां च निरूपणं दश्यतेऽत्र त्रयोवि्ेऽध्याये ।
भुवनेश्ची त्रिपुरसुन्दरी च सविशेषमत्र वण्यंते। त्रिभङ्खीस्थानात् समूत्पन्ना देवी त्रिपुरसुन्दरीति ब्युत्पत्तिरत्र तस्य पदस्य निरुक्ता । भुवनेइवर्याः समक्षं स्वयमेव श्रीङृष्णस्त्रिपुरसुन्द रीस्वरूपम ङ्गी चकारेति व्यते षोडश्ेऽ- ध्याये । तद्यथा-
त्रिभङ्गुघुरतो यस्मान्ममेव परमात्मनः ।
जातेयं सुन्दरो साक्षाच्छीमह्त्रिपुरसुन्दरी ।। ( १६.१३ ) भगवत्पादेन शद्भुरानार्वेण तु प्रपञ्चसारेऽन्यल्लिबं चनं निरूपितम्-
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( ५३ ) त्रिमूतिसर्गाच्च पुराभवत्वात् त्रयी मयत्वाच्च पुरब देव्याः । लये त्रिलोक्या अपि पूरकल्वात् प्रायोऽम्बिकायास्त्रिपुरेति नाम ।। ( ९.२ )
अत्र सप्तदशाध्यायत आत्रयोविशत्यध्यायं श्रौचक्रनिवासिनीनामावरण- देवतानामस्त्रदेवतानां मुद्राणां च निरूपणं नित्याषोडशिकाणं बपद्धत्या कृतमिति सत्यं श्रीकृष्णस्वरूपैव त्रिपुरसुन्दरी । “शक्त्या विना शिवे सूक्ष्मे नाम धाम न विद्यते" (४.७) इति प्रतिपाद्यते नित्याषोडशिकाणेवे । अत्रापि शक्तिहीनः श्रीकृष्णो न किमपि कर्तुं शक्त इति व्यते । तद्यथा-- कृष्णोऽपि राक्तिरहितः कत्त शक्तो न किश्चन । तस्यापि शक्तिरूपाहं राधिका सर्वंतोऽधिका ॥ ( २१.३४. ख-२१.३५. क ) श्रीकृष्णस्य त्रिभद्किस्वरूपमश्र द्वादशेऽध्याये वण्यते । रसमाधुरीमापिबन् श्रोकरष्णस्तिर्यग्ग्रोवस्तियंक् च रणङ्च भवति । सैषा रसमाधुरीभरिता वंशीवादन- रता कृष्णस्य आकृदिम॑नोहारिणी त्रिभङ्किनाम्ना प्रसिद्धा । कालिकातामातृका त्रिभद्किचरितमात्रस्यैवेति पाण्डुकिपीनां विवरणेऽस्माभिरुक्तम् । त्रिभङ्कित्व- रूपमेतन्न केवलं श्रीकृष्णभक्तानाम्, अपि तु भक्तकवीनां चित्रकाराणां च प्रधानमालम्बनमासीदिति वयं स्वं जानीमः । पञ्चविलेऽध्यायेऽत्र राधाकृष्णयोरंक्यं प्रतिपाद्यते । तद्यथा --
कृष्णेब्रह्मणि राधायामषीद्भेदो न विदयते । एकमेवाद्वयं ब्रह्य त्युच्यते ब्रह्मवादिभिः ।। (२५.२३) परकाशविमश्मिकमेकमेव तत्त्वम् । तन्त्राचार्या एतत्तत्त्वं स्वातक्त्यमयी चिदिति वा संविदिति वा बोधयन्ति । कष्णयामले वतते संवित्स्वरूपिणी राधा । सैव विश्वोत्तीर्णं विद्वमयं च स्वरूपं धत्ते । शक्त्या राधिकया युक्त एव श्रीकृष्णः किमपि कर्तं प्रभवतीति यामलमेतत्स्व रूपमन्तिमेऽध्यायेऽष्टाविंशेऽत्र सवि शेषं निरूष्यते ।
१ ` क काक्या". { त ` (व " ¶ = क + 1 ` ऋक बक क क ००. क ! काण ` ०१. चक च ।
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आशीवच्ांसि ४-५11) प्रस्तावना ( हिन्दी ) -- धो मातृका-परिचय- ॐ, ग्रन्थ-परिचय- >, पूवं पीठिका- ख, भक्तिसम्प्र- दाय- अण, भक्ति-दशं न- ५), लीला-घाम- पे, श्री राधा-कृष्ण एवं काम- कला- ५५१, श्रीराधा-कृष्ण एवं त्रिपु रसुन्द रो -गकण), आभार-प्रदशंन- भ उपोद् घ।तः ( संस्कृत ) १-५३ यामलशब्दाथं : ~ ३, यामलोद् भवः - ५, यामलानां विवरणम् -७, कृष्णयामलस्य संक्षिप्तः परिचयः - १६, वक्तारः श्रोतारश्च - ३१, दाशंनिकं विवेचनम् ( ~ ३२, प्रकाशविमशिमिकं तत्त्वम् - ३२, विश्वो- त्तीर्णा† विश्वमयी च संवित् ~ ३३, विश्वशरीरो भगवान् - ३४, सामरस्यम् ~ ३५ ), यामलावस्था ( ~ ४०, अद्वयं तत्त्वम् ~ ४०, यामलभावः - ४१, स्वातन्त्र्यम् ~ ४३, अन्याः शक्तयः ~ ४४, सृष्टितत्त्वम् ~ ४५, त्रिकोणतत्वम्
~ ४७, शिवशक्तिसामरस्यं यामलभावो वा -४८ ), उपसंहारः ~ ४६
्रीकृष्णयाम ल महातरत्रम १~-२२६ प्रथमोऽध्यायः ~ वृन्दावनश्रष्टविद्याधरविद्याधरीप्रश्नः १-५ द्वितीयोऽध्यायः ~ भूवादयुध्वं लोकवणंनम् ६-२४ तृतीयोऽध्यायः - गुणातीतकारणजलराशिपरमव्योमनाथमहा-
पुरुषलोकवणंनम् २५-२६ चतुर्थोऽध्यायः - गौ रीलोकवणंनम् २७-३१ पञ्चमोऽध्यायः ~ शिवलोककथने काशीमाहात्म्यपाखण्डिकथनम् ३२-३५ षष्ठोऽध्यायः ~ ज्योतिङ्रंह्यलोकवणंनम् ३६-३७ सप्तमोऽध्यायः ~ परब्रह्मलोकवणंने सगणरहस्यवन्दावनवणंनम् ३८-६० अष्टमोऽध्यायः ~ वृन्दावनरहस्ये विद्याधरीसन्देहह रणम् ६१-६३ तवमोऽध्यायः ~ भगवदुद्देशः ६४-६८ दशमोऽध्यायः ~ वृन्दावनरहस्यनिरूपणम् ६६-७३ एकादशोऽध्यायः ~ श्वीकृष्णबल रामप्रश्ने शब्दब्रह्मस्वरूपिण्याः
वंशिकायाः प्रादुर्भावः ७४-६५
द्वादशोऽध्यायः ~ दिव्यवृन्दावनरहस्थान्तगंते श्री राधाऽविभविो भगवत्त्रिभङ्कनित्यरूपाविर्भावश्च ६६-१००
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( ५६ )
त्रयोदशोध्यायः ~ श्रीराधा-कृष्णरहस्ये सम्मोहन मनु चिन्ता- मणिमहौषधिरूपा विभावः च॑तुदंशोऽध्यायः ~ राधावशीकारे भवनेश्युत्पत्तिभं गवन्मुख-
विनिगंता वणंमालास्तुतिः पञ्चदशोऽध्यायः ~ दिव्यवृन्दावंनोपाख्याने गोलोकनिर्माणं भ् वनेश्वरी मोहनञ्च
१०१- १०३
१०४-११०
१११-१२०
षोडशोध्यायः ~ श्रीकृष्णाभेदशक्तिश्रीमत्विपुरसुन्दरीप्रकाश-
रहस्यम् सप्तदशोऽध्यायः ~ दिभ्यवृन्दावनोपाख्याने राधा-कृष्णरहस्ये- ऽनङ्खकुसु माद्यष्टनायिकाप्रचारणम्
अष्टादशोऽध्यायः ~ राध।-कृष्ण रहस्ये षोडशाकषंणशक्तिप्रचारः
एकोन विंशोऽध्यायः ~ सवं संक्षोभिण्यादिप्रचारणम्
विशोऽध्यायः ~ राधा-कृष्णरहस्ये सवं संक्षोभिण्यादिशक्ति- स्वंज्ञा दिदेवी मोहनम्
एकविशोऽध्यायः ~ वशिन्यादिवाग्देवीकामेश्वर्यादिमोहने राधाया निजतततव प्रकाशनम्
द्वाविंशोऽध्यायः ~ राधा-कृष्णरहस्ये कामेश्वादिभङ्गः, सक्षोधिण्यादिसम्मोहनम्
त्रयो विंशोऽध्यायः ~ राधादेवीप्रोन्मादनम्
चतुविंशोऽध्यायः ~ श्रीमद्राधादेव्या नाम्नामष्टादशशती- स्तोत्रम्
पञ्चविंशोऽध्यायः ~ वेन्दादेवीमन्त्रणम्
षडविशोऽध्यायः ~ राधा-कृष्ण रहस्ये वृन्दावनं रचनं गोपानां
पराजयश्च सप्तविशोऽध्यायः ~ राधा-कृष्णरहस्ये श्रीकृष्णवंशीह रणं श्री मच्त्रिपुरसुन्दरी मन्त्रणजञ्च अष्टाविशोऽध्यायः ~ श्री राधा-कृष्णविहा रवणंनम् परिशिष्टम् -१ ~ नवमातृकाविशेषपाठाः परिश्चिष्टम् -२ ~ श्रीकृष्णयामलश्लोकार्धानुक्रमणी
परिशिष्टम् -३ ~ नवममातृकाश्लोकार्धानुक्रमणी
१२१-१२३ १२४- १२८ १२६-१३१ १३२-१३५ १३६९१४०
१४१- १४७
१४८-१५४ १५५- १६२
१६२३-१६१ १६२१६९५
१६६२०२९
२०३-२०७ २०८२२९६
२२७- २५४ २५५-३३१ ३ ३२-३४३
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श्रोकृष्णयामलमहातन्त्रम् प्रथमोऽध्यायः
श्श्रीकृष्णाय नमः
सदारिवमहेशानब्रह्यविष्ण् महेश्वराः | यस्यांशांशा नमस्तस्मै कस्मैचित् परमात्मने ।। १॥ नारदं उवाच शाण्डिल्यकुलसम्भूतं भारद्राजात्मेजा सती । रूपयौवनसम्पन्ना दिव्यालङ्करणोज्ज्वला ।॥ २॥ कन्दपं दपंशमनं रूपिणं नवयौवनम् । गोविन्दनामश्रवणजातहर्षाश्रुलोचनम् | ३ ॥ पुलकोद्धि्सर्वाङ्गं कम्पमानं मुहुमुहुः । चित्तभित्तिविचित्रश्रीकृष्णरूपमनामयम् || ४ ॥ गोविन्दचरणद्रनद्रं (न्दर) सेवानिष्ठितविग्रहम् । श्रीकृष्णसत्कथालापप्रसन्नवदनाम्बूजम् | ५॥। अनन्यभावं गोविन्दसख्यभावपरायणम् । कृष्णक (क्र) मसिक्तहस्तदरन्द्रं निदन्द्लक्षणम् ।। ६॥ गोविन्दह्दयानन्दं सत्कथाश्रवणोत्सुकम् । सवं भूतसमप्रेमाचरणं प्रा (्रे)रणप्रदम् ।॥ ७॥ ज्ञानविज्ञानसम्पन्नं कृष्ण यन्तु (पातुं) [त्व | महंसि । रदति नीचे मयि यदा हदयाश्वासनक्रिपा ॥ ८ ॥ क्रियते दानदयया श्रीकृष्णेन विलासिना । विहसामि तदैवाहं बालवन्मत्तचेष्टितः ॥ € ॥।
१. अन्न "कमातृका प्रारभ्यते। र. अत्र 'ख'मातृका प्रारभ्यते ।
२ श्रीकृष्णयाम ल महातन्त्रम् `
ब्रहम विष्णुरिवादीनां दुलं भाष्दुद्गात् परम् । श्री मद्वन्दावनपदाद् गो विन्दपद्चिह्कितात् ।) १० ॥ गोपगोपीगणप्रेमवसतेः सुखसम्पदः । गोविन्दचरणद्रन्द्रमकरन्दरसोदयात् | ११॥ वश्खितोऽस्मीति मत्वाद्य रौम्युद्राहुविम्ढवत् । गलद्राष्पाकुलाक्षोऽस्मि तदीयमदहिमा(म) स्मृतेः ।। १२॥ त्वदीयभ्सद्खमे यादृक् सुखं कमललोचने । तत्कोटिकोटिगृणितं सुखं गोविन्दसङ्गमे ॥ १३॥। तत्तत्सुखविहीनस्य दुःखमन्यत् सुखं प्रिये । तेन किलष्टमतिदचास्मि सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।॥ १४ ।। ब्रह्मानन्दो भवेद् देवि भपराद्धंदिग् णीकृतः । गोविन्दसेवानन्दस्य कलां नाहंति षोडशीम् । १५॥। तेनैव त्वन्मुचे नित्यं विमुखो सुमुखि प्रिये । यदि वाऽऽपतितं दुःखं दृष्ट्वा हृष्टो हसामि वै ॥ १६ ॥ तदत्र कारणं देवि भश्यृणुष्वैकमतिः सती । कल्पवक्ष्तलस्थस्य सामान्यं फल मिच्छतः ।॥ १७ ॥। यत्तु दुःखं धावतः स्यात् तत्र का परिवेदना । इलाध्यं भवतु मे दुःखं त्यक्तगोविन्दसम्पदः। १८॥ सामान्यसुख*लिप्साया यथोचितमिदं फलम् । इति स्मत्वा हसन्नित्यं विलपामि पुनः पनः ॥ १९ ॥ आकाश्स्थो यथा भानुजंलस्था-लीष्वनैकध। । "प्रकाशते सवं भूतेष्वेव (वं) कृष्णस्तथा ध्रुवम् -॥। २० ॥ ९सम्मृ खस्थेषु = तेष्वेवममलज्ञानं जायते । सवं भूतान्तरस्थोऽसौ भगवान्. भूतभावनः ।। २१॥। षपसवंगः सवं पाताले नाहं दुगंमे भयः । यदा कृपावलोकेन "भ्तेनेवाहं निरीक्षितः ॥ २२॥
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१. उद्गात्-क. । २. “मद्” नास्ति-ख. । ३. सङ्गमो-ख. । ४. पराद्धं-ख. । ५, श्रणुयैकमति-क. । ६. तस्पस्थस्य-क. । ७. किप्सया-क. । ८. लीयते । कथा-क. । ९. प्रकाशन्ते-क. । १०, “सम्भुलस्थेषु" इत्यस्य स्थाने (छम्मुखस्थे' इति-क, । ११. सत्रगः-₹. । १२, जयः-क, । १३. नेन बाहं -क. ।
प्रथमोऽध्यायः ३
तदा मम भवेत् नृत्यं गीतं चैव विशेषतः ।
प्रिये कि कथयिष्यामि यावदूवैदुभंगस्य मे ।। २३॥। षटुःखमारूढवुक्षस्य पतितस्य फलोदये । ब्राह्मण्युवाच
कोऽसि त्वं कस्य वा हेतो तः कस्मात् सुखाच्चिरम् ।।२४।। वग्वितोऽसि महाभाग ! कस्मात् स्थानादनृत्तमात् ।
कुत्र तिष्ठति तस्स्थानं प्रभो मे चिन्धि संशयान् । २५ ॥ ब्राह्मण उवाच
- कश्ापभ्रष्टाऽसि नात्मानं मां च जानासि भाविनि।
प्रायः स्त्रियो विपत्काले न स्मरन्ति निजक्रियाम् ।॥ २६ ॥ ब्राहयाण्य् वाच
वश्ितोऽसि भहाभाग ! कस्मात् स्थानादनृत्तमात् ।
कियद् दूरे च तत्स्थानं तन्मे च्कथय निरिचतम् ।। २७ ॥ ब्राह्मण उवाच
श्रीमद्वन्दावनस्थानादहं अष्टोऽस्मि दुभेगः । श्रीवन्दावनचन्द्रस्य शपेन परितुष्यते ।। २८ ॥। तत्त॒ वृन्दावनस्थानं सवं लोकमनोहरम् । व्यापकं च यथा ब्रह्मा नाना सवंत्र भासते ।॥ २६ ॥ सर्वलोकोपरिचरं शिरोमणिरिवोज्ज्वलम् । दिव्यवन्दावनं नाम महावनमनुत्तमम् ।॥ २१ ॥ भौमं व॒न्दावनत्वं यद्गतं श्रीकृष्णलीलया । वृन्दावनं तु त्रिविधं दिव्यं भौमं तु सुन्दरि ॥३१॥। भौतं च ब्रह्मणा ज्योतिःस्वरूपेण विनिमितम् ।
यत्त॒ दिव्यं तथा भौमं ब्रह्माण्डान्तगंतं तु यत् ॥ ३२॥ दिव्यवन्दावनस्पर्शाद् दिव्यं रूपं महत्पदम् । अद्मृतं दृश्यते भूमौ सर्वेषां पापमोचनम् ॥ ३२ ॥ तदेव द्विविधं साध्वि मा(म)रापुरुषोत्तमः ।
ययोः कृतायां यात्रायां पापं याति न संशयः ॥ ३४ ॥ मथुरायां स्वयं साक्षादागतं विपिनं महत् ।
यत्र क्रीडति विश्वात्मा श्रीगोविन्दो निजैगुणेः ॥ ३५॥
१. अन्नत्य “ख "मातृका खण्डिता । २. शत्र ^च'मातृका प्रारभ्यते ।
४ श्रोकृष्णयामलमहातन्त्रम्
अन्यं महामहे श्रीमत्पुरुषोत्तमसंज्ञया ।
तस्य विष्वेश्वरस्यैव प्रतिम्तिविरश्चिना | ३६।। प्रथिता निजभक्तस्य इन्द्र॒ म्नस्य॒ धोमतः । श्टान्तं दान्तं क्षमायुक्त वद्भिहोमपरायणम् ॥ ३७ ॥। कृष्णभक्तजनप्राणप्रतिमं प्रशमायनम् । सङ्कीतकुशलाभिज्ञा सवंशास्त्राथंकोविदा । ३८ ॥ ज्ञान विज्ञान गो विन्दं (न्द) सेवानि जतकल्मषा । अपारभवपाथोधि तत्तुकामा शू (सु)विस्मिता ।। ३६ ॥ पप्रच्छ ब्राह्मणी कान्तं कान्तं क्लान्तमनाः श्चिम् ।
ब्राह्मण्य्वाच
स्वामिन् ध्यायसि कि नित्यं मूषेन परिशुष्यता ।। ४० ॥
कृष्णः क्वचिद् ग्रान्तः स्खलद्गतिः [ क्वचित् |। क्वचिदृन्मत्तवद् भासि क्वचिद्धससि बालवत् ।॥ ४१।।
रोदिषि क्वचिदुद्राहुगंलद्वाष्पाकुलेक्षणः |
सुखकाले विलष्टमना दुःखकाले हसन्मुखः । ४२॥।
निले ज्जित [:] प्रकथने निभंयो दुगमे वने ।
क्वचित् नृत्यसि निलंज्जो गायस्य च्चस्वरः क्वचित् ।। ४३ ।।
किमिदंते व्यवसितं न जाने तद् वद प्रभो ।
ब्राह्मण उवाच प्रिये यद् दुलंभं लोके तन्मया परिचिन्त्यते । ४४॥ तदप्राप्तिभयात् शृष्कवदनङइचकितेक्षणः ।
कदाचिद् हृदये तस्याश्वासविश्वासतो मुहुः ॥ ४५॥ प्रहृष्टहृदयश्चारस्मि शान्तात्मा विगतज्वरः ।
यथा धनो लन्धधने विनष्टे तान्तक्रृत् सदा ॥ ४६ ॥ तच्चिन्तावक्लगो नान्यत् चिन्तयेदेकमानसः ।
एवं लब्धेश्वर [स्य ]स्य दुभंगस्य दुरात्मनः ॥ ४७ ॥ तत्पादसेवासम्बन्धी (न्धाद्) दंवाद् ज्रष्टस्य सूत्रे । पुनस्तं प्राप्तुकामस्य दंवान्न घटते च यत् ॥ ४८ ॥
१. मन्यामहे-च. 1 २. “शान्तं' इव्यारभ्य “भामिनी' इति ४ ९संख्यक- श्छोकपर्यन्तं पासे नारस्ति-च, ।
प्रथमोऽध्यायः ५
तेनैवाहं सदा भ्रान्तः संश्रान्तो वीक्षितस्त्वया । तच्चिन्ताविष्टचित्तस्य पधि यातुः स्खलद्गतेः ।॥ ४६ ॥ + > देह उन्मत्तवद् भाति भावाभावविवजिताः(तः) ।
` अहं तव सखा बन्धो मा खेदं कुर् भामिनि ॥५०॥ ष्हितार्थं तदधिष्ठानं वनं वृन्दावनं परम् ।
यत्तु भौमं वनं तत्त् जाते भोते व्यवस्थितम् ।। ५१॥। आब्रह्मस्तम्बपयंन्तं सवं भूतरिरोपरि । सहस्रपत्रं कमलं भाव्यते सिद्धि(दध)योगिभिः ।॥ ५२॥ दिव्यं वन्दावनं ध्यात्वा विष्णृभरंलोकपालकः।
भौमं बनं च सञख्िन्त्य ब्रह्मा सरष्टा श्रूतान्वितः ।। ५३ ॥ ष्मोतं वन्दावनं ध्यात्वा शिवः संसिद्धिमागतः। एषामेकतमं ध्यात्वा भ्तथेव पुरुषं परम् ॥ ‰४॥ तरन्ति भवपाथोधि सवं प्राप्तमनोरथाः । आबाल्यं ५तव सख्यं मे प्रिये भक्तासि मे सदा। आम्लात् कथयिष्यामि यतो शष्टोऽस्मि तत् श्वृणुं । ५५ ॥
॥ इति श्रीकृष्णयामले महातन्त्रे वन्दावनम्नष्टवियाधर-
विद्याधरीप्ररनः नाम प्रथमोऽध्यायः ।॥ १॥
निः 5१ कि कन
१. हताथ. "परम्' इत्यस्य स्थाने “हिता '““" मक्तितस्परम् इति खण्डितः पाठटः-क. । २. जताते-क. । ३. मोमं-क. । ४. तथैवं-च. । ५. स्वयि-ख. ।
दितीयोऽध्यायः
नारद उवाच
ष््त्थं संपृष्टो ब्राह्मण्या ब्राह्मणः संशितव्रतः । अवदद् वदतां श्रेष्ठो गोविन्दैकपरायणः ॥ १॥ ब्राहमण उवाच
'सर्वाऽधस्ताद् ्ब्रह्मचिलाधारशक्तिस्वरूपिणौ ।
सा द्वितीया पराम्तिः गोविन्दस्य महात्मनः ।॥ २॥ तद्व च महाकरूमंः कष्णस्यांशांशसम्भवः । यदूर््वे भ्सखि पातालं स्वर्गाधिकमनोहरम् ॥३॥ सहसख्रवदनो यत्र॒ नागराजो विराजते। कमं पृष्टेकदेरो यस्तन्तुवद् दृश्यते सदा ॥४॥ महातलं तदूर्ध्वं च नागतियंक् शिरस्थितम् । तलातलं तदूध्वं च तदूध्वं च रसातलम् ।॥५॥ शेषमध्यस्थलस्थं तद् राष्ट्र सवंसुखावहम् । तदूर्ध्वे सुतलं नाम नानाभूतमनोहरम् ॥६॥ यत्र॒ दैत्यपतिः श्रीमान् बलिरिन्द्रपदाच्यूतः ।
तिष्ठत्यमरसङ्कालः सम्मुखीनगदाधरः ॥७॥ तदूर्ध्वे वितलं यत्र॒ महस्यरूपीजनादंनः। हयम्री वदं त्यहन्ता तदूर््वमतलं श्रिये ॥८॥
यत्र॒ तिष्ठति विष्ण्वंशो वराहो धवलाकृतिः। शेषच्डामणेरूध्वं शोभते मशकोष्पमः । ६ ॥ कोटियोजनविस्तारं कोटियोजनमुच्छितम् । पातालानां च सवेषां परिमाणमुदाहूतम् ॥ १० ॥
१. “इस्थं"““"उवाच' इति नार्ति-च. । २, ब्रह्मशिखाऽक्ञर-क. । ३. सल्ञे-च. । ४. यमः-क. ।
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1. द्वितीयश्छोकाद्रम्य < १संख्यकश्छोकपयंन्ताः श्री मद्धागवततमहापुराणे ( पञ्चमस्कन्धे १६-र४्अध्यायेषु ) वर्तन्ते । तत्रत्या बिशेषाः पाठा (मागर! ३ इति सङ्केतेनात्र संगृहीताः । प्रध्वी-अ तर-बितठ-सुतर-तकातर-महातरु-रसातक- ` पातारा इति वतते छोकवणंनक्रमस्तत्रत्यः ( भाग० ५।३४।७ ) । |
द्वितीयोऽध्यायः ७
तामसानां च भताना पातालं निलयं ध्रुवम् । हिताय भगवंस्तेषां विष्णुर्नानातनुवंसेत् ॥ ११ ॥ तस्य दन्ते स्थिता पृथ्वी सशैलवनकानना । मुस्ताखनर(न)तो लग्ना शोभते म॒त्तिका यथा ।। १२ ॥ त्रिकोणा पथिवी कान्ते सप्तद्वीपवती सती । पीतवर्णा क्षतु(चतुः)चित्रा सप्त सागरमेखला ।। १३ ॥ विष्णुना क्रोडरूपेण पातालमु(लादु)ढता त्वियम् । अस्याः संक्षेपतो भागलक्षणं च श्णणु श्रिये ॥ १४ ॥ कृष्णेन भक्ता(क्त)रक्ार्थं प्रेषितेन मयेक्षितम् । नवभागं पृथिव्या वै नववर्षं विदुर्बुधाः ॥ १५॥। इलावर्षं तु भद्राश्वं हरिवषं तथैव च । केतुमालं रम्यकं च हिरण्मयमथापरम् ॥ १६ ॥ कुरुवर्षं किम्पुरुषं भारताख्यं ततः परम्. । गइलावपषें च भगवान् भवान्या सहितो भवः ॥ ५७ ॥' भगवन्तमनन्ताख्यमुमास्ने(मया) स्वगणवृंतः । मनुमेतं स जपति निजभ वाथं सिद्धये । १८ ॥ २ॐ नमो भगवते महापुरुषाय सवं गृणसङ्खयानाया- नन्तायाग्यक्ताय नम इतिः || १६ ॥ पृथ्वीनाभिगतं वषं तन्मध्ये स्वणं पवंतः ।
सुमेर पवं तस्तस्य पवता सुमनोहराः ॥ २० ॥ नीलः इवेतः श्युङ्कवांडच रम्यकोऽथ हिरण्मयः । हिमवान्निषदो(घो) विन्ध्यो माल्यवान् गन्धमादनः ॥ २८ ॥। स(सु)पादवं; कुमृदद्चैव मन्दरो मेरुमन्दरः ।
अन्ये च गिरयो साध्वि रत्नधातुविचित्रिताः ॥ २२॥। दिग्विदिक्षु वरारोहे वारिप्रश्रवणोज्ज्वला । ब्रह्मलोकान् महादेवी “गङ्गा त्रिपथगामिनी ॥ २३ ॥
१. इस्यनत्र “्च'मातृका समाक्िः । २. ॐ नमो भगवते महो पुरूषायानन्ताय अन्यक्छाय नम इति" इति “क संज्ञकमातृकायाम् ।
~ 1. इखावृतवषेवर्णनं श्रीमद्धारावते ( ५। १६।७.२९; ५।१७ ) इश्यते । 2. भाग. ( ५।१७।१७ ) 1 3. गङ्गाया उत्पत्तिः, तस्याः विविधमभेदाश्च श्रीमद्धागवते ( ५।१७।१-५ ), स्वच्छुन्दुतन्त्रे ( १०।१७२-१८१ ) च वर्गिताः ।
वदते
८ श्रीकृष्णयामलमहोतन्त्रम्
विष्णुपादाधंसम्भ्ताऽधोऽधमेरोभुजं गताः । स्वगं मन्दाकिनी ख्याता वक्षः पूर्वं च भद्रकाः(का)। २४॥ उत्तरे यशस्विनी पश्चाद् दक्षिणेऽलकनन्दका । भोगवती च पाताले सवंषामघनाशिनी ॥२५॥ नदा नद्यो बहुविधा वषं वषं सुशोभनाः । घवंतानां चतुदिक्ष् राजन्ते तरवोऽमलाः । २६॥ चत्वारः पवंताकाराः सहस्रयोजनोच्छयाः । च्तजम्ब्नीपवटोः(टाः) पूवादिष्ु यथाक्रमम् ।। २७ ॥ देवोद्यानानि चत्वारि चतुदिक्षु वरानने । नन्दनाख्यं वनं पूवं शक्रप्रियकरं परम् ॥२८॥ वनं चैत्ररथं नामा(म) दक्षिणे दक्षिणं श्रृणु । वैग्राजकं परिचमे च सवंतोभद्रमृत्तरे ।२६॥ "ततो भद्रारववषं तु मेरोः पूवं व्यवस्थितम् । तत्र॒ भद्रश्रवा नाम धमंपुत्रो महायज्ञाः ॥३०॥ हयग्रीवं निजजलैयं जत्यघविनाशनम् न््रेणनेन कृष्णांशं सखवन्त्यमललोचने ॥३१॥ ॐ नमो भगवते धर्मायात्मविशोधनाय नमः ॥ ३२ ॥ मेरोरीगानभागे तु "हुरिवषं सुशोभनम् । यत्र॒ वैनृहरि देवं प्रह्वादोऽचंति नित्यदा ।३३॥ हिरण्यकरलिपोः पुत्रो महाभागवतोत्तमः । जपत्येवं महामन्त्रमेकान्तहृदयो मनिः ॥ ३४॥ %ॐ नमो भगवते नरसिहाय नमस्तेजस्तेजसे आवि- राविभंव वज्नखवजदंष्ट् कर्माशयान् रन्धय रन्धय तमो ग्रस ग्रस ॐ> स्वाहा । अभयमभयमात्मनि भूयिष्ठा ॐ क्षोम्* ॥ ३५ ॥
१. “ॐ> नमो भगवते नरसिंहाय नमस्तेजसे स्वा विराविभेववल्ननखदंष्ट्- युध्वयकमांशञयान्न तमो म्रसन्तु स्वाहा । अभयमभयमात्मनि भरूविष्ठ इ» दों चौहों स्वाहाः इति "क'संज्ञकमातृङायाम् ।
1. भद्राष्ववषेवणेनं तत्रैव ( ५।१८।१ )।
2. भाग. ( ५।१८।२ ) ।
3. हरिवर्षस्य विवरणं श्रीमद्भागवते ( ५।१८।१७ ) इति । 4. आग, ( ५।१८।८ ) ।
द्वितीयोऽध्यायः &
सुमेरोरुत्तरे 'केतुभा(मा)नले लं (ल)क्ष्मीहं रिप्रिपा ।
कामदेवं जगद्रीजभूतमचंति नित्यशः ॥ ३६।
लक्ष्मीः समानरूपाभिर्नारीगिनिस (भिरिद)मद्भुतम् ।
मनु त्रिभुवनाकषं जपत्येकान्तमानसा ॥ ३७ ॥
ॐ हां हीं ह ॐ नमो भगवते हूषोकेशाय सवं गुणविशेषे - विलक्षितात्मने आकूतीनां चित्तीनां चेतसां विशेषाणां चाविपतये षोडशकलायच्छन्दोमयायान्नमयायामतमवाय सवंमयाय सहते ओजसे बलाय कान्ताय कामाय नमस्ते उभयत्र भूयात्“ ॥ ३८ ॥
ततो मेरोर्वायूकोणे भरम्यके वषंसत्र(त्त)मे । भगवन्तं मत्स्यरूपमचंल्ति तत्र॒ पूरूषाः ॥३९॥ स्तुवन्ति मत्स्यसूक्तेन तत्तदेशनिवासिनः । जपन्ति च महामन्त्रं मत्स्यसन्तोषहेतवे ॥ ४० ॥। २ॐ नमो भगवते म् ख्यतमाय नम: सत्त्वाय प्राणायौजसे सहसे बलाय महामत्स्याय नमः ॥ ४१॥ मत्स्यावतारो द्विविधः कृतो भगवता पुरा । एकः पातालभवने मत्स्येन्द्र स्वणंलोहितः । ४२॥ वराहस्य भ्वधार्थाय स्वयमेवागतः प्रभूः । अयं सुबणंशफरीभ्टपो वषं च रम्यके ॥ ४२॥
१, हां हींहू ॐ नमो भगवते हृषीकेशाय स्वेगुणविशेषविवक्जितार्मने काङ्कतेनां विनीतां च विशेषाणां वा चिपतये षोडशकलाय इन्दोमयायात्ममया- याऽखृतमयाय सवेमयाय सहक्तेजसे बय कान्ताय कामाय नमस्ते उभयत्र भयान्" इति “क संज्धकमातृकाय।म् । २. ॐ नमो भगवते मुख्यतमाय नमः सवाय प्रागाय ओजसे बलाय महामत्स्याय नमः इति क संज्ञकमातृकायाम् । ३. अत्र ग'मात्ृका प्रारभ्यते । ४. “सूपो '“ "रम्यके नास्ति-ग. । ~
1. केतुम।रुव्षवणेनम् (भाग. ५।१८। १५१ ७) । 2, भाग. ( ५।१८।१८ ) । 8. अस्य विवरणं श्रीमद्भागवते ( ५।१८।३४ „ प्राप्यते ।
४, माम. ( ५५१८।२५ ) ।
१० श्रीकृष्णयामलमहातन्त्रम्
ध्वाक्ष॒साख्ये मनौ सत्यत्रताथं योऽवतीणंवान् ।
ततो "हिरण्मयो “मेरोः परचाद् दिशि शुभानने ।। ४४ ।। करूमंरूपधरं देवमध्यंमचंति सवदा । तत्रत्य पुरुषः साधं मनमेतं प्रजल्पति । ४५॥ *ॐ नमो भगवते अकूपाराय सवं सत्वगृण- विशेषणायानुपलक्षितस्थानाय नमो वष्मंणे नमो
भूम्ने नमो नमोऽवस्थानाय नमस्तेः ॥ ४६॥ कूर्मावतारो भगवान् द्विविधः *सत्यविग्रहः ।
एको महान् ब्रह्मिलारूढो ब्रह्माण्डकोटिधुक् ॥ ४७ । समद्रमथनाथं तु मन्दराद्विधरोऽप्ययम् । मेरोस्तु नैक्रेते भागे "कुरूवषं वसुन्धरा ॥ ४८ ॥। कुरुभिः सह देवेशं वराहं नित्यमचंति ।
यं यज्ञपुरुषं स्तौति महामन्त्रेण मेदिनी । यस्यैव जपमात्रेण पार्थिवत्वं न्णां भवेत् ॥ ४६॥ ५ॐ नमो भगवते मन्त्रतन््रलि ङ्गाय यज्ञ क्रतवे महा- ध्वरावयवाय महापुरुषाय नमः कमंशुक्लाय त्रियुगाय नमस्ते || ५० ॥। सुमेरोदंक्षिणे . भागे वषं किम्पुरुषे कपिः । हनूमान् वायूपुत्रोऽयमञ्जनाकुलभ्रञ्जनः ॥ ५१॥।
१, चाञ्जसाख्ये-ग. । २. “मेरो"““'दिक्ञि' नास्तिग. । ३. “ॐ नमो भगवते अकूपाराय स्वगुणविरोषण।य नमो उपलक्ञितस्थानाय नमो वष्मणे नमो श्चम्ने नमोऽवस्थानाय नमस्ते". इति “क'सन्ञरमातृकायामू । ४. सत्वविग्रहः-क. । ५, “हॐ नमो भगवते मन्त्रतन्त्रलिङ्गाय क्रतवे महापुरुषाय नमः कसशुक्छाय त्रियुगाय नमस्ते' इति “क संज्ञकमातृकायाम् ३. । रेजनः-क. ।
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१. दहिरण्मयवषवणंनं श्रीमद्भागवते ( ५।१८।२९ ) । 2. आग. ( ५।१८।३० ) ।
8. ऊुरुवषवणेनं श्रीमद्धागवते ८ ५।१८।३४ ) ।
4 भाग. ( ५।१८।३५ ) 1
5. किस्पुरुषवषेवणं नं श्रीमद् भागवते ८ ५।१९।१-२ ) इति ।
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द्वितीयोऽध्यायः ११
सीतया सहित्तं देवं श्रीरामं लक्ष्मणाग्रजम् ।
उपास्ते किन्नरैः सार्धं गन्धमादनपवंते ।
स्वयं “जपति देवस्य मनूमेतं महाबलः ॥ ५“ ॥\ २ॐ नमो भगवते उत्तमश्लोकाय नम आयं लक्षणशील व्रताय नम उपशिक्षितात्मन उपासितलोकाय नमः साधुवादनिकषणाय नमो ब्रह्मण्यदेवाय महापुरुषाय महाराजाय नमः ॥ ५२ ॥ सुमेरोरग्निकोणे `च भ्मारते वष॑ंसप्त(त्त)मे । नरनारायणं देवं नारदः समूपास्ति शच ॥५४॥ व्यासोऽपि यत्र॒ भगवान् श्रीमद्रदरिकाश्रमे ।
ब्रह्माक्षरं जपन् सन्त्र भुक्तिमृक्तिफलत्रदम् ॥ ५५॥ ५ॐ नमो भगवते उपश्मशीलायोपरतानाष्त्म्याय नमोऽकिश्चनवित्ताय ऋषिक्रषभाय नरनारायणाय परमहंसपरमगुरवे आत्मारामाधिपतये नमो नमः ॥ ५६॥ सुमेरोरुत्तरे भागे मध्ये तु लवणाम्बुधेः । विष्णुलोको महान् प्रोक्तः सलिलान्तरसं स्थितः ॥ ५७ ॥ अन्र स्वपिति धर्मान्ते देवदेवो जनादंनः । लक्ष्मीसहायः सततं शेषपयं ङ्गुस स्थितः ॥ ५८ ॥ मेरोर्दक्षिणदिग्भागे जम्बवक्षोऽतिशोभनः । अनेकयोजनोच्छूयो जम्बृद्रीपस्तदाख्यवा ॥ ५९ ॥
१. जयति-क, । २. “ॐ नमो भगवते उत्तमश्छोकाय आ्यलचमण- श्षीलन्रयाय नम उपशिक्तिताटमने , उपश्िकतितल काय नमः साधुवादनिकषणाय नमो ब्रह्मण्यदेवाय महापुरुषाय महाराजाय नमः' इति “क संज्ञकमातृकायाम् । ३. भच इत्यस्य स्थाने “व'-क. । ४, “च इत्यस्य स्थाने ^तु-ग. 1 ५. ॐ नमो भगवते उपश्मन्ञीरयोपरतानत्म्याय नमोऽञ्जिन्नन वित्ताय ऋषिश्रषमाय नरनारायगाय परमहंसगुरवै आध्नरामानिपतये नमो नमः' इति “क ' संज्ञकमातृकायाम् । ३. ^म्याय' इत्यारभ्य +जगदीश्वरम्' इति ८८ संख्यकश्छोकपर्यन्तं पाठो नास्ति-ग. ।
व य
1, माग. ( ५।१९।३ ) ।
2. भारतवर्षव्णनमू ( मारा. ५।१९।९-१० ) । 8. भाग. ( ५१९।११ )।
१२ श्रीकृष्णयामलमहातन्त्रम्ं
कमंभूमिरयं भद्रे लवणोदेन वेष्टितः । प्रियव्रतात्मजो यज्ञबाहुरत्राधिपो महान् ॥६०॥ अस्मिन् वषं महाभागे "पवंतान् श्णु कथ्यते । मत्ल(ल)यो सङ्कल प्रस्थो मैन्यान्य(नाक) स्त्रक् (क् )टस्तथा॥६१॥ ऋषभः ष्कुक्कुटः भकोल्लः सद्यो (ह्यो) देवगिरि: प्रिये । श्रीशैलोऽपि ऋश्य (ष्य) ङ्खो महेन्द्रो विन्ध्य एव च ॥ ६२॥ वारिधार [:] चुक्रि(क्ति) मांच पारिपा(या)त्रस्तथैव च । ऋक्षो द्रोणरिचत्रकूटो नीलो रेवतकस्तथा ॥ ६३ ॥ गोवधं नस्तु ककुभ इन्द्रनी(को)लगिरिस्तथा । गोकामुखः कामगिरिः प्राधान्यात् कथितास्त्विमे ॥ ६४ ॥ एषां नित्यं व (वै) प्रभवा नदा ऽनच शोभनाः ।
पुनन्ति भारतं वषं तासां नाम श्यृणू प्रिये ॥ ६५। चन्द्रवंशा(दया) तास्रपर्णी कृतमालावटोदका ।
वेहायसी भीमरथी कावेरी च पयस्वती(नी)॥ ६६॥
१. कूटकः-भःग. ।
1. पर्वतानां त्रिवरणं तत्रेव (५) १९।१६) दश्यते, यथा-“भारतेऽप्यस्मिन् वप खरिच्छैराः सात बहवो म्यो मङ्गलब्रस्थो मैनाकस्त्रिहट ऋषभः कूटकः कोल्लकः सहो देवगिरि ऋष्यमूकः श्रीशो वेङ्कटो महेन्द्रो वारिधारो भिन्ध्यः शक्तिम नृष्ठणििः पारियात्रो द्रोणश्चित्रहुटो गोव्धनो रेवतकः कङुभो नी गोकामुख इन्द्रकीरः कामगिरिरिति चान्ये च शतसहस्रशः शंरास्तेष! नितम्ब. प्रभव] नद्! नदश्च सन्ध्यसङ्खयातः' इति ।
2. अयं पाठो भाग. ( ५।१।१६ ) प्राचीनहस्तकेखेन समभ्यंते ।
$. नदीनां जिवरणं ( भाग. ५।१९।१८ ) एवमेव~“चन्द्रवसा( वंश्या ) ताख्रपणीं अवटोदा कृतमाल) वैह।यसी कावेरी वेणी पयस्विनी राकरवता तुङ्गभद्रा कृष्णा वेण्या भीमरथी गोदावरी निर्विन्ध्या पयोष्णी तापी रेव सुरता नर्मदा च्मैण्वती सिन्धुरन्धः शोणश्च नदौ महानदी वेदस्तिक्रषिकुल्या त्रिसामा कौशिकी मन्दाकिनी युना सरस्वती चषद्वती गोमती सरयू रोधस्व(व)ती सक्तवती सुषोमा शतद्रश्चन्द्रभागा मर्दना चितस्ता अपिक्नी विश्वेति महानश्यः' इति ।
दहितीयोऽध्यायः १३
वेणा च कृतवेणा च तुङ्खभद्रा च नमंदा ।
सुरसा शकंरावर्ता ऋषिकुल्या महानदी ॥ ६७ ॥ गोदावरी च निविन्ध्या पयोष्णी कौशिको तथा । मन्दाकिनी गोतमी (मती) च यम्ना च सरस्वती ॥ ६८ ॥ तापी रेवा सुखोभा(षोमा) व (च) चन्द्रभागा मरुद्व धी (धा) । चर्मण्वती चौन्व (रोध)वती वितस्ता सरयूस्तथा ॥ ९६ ॥ वेदस्मतिः शतदरख्च विदचा (श्वा)सिक्री तथेव च ।
आत्रेयी करतोया च नद्य एताः सुशोभना ॥ ७० ॥ नदा अन्धर्च शोणड्च लौहित्यो भैरवादयः । अस्मिन् भारतवषं च "उपद्रीपान् वदाम्यहम् ॥ ७९ ॥ स्वणंप्रस्थं चन्द्रमकंमावतंकं तथापरम् ।
सिंहलं “मन्दहरिणं पाश्चजन्यं तथैव च ॥७२॥ लङ्कामिति विजानीहि द्वीपान् भारतमध्यगान् । जम्बद्विगृणविस्त [7 |रः ` प्लक्षद्वीपो विराजते ॥ ७३ ॥ वत दइक्षुरसोदेन समुद्रेण महोमिना ।
नद्यो नदाः परवंताइच सवंतः सन्त्यनेकशः ॥ अ४॥ आसीत् तत्राधिपो नाम्नेध्मर्वा(बा) हषं मं विग्रहः । अनेकयोजनायामः प्लक्षस्तत्र॒ विराजते ॥ ७५॥ तन्नाम्ना द्वीपराजोऽयं सुखदः सवं देहिनाम् । ततस्तु +शाल्मलीद्रीपो द्विगुणः प्लक्षतः प्रिये ॥ ७६ ॥ सुरोदेन समद्रेणावृतो यत्रास्ति शाल्मलिः । अनेकयोजनोच्छायो बहुयोजनविसु(स्तु)तः ॥ ७७ ॥ तत्र॒ प्रियव्रतसुतो रोचनोऽधिपतिः स्मृतः
तत्र॒ श्रिये च्कृशद्रीपे घृतोदेनावृतः शुभे ॥ ७८ ॥
रक के ण का क
1. उपद्भीपानां विवरण (भग. ५ १९।३०) यथ ¡"तद्यथा स्वणप्रस्थश्चनद्र- शुक्ल आवर्तनो रमणको मन्दरहरिणो पाञ्चजन्यः सिंहलो र्ङ्केति ।'
2. अयं पाठो भागवतमह। पराणस्य प्राची नहरतञेखेन समथ्यंते ।
3. प्लक्षद्वीपस्य चिवेरणं श्रीमद्धारावते ( ५।२०1१-७ ) दश्यते ।
4. ज्ञालमली द्वी पवणंनं तत्रेव ( ५।२०।८-१२ ) दीयते ।
5... कुकशद्री पस्यवणं नं तत्रेव ( ५।२०। १३.१५ ) दृश्यते ।
१४ श्रीकृष्णयामलमहातन्त्रम्
यत्राग्निप्रतिमः श्रीमान् कुशस्तवो विराजते । तन्नाम्ना द्वीपवर्योऽयं नानासुखसम्द्धिमान् ॥ ७९ ॥ हिरण्यरोमा(रेता) तस्येशः प्रियव्रतसुतो बली ।
नदा नद्यः पवंताश्च बहवो हि हिरण्यमयः(याः) ॥ ८० ॥ 'क्रोचचद्रीपस्ततो भद्रे क्षीरोदेनावृतो बलः । क्रौच्चनामा यत्र राजा धृतपृष्टः(ष्ठः) सुरोपमः ॥ ८१॥ मेरोक्त (स्तु) पूवेदिग्भागे मध्येक्षीराणंवस्य च। तत्रापि चतुरोमासान् सुप्तस्तिष्ठत्यसौ हरिः ॥ ८२॥ नदा नद्यः पवंताश्च सन्त्यत्र बहुभिगुंणेः। £शाकद्वीपस्तत्परस्ताद् दधिमण्डोदकेन वे(वै) ॥ ८३॥ सिन्धुना वेष्टितो यत्र शाको नाम महांस्तरः। व्रिराल्लक्षयोजनो्ध्वो रत्र ह्यत्र) धातुवि(वि)निमितः ॥ ८४ ॥ राजा मेध्य(धा)तिथियंत्र प्रियत्रतसुतः प्रियः । तस्माद् द्विगुणविस्तारः पुष्करद्वीप उत्तमः॥ ८५॥ सौोवणं पुष्करं यत्र पुण्यं ब्रह्मासनं प्रिये।
अनेकयोजन [1 | यामं सवं भूतमनोहरम् ॥ ८६ ॥ प्रियत्रतसुतस्तत्र राजा सवं जनप्रियः । गुद्धोदकसमूद्रेण वेष्टितं सवंकामिकम् \ ८७ ॥
नदा नद्यः पवंताश्च बहवः सन्ति तत्र वै। तत्रस्थाः पुरुषा नित्यं ब्रह्माणं जगदीश्वरम् । मनूमेतं जपन्तो वै यजन्ति ज्ञानविग्रहाः॥ ८८ ॥ *ॐ यत् तत् कमं मयं लिङं ब्रह्मलिङ्धं जना अचं - यन्ति भेदेनैकान्तमद्धेतं तस्मै नमो भगवते नमः ॥ ८६ ॥ इति ते कथितं देवि द्वीपवर्षादिकं मया। लोकालोकस्तत्परस्ताद् गिरिधंरणिवेष्टितः ॥ ६० ॥
1. क्रौञ्चद्वीपस्य विवरणं तत्रैव ( ५।२०।१८-२६ ) । 2. ज्ञाकद्वीपवणं नं तत्रैव ( ५।२०।२४-२८ ) । 8. पुष्करद्वीपस्य तत्रैव ( ५।२०।२९-३३ ) । 4, यत्तत्कर्ममयं लिङ्गं ब्रह्मलिङ्गं जनोऽचैयेत् । एकान्तमद् यं शान्तं तस्मै भगवते नम इति ॥ (भाग. ५।२०।३३) ।
द्वितीयोऽध्यायः १५
भित्तिवद् राजते भूमेः संस्थानं चारुहासिनि । शृद्धोदकोत्तरे तीरे इवेतो नासाऽ्न्यभूवरः ॥ ९ ^ ॥ तत्र॒ तिष्ठति देवेशो विष्णुलंक्ष्मीसहायवान् । भूर्लोकः कमं भूमिश्च राजसानां महात्मनाम् ॥ €^ ॥ स्थानं तद् वणितं भद्रे तदूध्वं यच्निशामय। वृक्षाग्रात् पवंताग्राच्च पादागम्यान्महीप्तलात् ॥ ९२ ॥ पच्चाशद्योजनोध्वं च बहुरूपाः सहस्रशः ।
परेतमूत पिशाचाद्या मांसासुक्पूयभोजिनः ॥ &४ ॥ यथा वराद्कधि श्ग्रामान्ते *निवसन्ति कृपूरुषाः । स्वगस्यान्ते तथा ज्ष्टाचारास्ते देवयोनयः ॥ ९५॥ सहस्राणां च॒ पन्चागद्योजने गृह्यकारिचरम् । धर्माधर्मपरिज्ञानविहीना निवसन्ति तेः (वै) ॥ ६६॥ सदैव सुखिनः श्यामा लोमशा दीघंमन्यवः। लम्बोदरौष्ठाः पुष्टाङ्गा हष्टपृष्टजनप्रियाः ॥ ९७ ॥ शौण्डिका नगरस्यान्ते यथा दुधेरविग्रहाः।
तथा “इच (च)रन्ते *नियतं ते ध्रुवं देवयोनयः ॥ ९८ ॥ ततः सुमुखि गन्धर्वा दिव्यगानविलासिनः। नानायत्त्रकलाभिन्ञाः कामदेवस्वरूपिणः ॥ ६६ ॥ ध्सहस्तं च ( चव ) पच्चाशदूरध्वे ते निवसन्ति वै।
यथा पुरस्य निकटे राजन्ते न॒त्यकोविदाः ॥ १०० ॥ नत॑काः स्व्गनिकटे देवानां गायना(का) इमे ।
तदूध्वेः *साधंलक्षे च निवसन्ति महाव्रताः ॥ १०१॥ विद्याधरा महाभागे नानाविद्याविशारदाः। वन्दिता वन्दिनः श्रीमन्महेन्दरस्तुतिकारिणः॥ १०२॥ नक्नत्रस्योपरि ततोऽऽप्सरोलोकोऽतिशोभनः ।
सवेषां वाज्छनीयो यो विचित्रसुखकाडक्षिणाम् ॥ १०२३ ॥ 'त॒त्राध्वि प्रथना “जाता लक्षसंख्या वराद्धना। देववेश्या नत्यगीतकुशला मदिरेक्षणाः ॥ १०४ ॥
१, तलानू-क । २. आभान्ते-क । ३. विसन्ति-क । ४. स्व~ग । ५. निधनं-क । ६. सहखां-ग । ७. साद्धं-क । ८. त्तरो-ग । ९, तत्रालि-क । १०४ स्लाता-क ।
१६ श्रीकृष्णयामलमहातनत्त्रम्
मोहयन्ति प्मोहन्या द्ष्ट्ैव देवदानवान् ।
ये चेन्द्रपदमिच्छन्ति तपोयोगबलादिना ॥ १०५॥ कुवन्ति लीलया तेषां तपोभङ्गं स्तपस्विनाम्।
श्रेष्ठा तासामुवंशी च वशीकृतजगत्त्रया ॥ १०९ ॥ ततोशन्या विप्रचित्ताख्या सवं चित्तविमोहिनी ।
अन्या तिलोत्तमा काचित् सवंभूतमनोहरा ॥ १०७ ॥ तिलं तिलं समाहत्य रूपाणां विधिना कता | रम्भाद्याद्च वरारोहे यदर्थं मम किल्विषम् ॥ १०८ ॥ नगरान्ते राजवेदया यथा चावंङ्किसंस्थिता । तथैवाप्सरसः सर्वाः स्वर्गान्ति चारुभूषणाः ॥ ६०९ ॥ ततो लक्षत्रयोर्धे(ध्वं) च यमलोकोऽतिशोभनः।
पुरी संयमनी तत्र॒ सवं संयमकारिणी ॥ ११० ॥ निवसन्ति महात्मानो राजानः पुण्यकर्मिणः
मुनयो देवगन्धर्वा धमं राजप्रियङ्कुराः ॥ १११॥ गोविन्दसेवाकूशला हरिनामपरायणाः । धर्माधमं विचारज्ञो यत्र॒ राजास्ति धमंराट् ॥ ११२ ॥ चतुर्भूजः इ्यामलाङ्गः कृष्ण पूजापराथणः । पापिनस्तं च पश्यन्ति विकटास्यं भयङ्करम् ॥ ११२ ॥ श्रीपदा (स्पर्शात्) भप्रोध्वं रोमाणं कालदण्डधरं जडम् । तेनैव गीतं गोविन्दनामश्रूतिरसायनम् ॥ ११४ ॥ श्रृण्वन्ति धीराः संशुद्धाः साधवः कृष्णलालसाः । आनयैनं बन्धथेनं पातयामूं च भ्पापिनम् ॥ ११५॥ पादं विन्ध्यस्य पापस्य करं “विन्ध्पस्य दुमंतेः । इत्यादिकं पापिनस्तच्छुण्वन्त्यज्ञान मोहिताः ॥ ११९ ॥ अत ऊर्ध्वे भुवर्लोक्रम्ध्वे वै लक्षपोजनेः। वामनाख्यो वसेद् विष्णुबलिर्ये नैव याचितः ॥ ११७ ॥ लक्ष्म्या सेवितपादाब्जः सवंदेवनिषेवितः । तस्योपरि सहखराशुर्योऽसौ साक्षात् स्वयं हरिः ॥ ११८ ॥
१. विमोहत्या दष्ट वैव-क । २. तपरिचन।मू-क । ३. ऽन्य-क । ४. पूजां-ग । ५. प्रोद्॑रोमाणां-क । ६. पापिनाम्-क । ७. द्विन्ध्यस्य-ग । <. द्विरध्य स्य-ग. ।
द्वितीयोऽध्यायः १७
ष्मुवर्लोकस्य सीमान्ते ज्योतीरूपो विराजते । सप्तसमि(प्ति) समारूढः सप्तलोकैकपावनः ॥ ११९ ॥ यन्नामस्मृतिमात्रण सवंपापैः प्रमूच्यते । एकचक्ररथान्तस्थं जपाकुसुमसन्निभम् ॥ १२० ॥ पद्मयुग्माभयवरान् विवृण्वन्तं कराम्बुजैः। ध्यायन्ति योगिनः सवे यजन्ति ज्ञानविग्रहम् । मन्त्रेणानेन धमंज् सवंधमं महेश्वरम् ॥ १२१॥ ॐ ह्वां हीं सः ।
ॐ आकृष्णेन रजसा वतंमानो निवेशयन्नमृतं
मर्त्यं च । हिरण्ययेन सविता रथेनाऽऽदेवो याति
भुवनानि पयन् ॥ १२२॥ गायत्रीं गायतः पुंसो ब्राह्मणस्य महात्मनः श्रीमद्गोविन्दभक्तस्य मुक्तस्य शुद्धचेतनः(सः) ॥ १२३ ॥ कालचक्रस्य सूर्यस्य रथचक्रस्य मध्यतः । गतिभंवति नान्यस्य भक्तिहीनस्य दुमंतेः॥ १२४॥ स्वगं लोकस्तदुपरि यत्र॒ देवः पुरन्दरः। सवेषामेव देवानामधिपोऽदितिनन्दनः ॥ १२५॥ सुमेरोः पूवंदिग्भागे वासस्तस्म महात्मनः। चतुद॑न्ता गजा यस्य॒ माद्यन्ति द्वारपाइवंतः ॥ १२६॥ एेरावताद्य [1]: प्राणेशि करिण्यर्च महाबलाः । उच्चैःश्रवा नाम हयः पय(व)मानरयो महान् ॥ १२७ ॥ मन्दुरा अधितिष्ठन्ति तद्रंशप्रभवाः परे। कारिकाविलसद् वक्रीश्वासभूषणभूषिताः ॥ १२८ ॥ अपर्यापितपर्याणां (णा) घण्टाघधघंरनादिताः । ठयामकर्ण्चारुवर्णा है (हे)षारवभयङ्कुराः ॥ १२६९ ॥ हयराजा विराजन्ते राजमानाः सहस्रशः ।
पञ्चैव देवतरवो दिव्यरूपं(प)धरारिचरम् ॥ १३० ॥
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१, अश्र भग'मातृक)ा खण्डित। ) २. आकृष्णो न रजसा-क. ।
5 1. ऋग्वेद ( १।३५।२.) ।
१८ श्रीकृष्णयामलमहातन्त्रम्
विकसत्पुष्पनिचया यथेप्सितिफलप्रदाः । सन्तानः कल्पवृक्षश्च मन्दारः पारिजातकः ॥ १३१ ॥ हरिचन्दनमित्येते रत्नानि प्रवस(सुव )न्ति वै। प्रयच्छन्ति सदाथिम्यो वस्त्रालङ्कुरणादिकम् ॥ १३२॥ चन्द्रकान्तशिलाजालच्युतमात्रामलं जलम् ।
पिवन्ति देवतास्तव्रामततुल्यं वरानने ॥ १३३ ॥ अमृतं भुज्यते सवं सर्वा(वं )भक्ष्योत्तमोत्तमम् ।
एनं रसायनं भक्ष्यं भोज्यं चोष्मं (ष्यं ) तथेव च ॥ १३४ ॥ ते ह्यं चवं मि(खवन्ति) महादेवि यच्छन्ति कामवेनवः। यत्र॒ श्रीनन्दनोद्यानं देवकन्याः सहस्रशः ॥ १२५ ॥ सङ्खीतनिपृणा नित्यं नुत्यगीतपरायणा, । पुलोमयां (जां) शचीं देवीमिन्द्राणीं कनकप्रभाम् ॥ १२३६ ॥ सेवन्ते मधुरालापैः स्स्वरङ्खन(ण)गत ङ्गनाः) कल्पद्रुमतले देव्यो गृ हुमेधीयकमंभिः ॥ १३७ ॥ यत्र स्फटिककुडचां च रअधोवक्त्रा निजक्षणे | पद्यभ्रान्त्या निरीक्नन्ति(न्ते) हसष्कत्रा पराभवन् ॥ ५२८ ॥ स्व॑देवगणैुक्ता सुधर्मां नाम वै समा।
गणका नान्न विद्यन्ते चिन्ताविद्याविशारदाः॥ १३६ ॥ चिन्तामणि गले बध्वा सर्वं जानन्ति तत्रगाः। अमरावती पुरी ह्येषा विश्वकमंविनिमिता॥ १४० ॥ दत्ता भगवता पूवं ठक्राय ब्रह्मणा श्रिये । सुमेरोरग्निदिग्भागे पुरी ज्योतिमंयी ्युभा॥ १४१ ॥ अग्निर्वश्वानरो देवः सवंदेवाग्रभुग् विभुः।
हव नीयगा (यैगा)हंपत्थैः क्रव्यादैरग्निवृत्ततः( भिवंतः) ॥ १४२॥ पुरा यमस्य सदनं स्वलेकिं विश्वकमंणा ।
कृता तत्र॒ स्थितिनंव गौरवेण भयेन च॥ १४३ ॥ समासन परित्यज्य तदधो वसतिः कृत। । भुवलेकि पितुः पादसमीपे वामनस्यच॥ १४४ ॥
वि ग ३. स्वरेगेयैर्वराङ्न)' इति पाटः स्यात् । २. "पद्मन्रान्ता निजेक्तणे' इवि पासन्तरमू ।
द्वितीयोऽध्यायः १९
पितर(ताऽ)स्य [च] जगच्चक्षुः पितृव्यस्तु पुरन्दरः । हेतुना तेन तदधः पुरी संयमनी प्रिये ॥ १४५॥ तदक्षिणे पुरी चान्या राक्षसानां महात्मनाम् । क्राव्यादीति च विख्याता मांसास्थिरक्तपूरिता ॥ १४६ ॥ पुरा ब्रहातनोर्जाता तस्तनुं(या तनुः) रक्षिता विभोः । भोक्तमिच्छोरन्यतमा स रक्षो नाम दिक्पतिः ॥ १४७ ॥ विष्णुना निजितः पूवं पातालतल माविशन् (त्) ।
दत्वा कन्यां विश्रवसे पृलस्त्यतनयाय च ॥ {४८ ॥ मुनिवीर्यत्तित्र (स ?) जातान् पूत्रास्तरीपु(नु)|प | लभ्यच। रावणं कुम्भकर्णं च विभीषणमिति श्रिये ॥ १४९ ॥ ते च करत्वा तपो घोरं प्रसाद्य जगतां पतिम् ।
ब्रह्माणं परमैश्वर्यं बलमायुयंथाक्रमम् ॥ १५० ॥ प्रापबंलाद् विनिजित्य ज्येष्ठं ग्रातरमात्मनः। लङ्कामधिवसद् राजा रावणो लोकरावणः ॥ १५१॥ ब्रहादत्तं पुरीं यक्षेश्वरायैलविलाय च)
या दिग्गतोज्ज्वला मेरोः कान्ते दक्षिणपरचिमा ॥ १५२ ॥ तत्र वासो रक्षसां वै सुकृतो विश्वकर्मणा, विष्णुत्रासाच्च्युतास्तस्मात् स्वगंलोके (नि ?) वसन्ति ते ॥१५३॥ रावणः कृम्भकणंड्च द्वावेतौ हरिकिङ्करो। विष्णुना रामरूपेण निहतौ स्वेन कमणा ॥ १५४॥ पुनजंन्मान्तरे तेन वैरात् स्वपदमागतौ।
र [1 ]क्षसाधिपतिः श्रीमान् रामभक्तो विभीषणः ॥ १५५ ॥ आस्ते लङ्केश्वरः सुष्टु राक्षसेन्द्रगणेवँतः।
सुमेरोः परिचमे भागे वसन्ति वरुणस्य वै॥ १५६ ॥ वारुणीति च विख्याता पुरी सवंगुणंयुता। जलानामधिपौो देवः प्रचेताः पाशधृग् विभुः \ १५७ ॥ शुद्धस्फटिकस _्ाशश्चन्द्रविम्बसमानतः(नः) ।
ततो गन्धवती दिव्या वायवी नगरी शुभे ॥ १५०८ ॥ तत्राधिपो जगत्प्राणः पवनः कद्यपात्मजः।
ततो लङ्का नाम पुरी स्वयं रुद्रेण निमिता ॥ १५६॥
श्रीकृष्णयामलमहातन्तरम्
दत्ता भक्ताय मित्राय कुबेराय महात्मने, लङ्का भातृविरोषेनेत्यलकां वसति यक्षराट् ॥ १६० ॥ यत्र॒ क्ररेयंक्षगणेधेनानामधिपः प्रभुः । पुरा ब्रह्मयवपुः पुत्रः स्वथं खादितुमुद्यतः॥ १६१॥ स॒थक्षस्तत्कले जाता कन्या चेडविडा जुभा। मूनिवीर्यात् तया लब्धः कुबेरो नाम वै सुतः॥ १६२ ॥ तहृक्षिणे महाभागे एेशानी सुद्रवल्लभा। पार्वत्या सहितो यत्र रुद्रौ वसति सवदा ॥ १६३ ॥ इत्यष्टलोकपाला मे कथिता लोकभावनाः । येषा स्मरणमात्रेण दुःखग्रामाद् विमुच्यते ॥ १६४॥ एते तु सप्तवल्लचाद्या लोकपाला महौजसः। यजन्ति मन्त्रतत्त्राभ्यां महेन्द्रममराधिपम् ॥ १६५॥ १ॐ नकिरिन्द्र त्वदुत्तरो न ज्यायां अस्तिवत्रहन् ॥ १६६ ॥ "अतो लक्षद्रय।दूध्वं चन्द्रलोकोऽतिशोभनः। योऽत्रिनेत्रसमुद् भूतः क्षी रोदाणंवसम्भवः ॥ १६७५ \ नक्षत्रमण्डलं सोमादूपरिष्टाद् विलक्षितः । उडमण्डलतः सौम्यः उपरिष्टाद् विलक्ष(क्षि)तः ॥ १६८ ॥ गृरूदारेषु यो जातस्तारायामतिसुन्दरः। यस्मिन् जाते देवगणा बभूवुनिष्प्रभाः क्षणात् ॥ १६६ ॥ द्विलक्षे तु बुधात् काव्यः शम्भुना मिलितः पुरा। लिङ्खद्रारा शुक्ररूपो भूत्वा यः पत्रतां गतः ॥ १७० ॥ शुक्राद् भौमो द्विलक्षे तु स्सुरेज्यो नियुत द्वये । भौमेज्ययोमंध्यभागे वैकुण्ठो भगवान् हरिः ॥ १७१ ॥ लक्षत्रये गुरोः "सौरिः भ्सौरेलंक्षद्रथोपरि । सप्तषेयो ध्रवस्तस्मात् पश्चलक्षे व्यवस्थितः ॥ १७२ ॥
१, छ न किं इन्द्रतवादुक्तरो न क्याह्यारोस्त् वृत्रहन्" इति “क संज्ञक- मातृकायाम् । २. अत्र “ङ"मातृका प्रारभ्यते । ३. तियुत-क । ४, शौरिः-क. । ४. शौरे-क ।
1. चन्दरलोकादारभ्य ध्रवलोकपयन्तं विवरणं किञ्िद्न्तरेण ( भाग, ५।२२।८-१७६।४।२२।१-९ ) इत्यत्र दश्यते ।
द्वितीयोऽध्यायः २१
यः पञ्चहायनो बालः स भातुर्वाक्ि शरादितः। गत्वा मधुवनं विष्णुष्मयजन्मनुनाऽमूना ॥ १७३ ॥ ॐ नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय धीमहि) इमं मन्त्रं प्रजपते बालकाय महौजसे ॥ १७४ ॥ सत्यलोकात् समागत्य पृरिनगर्भो हरिः स्वयम् । अदात्तस्मे निजपदं स्स्व गिना(णा)मुपरि स्थितम् ॥ १७५ ॥ ष्तत्रस्थं पुरुषं साक्षादभ्जितं परमेश्वरम् । विष्ण्वंशमव्ययं शान्तो यजेदेकमना ध्रुवः ॥ १७६ ॥ योऽजितो नम भगवान् निमंथ्य क्षीरनीरधिम् । अपाययत् सुरान् सवनिमृतं दिव्यभोजनम् ॥ १७७ ॥ ध्रवलोके महाभागे स॒ वै वसति *नित्यदा। आध्रुवं स्वगंलोकोश्ऽयं यत ऊध्वं श्यृणु प्रिये ॥ १७८ ॥ महर्लोक; क्षितेरूध्वं मेककोटिप्रमाणतः । यत्र॒ तिष्ठति यज्ञेगो नवराहः स्वयं प्रभुः ॥ १५७६ \ श्वरणीधारणाथं तु स्थापयित्वा स्वकां तनुम् | अतले च हिरण्याक्षं हत्वा देवैः प्रपूजितः ॥ १८० ॥ तस्योपरि हयग्रीवो भगवान् भूतभावनः। “वसेत् कोटिद्रयोध्वं च जनो लोके सुखावहे ॥ १८१ \ सनन्दाद्या महात्मानो ब्रह्मणः प्रतिम्तंयः। यजन्ति ज्ञानयज्ञेन हयशीषं जनादंनम् ॥ १८२॥ ततः; परं तपोलोको भूमेः कोटिचतुष्टये। योजनानां च सुभगे यत्रास्ते स त्रिविक्रमः ॥ १८३ ॥ पुरा यो द।नवेन्द्रस्य ““वाग्धूलेरध्वरं ययौ । श्वृत्वा वै वामनं रूपं धुन्धुमारस्य वै तथा ॥ १८४ ॥ बलेरप्यध्वरं गत्वा त्रिधा कृत्वा निजां तनुम् । पाताले च भुवलेकिं वामनोऽत्र त्रिविक्रमः ॥ १८५॥ तंश्श्नु त्रिविक्रमं देवं तपोलोकनिवासिनः। यजन्ति ज्ञानयज्ञेन तत ऊर्ध्वं च यत् श्चुणु॥ १८६॥
१, मग्रजन्मनुताऽमुना-क. । २. सुधीना-ङ. । ३. तत्रस्थः-ङ. । ४. हित-ङ. । ५, नित्पदा~क. । ६. यमत-डः, । ७, धरि गी-ङ, । ८. वत्से-क. । ९, लोके- क. । १०. वाष्कलेरध्वनं-ङ . । ११. कुत्वा-क.। १२. निज-क. । १३. तु-ड. ।
श्रीकृष्णयामलमह तन्त्रम् उपरिष्टादतः सत्य कोटिरष्टो प्रमाणतः । बरहमालोक इति ख्यातो यत्र ब्रह्मा जगद्गुरुः ॥ १८७ ॥ पतत्र ब्रह्मा पदिनश्गर्भं भगवन्तमधोक्षजम् । नारदादयः परिवृतो यजन्नास्ते महाप्रभुम् ॥ {८८ ॥ बलरामस्तु भगवांस्तदूध्वं वसति स्वयम् । श्वेतो नीलाम्बरधरो यस्यांशो धरणीधरः ॥ १८६ ॥ तमोगुणमयः श्रीमान् महावैकुण्ठदक्षिणे। वैकुण्ठाधरः परिचिमे च कामदेवो रजोगुणः ॥ १९० ५ प्दूरध्वे चोत्तरे पादवऽनिरुद्धो ज्ञानविग्रहः । सत्त्वभूतस्तु पूवंस्यां वासुदेवः सनातनः ॥ ६९५ ॥ सालोक्यसाघ्टिसामीप्यसारूप्याणां चतुष्टयम् । स्थानं क्रमेण कथितं वेकूण्ठभ्भुवनादधः॥ १९२॥ सत्यादुपरि वैकुण्ठो योजनानां प्रमाणतः। भूर्लोकात् परिसंख्यातः कोटिषोडलसम्मितः ॥ १६३ ५ ५ऊर्ध्वोध्विंक्रमतः भ्पयंक् चतुर्णां शच चतुष्टयम् । कोटियोजन^मानं : एकैकस्य वरानने ॥ १६९४ ॥ स्थानं चतुष्कोटि^मितं मध्ये विष्णोः पर् पदम् । ज्योतिमंयं तेजसा च सवंभूतमनोहरम् ॥ १६९५ ॥ परमव्योमनाथस्य विष्णोरतुलतेजसः । वेदाः स्तुवन्ति यं नित्यं परमानन्दविग्रहम् ॥ १६९६ ॥ ॐ तद् विष्णोः परमं पदं ॒सदा पर्यन्त सूरयः । दिवीव चक्षुराततम्. ॥ १६७ ॥ वसन्ति यत्र॒ पुरुषाः सर्वे वैकुण्ठमूतंयः। चतुभुजाः शङ्खचक्रगदाप द्कुजधारिणः ॥ १६८ ॥ सर्वे नीलाम्बुददयामाः सवं नीलाम्बुजक्षणाः । चारुप्रसन्नवदनाः पीतकौशेयवाससः ॥ १६६ ॥ किरीटिनः कुण्डलिनो श्हारिणो वनमालिनः । सवे च ९नृतन (नूत्न)वयसः कन्दपाधिकसुन्दराः ॥ २०० ॥ ए. चतक. (र. गर्भैः-क. 1 ३. तदूर्धे-ड, 1 ४, भवना-क. । ‰° इर््वौचः कऋरमतः-क. । ६. परियक~-क. । ७, तु-ङ. । ८. यानं-ङ. । ९. मयंक, 1 १०. तत्-डः, । ११. द्वारिणो-क. । १२. न्पवयसः-क, ।
ज
1. ऋष्वेद् ( १।२२३।३० ) ।
द्वितीयोऽध्यायः २३
रूपयौवनसम्पन्ना लक्ष्मीरूपा मनोहराः ।
वसन्ति यत्र वै ्देव्यो नानाभूषणभूषिताः ॥ २०१॥ यत्र॒ नैःश्रेयसं नाम स्वनं कामद्धेदरंमैः।
ष्व कुसुभैर्म्राजत् केवल्यमिव मतिमत् ॥ २०२॥ विष्णुदेहो दुवैदिव्यैमुमुक्षुगणसेवितेः | मन्दारकुन्दपुच्नागचम्पकम्बूज^्पाटलेः ॥ २०३ ॥ वकुलैः पारिजातश्च सन्तानैहं रिचन्दनैः । देवब्रजाः “सपत्नीका गायन्ति चरितानि च ॥ २०४॥ मङ्गलानि सुरम्याणि यत्र विष्णोमंहात्मनः। पारावताः सारसाइचव कोकिला हंसबरहिणो ॥ २०५ ॥ गयन्ति श्वैष्णवीं गाथां मुकुन्दप्रतिम्तंयः।
°यन्न गच्छन्ति पापिष्ठाः खलाः पाखण्डिनो जनाः ॥२०६॥ तत्रैव भगवान् साक्षात् श्रिया सह जनादंनः।
“आस्ते विष्णुः स्वयं कर्ता स्वयं हतां स्वय प्रभुः ॥ २०० ॥ वैकृण्ठाख्या पुरी चेयमयोध्या कथ्यते बुधैः ।
विष्णुः स्वयं रामचन्द्रः साक्षात् ब्रह्म सनातनम् ॥ २०८ ॥ सैषा सीता स्वयं लक्ष्मीस्तस्या वेदवती सखी ।
तथ्यं करतुं वचस्तस्याः पथिव्यामवतारिता ॥ २०६ ॥ अयोनिसम्भवा भूमौ लक्ष्मणाख्यो धनुधंरः । अनन्तोऽनन्तमहिमा शङ्कचक्रान्वितो करो ॥ २१० शत्रुष्नो भरतश्चैव हन्मांश्च खगाधिपः । एभिर्नलश्म्बुदश्यामो हरिः शा ज्गंधनुधे रः ॥ २११ द्विधा भूतः किम्पुरुषे हनुमत्प्रीतये “स्वकाम् । स्थापयित्वा तनु विष्णुवंकु'“ण्ठपुरमागतः ॥ २१२ वन्दाश्ष्नाम्न्यसुरी साध्वी विष्णुना रमिता पुरा।
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तुलसीत्वं गता शापात् तेन वृन्दावनं वनम् ॥ २१३ ॥
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१ देन्यै-क. । २. वर-ङ. । ३. सर्वत्र-क, । ४. पाटङिः-ड, । ५, सप्टनीका-ङ. । ६, 'वेष्णवीर्गाथा' इति शोभनः पाठः । ७. यत्र-क. । ८. आंस. 1 ९. चशशङ्खान्वितो-क, । १०. म्बुजश्यामो-क, । ११० स्व- कान्-ङ, । १३. ण्ठ परमागतः-क. १३. नामसुरी-ड. ।
श्रीकृष्णय।मलमहातन्त्रम्
यत्र ष्वैकुण्ठलोके तद् विष्णोः प्रियतरं परम् । तस्योपरिष्टात् कौमार(रो) द्वात्रिंशत् कोटिमानतः ॥२१४॥ श्श्रीराद्धिपद्यमधुपः शिवपुत्रो महायज्ञाः । सेनाध्यक्षो कातिकेयो यत्र॒ब्रह्माण्डरक्षकः। ध्वजस्तस्योपरिष्टात्तत्को टिरेका(कः) प्रमाणतः ॥ २१५ ॥ ब्रह्माण्डभ्माण्डोदरवतितानि 'स्थानानि सर्वाण्यनुबन्धितानि । यच्चेत्“शैतान्यनुचिन्तितानि सस्युस्तस्य वैकुण्ठसुखप्रदानि ॥ २१६ ॥
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॥ इति श्रीकृष्णयासले सह्ातन्त्रै भूव यध्वं लोकवणंनं नाम तृ(द्ि)तीयोऽध्यायः॥२॥
१, बेकुण्ठनत् लोके-क. । २, श्री शा ङ्घिपद्च-ङ, । २. भाण्डोदधववति-क. । ४. “स्थाना ".बन्धितानि' नास्तिक. । ४. सेन्यान्यनु-क. । भत्र यञ्चेत- सेतान्यनुचिन्तितानीति शद्धः पाठः प्रतीयते । ६. सरेतस्य-ड, ।
तृतीयोऽध्यायः
ब्राह्मणी उवाच
अतः परतरं किखित् अस्ति नास्तीति सृव्रतः। स्थानात् स्थानं महाभाग ! तन्मे कथय निरिचतम् ॥ १॥ तथ्यं पथ्यं भवद्वाक्यामृतं श्रुतिरसायनम् । पीत्वा श्रुतिपुटे कान्त ! स्तुप्तिमं नहि जायते ॥ २॥ ब्राहमण उवाच
१ददृशान्यण्डजातानि सेरवराणि भ्वृहन्ति च। *्महानन्तप्रसूतानि लोम्नि लोम्नि स्थितानि च॥३॥ महाविष्णो महाभागे कृष्णांशांशभवस्य च । पुरैवासन् महाविष्णोमुं खेभ्यस्तु सनातनाः ॥ ४॥ आपः कारणभभूतास्तु तासु भवासमकल्पयन् । महास _ङ्कषं णश्च।पि मुखात्तस्य महात्मनः ॥ ५॥ तां शय्यां कल्पयित्वा तु सहस्रवदनो विभुः। प्रसुप्तो भगवांस्तत्र रोषशायी जगद्गुरुः ॥ ६ ॥ "स वै जाग्रत्स्वरूपोऽपि प्रसुप्त इव \"लक्ष्यते । सहखशीर्षा पुरुषः सहखराक्षः सहस्रपात् ॥ ७ ॥ सहस्रबाहुविश्वात्मा सहस्रांशुः स्वयं महान् । कारुण्यजलमध्यस्थो विश्वेशः सवंतोमुखः॥ ८ ॥ स्वंतः पाणिष्प्पादं तु सवंतोऽन्निशिरोधरः। सवतः श्रवणघ्राणः सवंदेवनमस्कृेतः ॥ & ॥ यस्थैकरवासश्स्निश्वासकाले जीवन्ति देवताः । इवासप्रवेराकाले च विनश्यन्ति च ते पूनः ॥ १०॥ बरहा विष्णुमहेगाद्या इन्द्रचन्द्रादयोऽपरे । अचलः सवभूतानां बीजभूतः सनातनः ॥ ११॥
१. वृत्िम॑म नहि-ङ, । २, ईदशान्यस्च-क,» देशा नान्यण्ड-ड, । ३. बहन्ति-ड. । ४, महाखन्त-क. । ५, शचुतास्ता-क, । ६. वांस-क. । ५. णस्यापि-ड.। ८. तं सोन्याङ्क करप-ड. । ९, सवंजाग्र-ड, । १०, कचयसे-क, । ११. पाद्स्तु--ड, । १२. बिश्रामकाङे-डः* ।
श्रीकृष्णयामलमहातन्तर
पुरुषः स्युरुषे नित्यमि (मी) डते ज्ञानदष्टिभिः ।
एष कारुण्यर्जलधावर्धोन्मीलितलोचनः ॥ १२ ॥ स्वधिारब्रहमशिलारूढो योगीश्वरेश्वरः । तपश्चरति वै ध्यायन् गोविन्दचरणाम्बुजम् ॥ १३ ॥ वामपादवंगता तस्य राधिकादेहसम्भवा। महालक्ष्मी भ्रत्नदण्डं व्यजनं परिगृह्य वै॥ १४॥ वी जयन्ती परिचरे ष्दर्घन्मीलितलोचना । ध्यायमानस्य गोविन्दं लोमहर्षो “व्यजायत ॥ १५॥ पप्रतिलोम्न्यभवंस्तत्र ब्रह्माण्डान्यन्तराणि वै। “कृपावलोकिनीं राधां सवंभूतमहेश्वरीम् ॥ १६॥ «चिन्तमानस्य नेत्रान्तादश्रूधारा व्यजायत । यमुना वामतो जाता गङ्धा दक्षिणनेत्रतः॥ १७ ॥ गोमती मध्यमात् नेत्रात् कारुण्यजलधि च ताः | "पुनत्यः प्रविशन्तीव तमःसत्वरजोमयाः ॥ १८ ॥ कृष्णञ्ञुकेल रक्तवर्णः ‹"कोटीन्दुसदृशप्रभाः । ९प्रतिववत्रं जगज्ज्यो (यो )नेः स्थूलरूपस्य विश्चततः । १६ ॥
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॥ ९१ति श्रीकृष्णयामले महातन्तर गुणातीतकारणजलराशि- परमव्योमनाथमहापुरुषलोक्वणेनं नाम
चतुर्थो(त॒तीयो)ऽध्यायः ॥ ३ ॥
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१. पुरुषे नित्यमिति" "इष्टिभिः-ङ. । २. जलूधारवर्षोन्मी ~क. । ३. रत्र दृण्डं-क, । ४, दृध्वोन्मी-ङ. । ५. व्यजायते-क. । 8, इति रूोम्न्यभवांस्तेन- क. । ७, कृपावतो फणी राधां-ङ. । ८, चिन्त्यमानस्य-ड. । ९. पुनन्तः-ड. \ १०. कोटीन्द्रसदश-ङ, । ११. प्रतिचक्र-क, । १२. 'इति"“"ऽध्यायः-नारित क. ।
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चतुर्थोऽध्यायः
ब्राह्मण उवाच
तत॒ ऊर्ध्वं महादेव्या लोको भुवनपावनः। चतुःषष्टिकोटिमितौो योजनानां च सवंतः।। १॥ भैरवाणां भैरवबीणां सिद्धानां सिद्धधोगिनाम् । प्रमथानां मातुकाणां सुन्दरीणां वरानने।।२॥। वसति तत्र॒ वसति श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी । चक्र रेखात्रययुते वेदद्रारो पशोभिते ।। ३ ॥ त्रिव॒त्तं षोडशदले तथाष्टदलकणिके । ्शक्रकोणयुते तद्वद् द्विदशारथ्युते श्रिये ॥ ४॥ अष्टकोणे त्रिकोणान्तजिन्दुयुक्ते महाप्रभे । अत्र सा परमेशानी सवंदेवनमस्करृता। ५॥) कोटिकोरिव्रह्य विष्णुिवादि शीषे भूषणं: | नीलरत्नादिभिनित्यं “निधतचरणाम्बुजा । ६ ॥ पुरा व्त्रिभङ्धपुरतः कष्णस्याऽव्यक्तजन्मनः । अनादिनिधनस्याऽपि जातेयं त्रिपुरातनी ।। ७ ॥ स्वयं कृष्णस्वरूपा च॒ कृष्णाज्ञावशवतिनी । “चतुभुजा रक्तवर्णा रक्ताभरणभूषिता ।॥ ८ ॥ पाशाड्कुलधनुर्बाणान् विभ्रती ^ सिद्धवन्दिता । ्टक्लवर्णा त्वियं वाणी पीता वै भुवनेश्वरी ॥ ९ ॥ रक्तवर्णा यदा देवी श्ध्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी। श्यामवर्णा कालिकेयं कृष्णा नीलसरस्वती ॥ १० ॥ ुर्गाख्या या पराशक्तिः साक्षात्कृष्णस्वरूपिणी । विपरीतरतौ राधाङ्कृष्णयो रसरूपिणोः ॥ ११॥
१, शच्रकोणयुते तच्छद्भीपर्दशार-ड. । २. युति-क. । ३* तत्र-क, । ४, शेषश्रषणेः-ड. । ४. निघु(द)ष्ट-ङ. । ६. तिभङ्-ङः. । ७. जायतेयं-क. । ८. चतु्रछा-क, । ९, बाणं -क, । १०. सिद्धयोगिनी-क. । ११. शक्र वर्णा-क, । १२. वापि-क. । १३. स्वयं त्रिषु-क. ।
२८ श्रीकृष्णयामल महातन्त्रम
'्जाता वै(वे)तौ महात्मानौ दुर्गारामौ जगत्प्रभुः(भू) । ष्या दुर्गा संव गोविन्दो राधा भ्सङ्कुषंणः पुमान् ।। १२॥ भराधया निमिताभवेतावाद्यावाद्यरसेन च ।
ष्तं समाकृष्य सा देवी महाविष्णृदरान्तरे ।। १३॥ प्रवेशयामास नित्या सुष्ठ्वथं “जगतां पुरा।
तस्य नाभिगतः श्रीमान् कण्डलित्वं “समाश्रितः ॥ १४ ।। सहस्रवदनो भूत्वा मूुखरन्ध्राद् विनिगंतः। विभति स महाविष्णुत्रह्याण्डान्यखिलानि च ।। १५॥। प्रसूते सकलं विद्व प्रलये संहरत्यसौ ।
तस्य मध्यफणाचक्रं पूवंगे चक्रमृत्तमम्॥ १६॥ गौरीपुरमिति ख्यातं यत्र तिष्ठति सा शिवा।
या दुर्गा साऽपि लोकेऽस्मिन् «स्थित्वा त्रिपुरसुन्दरी ।। १७ ॥ स्थिति सुष्टि विनाश च कुरुते सहितेश्वरा। ९'तस्योध्वं च प्रदेशे नु सवंदेवस्वरूपिणी।। १८॥। ९९ [ समूद्रमथने पूवं य धृत्वा पुरुषोत्तमः।
तं रूपं विभ्रती राधा जगदानन्दकारिणी ॥ १६॥ दर्गादिसवंशक्तीभिरावृता परमेश्वरी । षटकोणोपरिबिन्दुस्था तह्(द)ष्टदलचिद्भिता ॥ २० ॥ चतु्द्रारयुते स्थाने चतुक्लंच (रस) विराजिते ।
तोरणोदातपत्रादिचामरध्वजचिद्धिते | २१॥ चन्द्रातपयुते रत्नवेदिकोपरिमण्डपे । सदाशिवमहाप्रर्तासहासनवि राज(जि)ते | २२॥ रत्नप्राकारपरिरवादुग्धाम्बुधिविराजिते | पुष्यत्कदम्बविपिने सदामोदितदिङमुषवे । २३॥
१, याता-ङ. । २. "या'नास्ति-क. । २. शङ्करपुमान्-क. । ४. राधा- क. । ५. वेद्या वाये नाद्चरसेन-क. । ६. तमसाऽऽद्ृष्य-ङः, । ७. भजतां-डः, । ८. समास्थितः-ड, । ९. पूध्वगे-ङ. । १०. स्थिरा त्रिभुवनेश्वरी-ङ, । ११. “तस्योध्व” इत्यारभ्य (भानुव्वमागतः' इति ३९ संख्यकश्छोकपर्यन्तं पाटो नाद्ति-ड, । १२. "समुद्रमथने "“"भानुत्वमागतः' इति कोष्टस्थः पाटः प्रतीयते. $ऽनावश्यकः ।
चतुर्थोऽध्यायः २६
कल्पवृक्षवनाकीणं वटचछायासुशोभिते । चक्रराजे महादेवी राधिका परमेश्वरी ॥२४॥ षट्कोणे आातरस्तत्र सेवातत्परमानस(1);। अष्टपत्रैऽप्यष्टगोपी या कृष्णप्राणवल्लभा।। २५॥ सुदामाद्या द्वारदेशे (च?) प्रान्ते गोपी स्थिता पुनः । सवंशास्त्रैषु तन्त्रेषु गोपिता गोपवासिनी । २६॥ रहस्यं तस्य॒ वक्ष्यामि श्यणु देवि वरानने। मथने जलधेः पूर्वं मोहिता देवतागणा: ॥ २७ ॥ यक्षराक्षसगन्वरवां असुरोरगभूमिजाः । ज्ञानहीने ततस्तस्मिन् मोहिनी विष्णुरूपिणी ॥ २८ ॥ विष्णुड्च भगवान् तत्र॒ रसरूपे निमज्जतुः । मनसैवं च कृतवान् दधिदुग्बसमन्विते ॥ २६ ॥ देशे गोगोपगोपीभिः सेविते गिरिकन्धरे।
कदम्बवरवक्षादिचिल्धिते तटिनीतटे ॥ ३० ॥ एकोऽहं च द्विधा भूत्वा क्रीडितन्यं स्थलान्तरे ।
सवं देवार्च देव्यर्च सुरभ्धादिरच गोत्रजा: ॥ ३१॥ जायन्तां च भूमौ शीघ्रमिति तन्मनव(सि) स्थितम् । चिरं तप्त्वा तपदचात्र गिरिराजो हिमालयः ॥ ३२॥ सहितो मेऽनया शोकान् बुक (ष)भानुत्व मागतः ।
पुरा गौरीति या कन्या हरवेनुप्रतिश्रुता ॥ ३३॥ नारदस्य महर्षेस्तु हरिता सा यतः पृनः। सखीभिवंनमध्ये तु शिवं सा मनसा गता॥ ३४॥ ततः प्रभृति तस्यैव पवंतस्य महात्मनः। कन्थैका विष्णवे देया ततौ यास्याम्यहं भुवि ॥ ३५॥ विष्णुमायां ततो ध्यात्वा तपस्तेपे सुदुष्करम् ।
ततः प्रसन्ना सा देवी मोहिनी विष्णुरूपिणौ ।। ३६ ॥ उवाच सुचिरं प्रीता कन्यात्वं तव॒ यास्यति। पृथिव्यां जातस्य भवने बुक्(ष)भान्वाह्वयस्य ते ॥ ३७ ॥ इयं या मोहिनीशक्तिः राधिकात्वं प्रयास्यति। विष्णवे वासुदेवाय तां दत्वा सुकृती भव ॥ ३८ ॥
श्रीकृष्णयामलमहातन्त्रम्
ततोऽप्यन्तद्धिमा (हिता) देवी सोऽपि स्यति (चोऽद्वि) सत्तमः । योगेन पथ्व्यामगमद् व्क(ष)भानुत्वमागतः| ॥ ३९ ॥ गौरीष्लोकपुरस्तात् स्तु योगिनीगणवेष्टिता। तिष्ठत्यखिलभूतानां जननी भ्सक्लेश्चरी ॥ ४० ॥ कदाचित् जलदश्यामा कदाचित् कनकप्रभा । चतुभुजा शङ्कचक्रगलमुदगरभ्धारिणी ॥ ४१॥ तत्समीपे महादेवी कालिका कालरूपिणी । चक्रस्य दक्षिणे भगे श्रीमन्नीलसरस्वती ॥ ४२॥ “उग्राय (प)त्तारकारत्वात् साप्थु्रतारेति कौतिता । सा श्चैवैकजटा देवी सा च नीलाम्बुदप्रभा॥ ४३॥ सा वै नीलश्पताका च नानारूपा महोदया । “सैवात्र त्रिपुरा ख्यातो(ता) सैवेयं भुवनेश्वरी ॥ ४४॥ शुक्लवर्णा च या देवी परिचमस्यां दिशि स्थिता । शुदधसत्त्वमयी नित्या ब्रह्मवाग्वादिनी परा ॥ ४५॥ भ्गौरवर्णां च या देवी क्षीरोदमथनोत्थिता।
सैव दक्षिणदिग्भागे श्रीः श्रीविष्णोःप्रिया परा ॥ ४३ ॥ श््पीतवर्णा च या देवी श्रीमत्त्रिभुवनेश्चरी । ९कदा मुक्ति ददासीति विष्णुना कथिता यदा ॥ ४७ तदा श्रद्धा भगवती शीषं चिच्छेद सा स्वकम् । कम्पयामास देवस्य परिवारान् सुविस्मितान् ॥ ४८॥ करे गृहीत्वा मुण्डं स्वं रक्ता रक्तकलेवरा। तुष्टाव वाभ्भिरिष्टाभिर्गोविन्दं पुरुषोत्तमम् ॥ ४९ ॥ जगतां जननी नित्या सवंषामी^श्श्वरी सदा । जयदेव महेशान कथमेवं त्वयोच्यते ॥ ५०. ॥
१. पुरः-क. । २. सा-ड. । ३, राधिका सती-क. । ४. धारिका-क. । ५. तन्रापत्तारिकात्वात् साऽप्युग्रभावेति-ङ, । ६. तरैवेक-क, । ७, पताकी- क, । ८, भसेवान्र""""ुवनेश्वरी' नास्ति-ङ, । ९. धगौरवर्गा""“प्रिखा पराः नास्ति-ङ, । १०, भ्पीतवर्णा -"“"भुवनेश्चरी' नास्ति-क. । ११. कदापि सक्तिदासौति प्रोवाचोद्धाय(ध्चेयं)दा हरिः-ङ. । १२. रुषा-ङ, । १३. आरं -क, ।
| || 4
{8 |, | 12 |) | ॥
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8 |¦ 18 | ॥
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चतुर्थोऽध्यायः २१
ततस्तामाह भगवान् भ्लज्जातोयधिमन्जितः। मातर्मातः प्रसीद त्वं मातर्मातः क्षमस्व माम् ॥५१॥ सदा मोक्षप्रदाऽसिं त्वं सिद्धासि मृवनेश्वरी। ये त्वदीयपदाम्भोजमकरन्दविनोदिनः ॥ ५२ ॥ तेभ्यः सदाऽद्यप्रभृतिभो गस्वर्गापवगंदा । भव देवी महेशानि वत्य सत्य न संशयः ॥ ५३॥ इत्युक्त्वा भगवान् कृष्णः स्कन्धे तच्छिर मुू(उ)त्तमम् । कोमलेन करेणेव करुणावरुणालयः । सुविन्यस्य चकारैनां यथैव भ्पूवंसंस्थिताम् ॥ ५४॥ तदवधि विधिविष्ण्वीशानदेवेन्द्रमौलि- स्फुरदमलकिरीटाराध्यपादारविन्दा । त्रिभुवनजननीयं बुदढसत्वा प्रशस्ता प्रविलसितसमस्ता गीयते छिन्नमस्ता ॥ ५५ ॥ यस्या एव "पदाम्भोजममन्दानन्दमानसाः। मुनयः साधुभ*सन्धानां निवत्त प्रापुरुत्तम [7 |म् ॥ ५६॥ वदन्ति देवताः सर्वाः श्प्रणथाविष्टचेतसः । सत्यं सत्यप्रदां शश्वद् भुक्तिमुक्तिप्रदां हिश्ताम् ॥ ५७ ॥ “उत्तरे चक्रराजस्य योगिनीगणवेष्टिता। डाकिनीलाकिनीभ्यां च सेविता सिद्धियोगिनी ॥ ५८ ॥
॥ इति श्रीकृष्णयामने महातन्त्रे “गौरीलोकवणंनं नाम | चतुर्थोऽध्यायः | ॥ ४॥
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१, स्वभ्जितोदधिमुभ्जितः-ङः. । २. श्वरि-डः. । ३. पूववत् स्थिताम्-ङ. । ४. पदाम्भोजामन्दा-ङड, । ५ सङ्खानां-ड. । ९. प्रख्या-ङ. 1 ७, याम्-ङ.। ८. “उन्तरे"“* सिद्धयो भिनी ' इस्यस्य स्थाने “उत्तरे चक्रर।जस्य सुस्थिता शिव- रूपिणी । राधिकां मोक्ञदां हृष्टा सदोपासन्ति यगिोनी ) डाकिनी-लाकिनीभ्यां च सेचिता सिद्धयोगिनी ॥" इति-क. । ९. *गौरीलोकवणंनं' इत्यस्य स्थाने *गौरीलोकवर्णने श्रीङ्कष्णचन्द्रप्राणस्वरूपिणीश्रीमतीराधादेव्य(ः परमपद्- चक्रराजकथनं' इति-क. 1
पञ्चमोऽध्यायः
नारद उवाच
एवमेवं समाकण्यं ब्राह्मणी ब्रह्मवित्तमा।
प्रणयाविष्टचित्तेन पुनः पप्रच्छ सादरम् ॥१॥
ब्राहमणी उवच
अतः परोऽस्ति को लोकः कथ्यतां तथ्यभ्माषितम् ।
पथ्य समस्तलोकानां शोकपहरण प्रिय ॥२॥
ब्राह्मण उवाच
गौरी लोकः प्रिये प्रोक्तः शिवलोकं भ्युणु प्रिये ।
तन्मध्ये बिन्दुचक्रं च बिन्दुष्गभंः सदाशिवः॥२३॥
लिङ्खरूपी कृष्णलि*ङ्गालिगंतो भगवान् पुरा ।
आत्मानमतिकामतिं राधाविरहबाधया ॥ ४ ॥
महालिङ्खमूज्जहार स्वकोयं रभसा प्रभुः।
चिक्षेप च पुनलिङ्धमभवत् तस्य धौमतः॥५॥
पुनस्तटरत् समुद्धृत्य चिक्षेप च जगद्गुरुः ।
एवं यत् पश्वधालिङ्खं क्षिप्तवान् परमेश्वरः ॥ ६ ॥
अविनष्टं स्वलिङ्खंतु ष्ट्वा तद् विरराम वै।
तिल खं पच्चधा तस्य व्याप्तं लोक महाप्रभम् ॥ ७ ॥
ज्योतिमं यवपूर्मात्रिमनन्तोध्वाधि एवं च।
स कदाचिल्निर।कारः साकारङ्च क्वचिद् भवेत् ॥ ८ ॥
साकारः पश्चवदनो दशबाहुस्तिशूलधुक् ।
व्याघ्रचमंधरो “नित्यं त्रिनेत्रः स्फाटिकप्रभः॥ € ॥.
सक्ष्मं॑लिङ्खं पच्रूपं प्भूतमयं शिवम् ।
पञ्चधा तन्महादेवी सेवते पश्चमी परा॥१०॥
वधंमानं पतु तद् हष्ट्वा देवी त्रिपुरसुन्दरी ।
ध्योनिभूता “"पराशक्तिलिङ्खम(वृत्य शोभना॥ ११॥
१, श्ूषितम्-ड, । २. रोकं-ङ. । ३. श्रणुष्व मे-ड. । ४. गतेः-क, । ५, क्ालिङ्गतो-ङ्. । ६. महीकि-क, । ७. वपुमन्निमनन्तोद्धबोऽध-क, । ८, भनिस्यं' नास्ति-क, । ९, मोलिश्रुत।-ड. १०, पराशक्तेलिङ्ग.नावृल-ङ्, ।
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पच्चमोऽध्यायः ३३
आनन्दरूपा सा नित्या ब्रह्यज्योतिःस्वरूपिणी । > एवं भावं गता सिद्धा ज्ञानविज्ञानरूपिणी ॥ १२॥ पप्रक्ृत्यात्मकं लद्धं भावाभावविवजितम् । तद् ब्रह्य परमं सूक्ष्म परमानन्दकन्दलम् ॥ १२३॥ निविकारं निराकारं दगेमं सवंयोगिनाम्। दुदंशं दुलेभं योगिध्येयं सवंनमस्कृतम् ॥ १४॥ यं सिद्धाः परमं ज्योतिवंदान्ताथे विशारदाः । केचित् पुरुषमित्याहुः प्रकृति चापरे जनाः॥ १५॥ केचित् शैवा [:] शिवं चैव विष्णुं चैव तथा परे। जगत्कारणमेके वै शब्दयोनि तथेव च॥ १६॥ धमेमेके ज्ञानमेके वदन्त्यन्ये ध्परं पदम्| तट्लिङ्घमध्ये भयो बिन्दुस्तं कामं विद्धि भाविनी ॥ १७ ॥ विराडदेहो महा विष्णुर्जातो ब्रह्माण्डकोटिधुक् । तेनैव सकलं ५सुष्टमित्याहुब्रंहयवादिनः ॥ १८ ॥ ष्गृह्यमेतत् प्रवक्ष्यामि सवंलोकहितं परम् । असुरैनिजिते देवे मायारूपो जगत्प्रभो (भुः) ॥ १९ \ विभूतिधृग् जटाधारी अस्ति (स्थि)मालाविभूषणः। संहाररूपी पाखण्डेरावतो भूतरूपिभिः॥ २०॥ शीघ्रं वरं ददात्येव परिणामे च नाश्कम्। वरलोभाचस्च दैतेया लिवसेवां प्रचक्रिरे ॥२१॥ तदैव विष्णुना शीघ्रं तस्य नाशं करोत्यसौ । न नाशो वैष्णवस्येति मत्वा शिवं पुराऽसृजन् ॥ २२॥ देव्यमध्येऽपि ये नित्यं विष्णुभक्ताः पुरातनाः। अद्यापि तेषां संस्थानं विद्यते सृष्टिमण्डले॥ २३॥ शिवसेवापरो लोकः क्षणं सुखमवाप्स्यति। परचाच्च दुःखजलघौ सम्लेन निमज्जति ॥ २४ ॥
१. एकमभावं-डः. 1 २. गुरोः गिरं चेवं-ङ. । ३. परस्परम्-क, । ४, ऽधो विन्दुर्स्व-क. । ५. विश्वमि-क,. । ६. गुह्यमेलदित्य।रभ् ३९ संर्यकश्ोक- पयन्तं पाठो नारित-ख, इ, ।
श्चीय]० ३
श्रीकृष्णयामलमहातन्त्रम्
धमंलोपप्रवत्तव शिव एव प्रगीयते । कलिकाले विशेषेण ईिवभक्तिपरा नराः॥२५॥ महानरकयात्राथं विष्णुं निन्दन्ति दुजंनाः। विष्णु्स्थानं कलौ गुप्तं भविष्यति न संशयः ॥ २६॥ केशवेन कृता काशी दत्ता तस्मे शिवाय च। तन्नाम्नैव सुविख्याता काशी मुक्तिप्रिय। सखी ॥ २७॥ शिवस्थानेऽतिपाखण्डास्तत्र यास्यन्ति वासतः। नित्यं पापरतास्तत्र नरके यान्ति दुःखिताः ॥ २८॥ कायवाङ्मानसैर्लकाः पापमेवाचरन्ति वै) काइयां कृतं च यत्पापं गिरितुल्यं भवेत् प्रिये ॥ २९ ॥ सवं नाशाय लोकानां नरकाय न संश्यः। काशीवासे मनो याति कथितं तव भामिनि॥३०\ मरणे मूक्तिदा काशी केशवेन विनिमिता। कलौ च मुक्तिनाशाय पाखण्डिभिः समावृता ॥ ३१॥ यत्र कुत्रापि संस्थाय नीत्वा च सकलाः समाः । अन्तकाले चिता काशी पीयूषेण समावृता ॥ ३२॥ भोगाल्लोभाद् रागतो वा मध्ये वयसि संधिताः । नरकाय तदा काशी न विमुक्तिभंवेत् पुनः॥३३॥ पुण्यात्मनां यथा मुक्तियंथा पापोपजीविनाम् | नरकोऽपि भवत्येवं विषतुल्या रमृता ततः ॥ ३४ ॥ न मूक्तिः कलिकाले तु नृणां भवति भाविनि तदथंमेव लोकानां काश्यां वासो भविष्यति ॥ ३५॥ नित्यं पापरता लोका यतो यास्यन्ति तयुगे । काशीपापकृतां मृक्तर्नास्ति कत्पश्चतेरपि ॥ ३६ ॥ शिवोऽपि लोकनाशाय ताहशं रूपमाश्रितः । नाश्षं करोति लोकानां सेवकानाभ्मपि ध्रुवम् ॥ ३७ ॥
१. अच्र “ग मातृक! पुनश्चारभ्यते । २. सखि-ग, । ३, भाविनि-क, । ४, न चिमूक्तिभेवेव पुनः-क, । ५, मधि-क, ।
पञ्चमोऽध्यायः ३५
संहारशरूपी यस्मात् यः संहारे सवंदा रुचिः । ीघ्रं वै लोकयात्रा्थं वरं दत्त्वा विनद्यति ॥ ३८ ॥ देवप्रतारिता लोकाड्चोदिता विश्णुमायया । नाशाय मृक्तिमार्गाणां पाखण्डित्वं ब्रजन्ति वै॥ ३९॥
॥ इति श्रीकृष्णयामले महातन्त्रे शिवलोककथने का्ीमाहात्म्यपाखण्डिकथनं नाम पच्चमोऽध्यायः ॥ ५॥
१. “ज्ञि व्रलोक*““"पञ्चमोऽयायः' इत्यस्य स्थाने 'सदाशशचिवलोककथनम्' इति-ङ, । -
षष्ठोऽध्यायः
= १२ किक ~ =-= हदः
बराह्मण उवाच
अधो वृन्दावनादूध्वं शिवलोकस्य सुन्दरि) श्विरजाख्यमहानदयाः पारे परमस्शोभने॥ १॥ परं ज्योतिमंयं स्थानमगम्यं मनसामपि। अनेकसूयं श्चन्दरक्ष प्रभया सहसमु(समम)द्भुतम् ॥ २॥ दृदंशं दुलेभं दिव्यं निराभासं निरञ्जनम् । निविकारं निरालम्बं निराकारं *निरु्तरम्॥३॥ नित्यानन्दं नित्यशुद्धं “निदिचतं निविशेषणम् । ध्निःसीमं निमंलं नित्यं निःश्रेयसमनामयम् ॥ ४॥ सर्वाकारं सवंरूपं सवंतोऽक्षिरिरोमुवम् । सवंगं सवं विश्रान्तं नितान्तं योगिनांत्रियम् ॥ ५॥ एकमेवादयं ब्रह्य आकाश्चवदनन्तकम् । वदन्ति वेदविच्छेष्ठा वेदान्तवेदिनोऽपरे ॥ ६॥ सवंव्यापिसदाद्यन्तरहितं सत्यम्जितम् । सच््चिदानन्दमद्रेतं ““ब्रह्मानन्दरच निष्कलम् ॥ ७ ॥ वदन्त्यग्ये ज्ञानविदः स्वंज्ञं कारणं परम्| तत्तत्ववेदिनः सिद्धाः कृष्णाऽभिन्नं वदन्ति तत् ॥ ८ ॥ केचिद् वदन्ति गोविन्दपादङ्गुष्ठनखातपम् । ज्योतिमं यश री रात्मज्योतिरित्यश््परे विदुः ॥ & ॥ ब्रह्यज्योतिमंयं कृष्णं कृष्णज्योतिरिदं परम् । केचिद् वदन्त्यथाऽन्यो^ऽन्यमभेदं कृष्णब्रह्मणोः ॥ १० ॥ सूये सूर्य्याशुनिचये यथा भेदो न विद्यते । परब्रह्मणि गोविन्दे ब्रह्मण्यपि तथैव च ॥ ११॥
१. विरजाख्याम-क. । २, शोभना-ग. । ३. चन्द्राकप्रभसहसमद्धतम्-ग,, चन्द्राकप्रभा सदश्मद्धतम्-ङ, । ४. निरन्तरम्-क. ग. । ५. चिज्िष्टं -ङ, । ६. निरन्तं-ङ. । ७. नेैःप्रेथस-ङ्. । ठ, ब्रह्मेष्याकाश ्रदनान्त कम्-क, । ९. सद्ाऽसव्यर-क. सद् व्यन्त-ल. । १०. ब्रह्मानन्तश्च-क. ग. । ११. पर~क, ग, । १२. ऽन्यं ह्यभेदं- ङः, ।
षष्ठोऽध्यायः ३७
प्रकृतिः सा परा सूक्ष्मा व्यक्ताव्यक्ता सनातनी । मृक्तानां च गतिः सैव योगिनां च तपस्विनाम् ॥ १२॥ ` सवेमृक्तिप्रसङ्धं च महा प्रलयसंज्ञके । प्रविशन्ति परब्रह्मतेजो ब्रह्मजगत्पतेः ॥ १३ ॥ सृष्टिकाले च तस्माद् वै जगन्ति प्रभवन्ति च। य द्भयाद् वान्ति वाताइच सूयं स्तपति च्य द्ूयात् ॥ १४ ॥ वषंतीन्द्रो दहत्यग्ति्मारं वहति मेदिनी । कालः कलयते लोकान् निमेषात्मा स्वयं प्रभुः॥ १५॥ कूर्मो विभति धरणीं ब्रह्मा सृजति यद्भयात् । पालनं कुरुते विष्णुहुरः संहरते भयात् ॥ १९६ ॥ तदेव भ्निष्कलं ब्रह्य निरीहं निगुंणं यरम् । कृष्णपादाट् विनिगंत्य व्याप्तं तेन जगत्त्रयम् ॥ १७ ॥ अनन्तकोटिव्रह्मा*ण्डभाण्डान्तबेहिरेव तत् । पुप्रकृत्यात्मकं लिङ्गं तस्माज्जातं परापरम् ॥ १८॥ तदेतत् पुरुषर्चायं कारणं {जलमेव तत् । *महानन्ततदेवेदं तद् वै “विष्णुः सनातनम् ॥ १६ ॥ तद् ब्रह्मा तच्च ^रुद्ररच तदिन्द्रो व रुणइच ^“ तत् । वह्यं मच रक्षश्व॒ वाधूयक्षाधिपस्तथा ॥ २० ॥ ९“एकं ब्रह्माऽद्वितीयं तन्नान्यदस्तीति किचन । यतो वाचो निवतेन्ते द्यपराप्यमनसा सह ॥२१॥ तत्स्वगंस्तच्च मर्त्यो वैतत् पातालं च भामिनि। द्रीपवषं समुद्रान्तं स्वं ब्रह्मात्मकं श्रिये ॥२२॥
॥ इति श्रीकृष्णयामले महातन्त्रे ज्योतित्रंह्यलोक- वणंनं नाम षष्टोऽध्यायः ॥ ६ ॥
यिः क~ क कनक
क~ -- = ~ ~ -- -~ --~--- ~~~
१. ‹ऽग्यक्छा' नास्ति-क. । २. तद्धयात्-ग. । ३. भावे-ङ. । ४. निभ्फल- क. । ५. ण्डम।दान्त-ग., ण्ड्रह्माण्डाद्-डः. । ३. मल-ङः. । ७. महानं वस्तुदेवेदं-क., ब्रह्मा नन्दस्तवेदं ~ग. ! ८. पिष्युं-रु. ग. । ९. रुद्रं च-ङ, । १०. यत्-क. ण. 1 ११, एवं-क. ग. । १२. "नाम षष्ठोऽध्यायः' नास्ति-ङ.।
सप्तमोऽध्यायः
ब्राह्मण उवाच एतत् पद परं सूक्ष्मं प्रविशन्ति मुमृक्षवः। अस्मात् परतरं कान्ते ! कान्तं सर्वोत्तमोत्तमम् ॥ १॥ श्रीमद्रन्दावनाख्य चं सवं भूतमनोहरम् । तत्पुर ब्रह्मधटितं प्रमानन्दरसान्वितम् ॥ २॥ अनन्तयोजनायाममनन्तयोजनोच्छितम् योजनानन्तविस्तारं सवंरत्नमयं शुभम् ॥ ३॥ सुवणंरत्नमाणिक्यमणिनिमितमन्दिरम् अ्रमरेर्नादितं स्सृष्ट् कल्पवृक्षतलेऽमले ॥ ४॥ सुवणंवेदिकाभिश्च शोभितं सुमनोहरम् । परिरवाभिरनन्ताभी रत्ननिमितभित्तिभिः ॥ ५॥ नदीभिरमृतोदाभिनं देशच परिशोभितम् । गोवधं नाद्यं गिरिभी रत्नधातुविचित्रितैः ॥ ६ ॥ कल्पवुक्षादिभिवृक्षमंणिमाणिक्यव्षिभिः सुशीलाचेधेनुवृन्देः शोभितं तद् वनं महत् ॥ ७ ॥ सुशीला सुरभिश्चैव दयामली भ्धवली तथा। पिशङ्खाक्षी च कपिला दीघंघोणा ज्ुचिरसिमिता॥८॥ मदालसा मन्दगतिवैन्दा गोविन्दवल्लभा। धूमला पिद्धला गद्धा पिशङ्धी मणिकस्तनी॥ € ॥ हसी वशी त्रिया नित्या नैचिकीगणपूजिता। कृष्णत्रियाद्या गावस्ता लक्षसंख्याः सुशोभनाः ॥ १० ॥ पद्मष्गन्धपिशङद्खाख्यौ वलीवर्दावतिप्रियौ । प्रतिलोम्नि च ब्रह्माण्डं धारयन्त्यो रसप्रदाः॥ ११॥ राजन्ते बहवो यत्र॒ गोविन्दप्रतिम्तंयः। गोपालास्तस्य देवस्य दक्षिणाङ्कद्विनिगंताः ॥ १२॥
१, वारितं-क., वांसितं-ग, । २. सुश्र-ग. । ३. धरणी. । ४. गन्धा-ङ. ग. । ५. अन्न 'ग'मातृका पुनश्च खण्डिता ।
सप्तमोऽध्यायः ३६
बहिबहुकृतोत्तंसाः को टिचन्द्रनिभाननाः। ष्महाध्यं (घं )रत्नघटितस्फुरन्मकर कुण्डलाः ॥ १२ ॥ कम्बृग्रोवा महात्मानः भ्सुदन्ताः सुन्द्रधिराः । जितक।मधनुड्चारुश्रूलताः कमलेक्षणा: ॥ १४ ॥ माणिक्यभ्मुकु रोदृण्डगण्डमण्डल मण्डिताः रत्नालङ्कारसंशोभि कण्ठदेशा भिसुन्दराः ॥ १५ ॥ मक्ताहारलतोपेतपीनवक्षःस्थलध्ियः । वनमालावैजयन्तीमालाभ्यां च विराजिताः ॥ १६॥ हेमाङ्गदल५सद्धस्तारचारुकङ्कणपाणयः । रत्नदण्डधराइचारूपीतकौशेयवाससः ॥ १७ ॥ केचिच्छ्धं भ्वादयन्तो वेणुवाद्यरताश्च के । मुरलीवाद्यनिरताः श्खवाद्यरतारच के ॥ १८ ॥ केचिन्नुत्यन्ति गायन्तो हसन्तो हासयन्ति च। धावन्तो धावतः केचित् प्रतिगजंन्ति गजंतः ॥ १६ ॥ °कष्णे नुत्यति नृत्यन्ति गायन्ति गायतोऽपर । प्रशं सन्ति “वादयन्तो वादकांडच तथाऽपरान् ॥ २० ॥ नृत्यमानेषु सर्वेषु वचवेणुना स्वरसम्पदा। स्वयं बहूविषो भूत्वा सुस्वरं गायति प्रभुः ॥ २१॥ प्रनाल^"बहुंस्तबकखरग्धातुकृतभूषणः । कृष्णो नीलाप्म्बुददयामः पीतवस्त्रो ऽम्बजक्षणः ॥ २२ ॥ ष्शम्रामणोलङ्घ्यनोतक्षेपप्रस्फोटनविकषंणः | क्वचित् शस्यन्दोलिकाभिइच क्वचिद् भूपतिचेष्टया ॥२३॥ क्वचिच्च दर्ुरप्लावैः कवचिन्मृगखगेहयाः(या) । क्रोडाभिविविधाभिद्व विविधैरूप^्वहासकैः ॥ २४ ॥ एको देवो बहुविधः क्रीडते गोपबालकैः । गोपालाः सुवलस्तोककृष्णदामसुदामकराः ॥ २५॥
1
१. महाहैरस्नपटित-क. । २. सुद्ण्डाः-ङ. । २. मुद्गरो दण्ड-ड. । ४, कम्बदेशीति सु-क.4 ५. सद्क्त्र-र. । ९. बी जयन्तो-डङ. । ७. कर्ये -क. । ८. बन्दयन्तो-ड. । ९. वैश्वला-ङ. । १०. बर्दृभुवः त्रग्वाकङृत-ङ. । ११. म्बु न-क. । १२. अम्बुदेत्तगः-ड. । १३. ज्रम गोस्लङ्कगोकेषप्रास्फोटन- विकर्षणे -क., । १४. स्पन्द् - ङ, । १५. हासिकेः-ङ, ।
श्रीकृष्णयामलमहातन्तरम्
किद्किणीष्मद्रसेनांशुकलविङ्कुप्रियङ्कुराः ` । पण्डरीकःविकङ्काख्यद्य मत्सेनविलासिनः ॥ २६ ॥ ष्मन्दराजुनगन्धवं "वसन्तोज्ज्वलकोकरिलाः सनन्दनविदग्धाद्या एते प्रियसुहृत्तमाः ॥ २७ ॥ कृष्णदेहोदद्वाः र्यामगौराङ्गा दिव्यरूपिणः । विशाल*वृषभौजस्विदेव प्रस्थवरुथपः ॥ २८ ॥ ‹माकन्दकूसुमा पौीडमणिबन्धकरन्धमा मन्द | | रदचन्दनं कुन्दः “कुलिन्दकुलिकादयः ॥ २६ ॥ कनिष्ठरूपास्ते गोपाः प्रभोः सेवानियोजिताः । मण्डलीभद्रयक्ेनद्रभटभद्राङ्गगोभटा ॥ ३० ॥ तटवधं नभद्रेहवीरमभद्रमहागुणा कुलवीरमहाभीमदिव्यशक्तिसुरप्रभाः ॥ ३१॥ रणस्थिरः सुस्थिरश्च स्थिरानन्दपुरन्दरौ एते वै ऋषयो मत्यंलोकमासाद्य जन्मभिः ॥ ३२॥ उग्रं स्तपोभिर्गोविन्दं प्रसाद्य जगदीश्वरम् । गोपत्वं प्राप्य सुचिरं “'कृष्णध्यानाहूतङयसः ॥ ३३ ॥ कृष्णेन सहिता नित्य गोलोके विहरन्ति ते । गोपालाः कृष्णसुहुदो “रहस्यज्ञा इमे पुराः ॥ ३४॥ बाह्यं वृन्दाश्वनप्रान्ते महाकन्दवनस्य च। भाण्डीरकवटस्याधः केषाच्िद् वसति [: | प्रिये ॥ ३५॥ बृहद्वने च केषाच्ित् केंचिदास्रवने तथा। ''स्थलपद्मवने केचित् केचित् मधुवनान्तरे ॥ ३६ ॥ मन्दारविपिने केचित् पारिजातवने परे। खादिरे विपिने केचित् केचित् तालवने प्रिये ॥ ३७ ॥
१. तत्र से-क. । २. विटङ्काभ्यां द्विमतसेन-ङ. । ३. मन्धराजन-क, । ४. वसतो जर-ऊ. । ५. वृषभोजक्तिदे-ड. । ६. मणिरङ्गक~ङ, 1 ७, ङुलिन्द् ड । भ भद्वषगमदरं तु वीर-ङ. । ९. बः स्थिरः-ड. । १०. प्रस।द्-क. । ११. कष्णध्यानङृताङ्गसः-ङ., अत्र “करृष्णभ्यानहृतांहस इति शुद्धः पाटः प्रतीयते । १२. रहसक्ता-ङ. । १३. वनस्यान्ते-क. ।. १४. °स्थङ-““ प्रिये" इति पङ्क्िश्रयं नास्ति-क, ।
सप्तमोऽध्यायः ४१
अशोकाख्ये वने केचिल्लिवसन्ति शुचिस्मिते) राधाकृष्णरसक्री डासमये समुपस्थितान् ॥ ३८ ॥ तान् दृष्ट्रा क्रीडिता देवी भुवनत्रपसेविता। प्रविष्टा विपिनं घोरं लीलया गजगामिनी ॥ ३६ ॥ तद् दृष्ट्वा तत्प्रियष्सख्याः षड ङ्गु बलादयः । प्रविष्टाः षट् तदन्ये ये वनात्तस्माद् बहिगंताः ॥ ४० ॥ एतस्मिन्नेव समये सान्त्वयामास राधिकाम् । वृन्दावनं समानीय हसन् ङष्णोऽत्रवीदिदम् ॥ ४१॥ अद्यप्रभृति राधायाः वनेऽस्मिन् प्रविसन्तिये। ते तु प्रवेशमात्रेण भवन्तु वरयोषितः॥ ४२॥ वनाद् बहिगंता भभूयः स्वस्वरूपा यथा पुरा। गोपालाः कृष्णवचसा भयसंत्रस्तमानसाः ॥ ४३॥ एतच्त्वा च वचनं कृष्णस्य परमात्मनः । ये गतास्तदवनं ते च स्त्रीत्वं प्राप्तास्तदन्तिके ॥ ४४॥ निवसन्ति महाभागे ये चान्ये वनवासिनः। मनस्विनो महात्मानो गोपाभलास्ते तपस्विनः ॥ ४५॥ तपसा तोषमापन्नस्तेषां वृन्दावनेश्वरः। दिहक्षु(क्ष् )णां च मध्येऽसावाविभय कृपानिधिः ॥ ४६॥ एकेन वपुषा तेषां प्रेमबद्धो ्दयाम्बुधिः। अन्येन वपुषा वृन्दावने क्रीडति राधया ॥४७॥ श्रीमद्वृन्दावनेश्व्यां चन्द्रावल्या च «मायया । गोपवेशधरो गोपेगपरीभी रसविग्रहः ॥ ४८ ॥ शद्धा रोचितवेशाब्वः श्रीमद्“गोपालनागरः। गोपिकास्तत्र या भद्रे ताः श्वुणुस्व (ष्व) वदामिते ॥ ४६ ॥ तासां नामा (म)गणाख्याने सुखं मे जायते भृशम् । श्रीराधा या प््पराश्क्तिः स्वयं श्रीकृष्णरूपिणी ॥ ५० ॥ नित्या रसमयी शक्तिः श्रीमद्वृन्दावनेश्वरी । चन्द्रावली तथा चान्या त्रिपुरादेहसम्भवा॥ ५१॥
१. खखाः-ङ. । ` २, षडङ्गे सुचखाद्यः-ङ. । ३. निवसन्ति-क, । ४. यूयं-ङ्.। ५. ऊास्तु-ङ, । ६. रखाम्बुभिः-क. । ७, गोलोकना-ङ. । ८, याताः श्रणु व~क. । ९. ^ताघा*“““खुशम्' नास्ति-ङड. । १०. धरामूिः-क, ।
४२ श्रीकृष्णयामल महातन्त्र
राधाविरहबाधाभिर्बाधितःसे(तस्ये)्रस्य च। क्रीडार्थं निमिता देव्योच (व्यश्च) नद्रकोटिभ्सुशीतलाः ॥ ५२ ॥ चन्द्रावलीति विख्याता नागरीवृन्दवन्दिता। विरहानलतप्ताङ्ख आल्वादमकरोद्यतः ॥ ५२ ॥ "्चन्द्रावलीति लोकेऽस्मिन् गीयते चन्द्रनायभा (?)। ललिताख्या परा देवी या साक्लाद् भुवनेश्वरी ॥ ५४॥ रिरंसुभंगवान् कृष्णो रतिकालेऽन्यमानसाम् । आलक्ष्य तां महादेवीं व्यत्तवान्यां वशमागतः ॥ ५५ ॥ तेन दोषेण सा देवी च्युता वृन्दावनादतः। तस्या भ्एकांशतः पुरस्त्वान्नारदश्चाऽभवन्मूनिः ॥ ५६ ॥ विक्ाखाऽन्या तथा श्यामा पद्या शैव्या च भद्रिका । तारा विचित्रा गोपाली पालिका चन्द्रशालिका ॥ ५७ ॥ मद्कला विमला ष्वीणा तरलाक्षी मनोरमा। कन्दपं मञ्जरी मञ्जुभाषिणी भचाञ्जनेक्षणा ॥ ५८ ॥ - कुमुदा कैरवी सारी शारदाक्षी विशारदा। वशङ्करी कुटकुमा ष्णा साराङ्गीन्द्रावली शिवा ॥ ५६ ॥ तारावली गुणवती सुमुखी केलिमजञ्जरी। हारावली चकोराक्षी भारती "कामिलादिकाः॥ ६० ॥ एताः संक्षेपतः प्रोक्ताः श्रेष्ठा गोपकूमारिकाः । राधाङ्खसम्भवाः कोटिसंख्या वै वरयोषितः॥ ६१॥ राधायाइच प्रियाः सख्यो यास्ताः श्यणु वरानने । सुचित्रा चम्पकलता रङ्खदेवी “सुदेविका॥ ६२॥ तुद्धविदयेन्दुलेखा च मण्डली मणिकुण्डला । कुरङ्काक्षिः मालती च माधवी च मदालसा ॥ ६३॥ मञ्जुला चन्द्रतिलका सुमध्या मधुरेक्षणा। मञ्जुमेधा शशिकला ^"गुणच्रूडा ध्ववराङ्खदा ॥ ६४ ॥
१. समप्रभाः-क. । २. “चन्द्रावली“““ऽन्यमानसामू इति पक्तिन्रयं नास्ति-ङः, । ३. एकाङ्ग तः-डः. । ४. नीखा-ऊ. । ५. वा(ख)ज्ञनेत्तगा-ङ. ६. केशरी-क. । ७. कामिनादिकाः-ङ. । ८. श्णुभ्व वरानने-ङ्. | ९, सुवेदिका-क. । १०. गुणच्यु डा-ङ. । ११. वराङ्गना ~क. ।
सप्तमोऽध्यायः ४/३
कमला कामलतिका सुरङ्खी प्रेममजञ्जरी। माधुरी चन्द्रिका चन्द्रा सुवला तनुमध्यमा ॥ ६५॥ कन्दपंसुन्दरी मञ्जुकेशी केशवमोहिनी । इत्याद्या रूपशीलाढ्वाः प्राण तुल्याः किशोरिका: ॥ ६६ ॥ अन्याः श्यृणु सखी तस्या लासिका केलिकन्दली । कादम्बरी शशिमुखी चन्द्ररेखा प्रियम्बदा ॥ ६७ ॥ मदोन्मदा मधुमती वासन्ती कलभाषिणी । रत्नवेणी मणिमतीं कपूरतिलकोज्ज्वला ॥ ६८ ॥ एत वुन्दावनेश्वर्याः प्रायः सारूप्यमागताः । अन्याः सख्यो महादेव्या मनोज्ञा मणिमञ्जरी ॥ ६६ ॥ सिन्दूरा चन्दनवती कौमुदी मदिरालसा। काननादिगताः सख्यो वृन्दाकून्दलतादिकाः ॥ ७० ॥ कामदा नाम या देवी सखीभावे विशेषभ।(क्। महालक्ष्मी भ्समानैता राधया तुलिता गुणैः ॥ ७१॥ कटाक्षमात्रब्रह्माण्डकोरिक्षोभकराः पराः । राधाज्ञावङ्वातिन्यः श्रीकृष्णसुखदायिकाः ॥ ७२ ॥ यासां कटाक्षमात्रेण ब्रह्मविष्णुमहेश्चराः। कृताथंमिव मन्यन्ते स्वात्मानं जगदीश्वराः ॥ ७३॥ अथ वन्दावनेशस्य दासदासीगणान् श्णु।
मधुपिङ्खलपुष्पाङ्घहासङ्कादयाविदूषकराः ॥ ७४ ॥ कडारभारतीबन्धध्चारुवेषादयो विटाः । चेटाभङ्गुरभृद्धारसन्धिकश्प्रहिणादयः ॥ ७५ ॥
रक्तकः पत्रकः पत्री “मधुकम्बो मधुब्रतः। दालिकस्तालिको माली भानुमालाधरादयः॥ ७६ ॥ तद्वेणुश्णङ्गमुरलीयष्टिवाशादिधारिणः ` पृथुकाः पारवंगाः केलिकलापालापकौशलाः ॥ ७७ ॥
१. सुन्दरी-ड. । २. मानमज्जरी-ड. । ३. 'समनैला' इत्यस्य स्थाने “एतत"इति-क. । ४. आत्मानं-ङ. । ५. गन्धवेशादयो-क. । ६. गृहिखाद्यः- क. । ७. पीं पञ्चकः मधु-ङ. । ८. मधू कण्ठो-ड. । ९ शद्धसु-ङ. ।
४४ श्रीकृष्णयामलंमहातन्त्रमं
प्लवो मङ्गलः फुल्लः कोमलः कपिलस्तथा ।
ष्सुविगालविशालाक्षरसालरसशालिनः ॥ ७८ ॥ जम्बनाद्याञ्च ताम्बूलस्परिष्कारविचक्षणाः। पयोदवारि दाद्याइच ्नीरसंस्कारकारिणः ॥ ७६ ॥ वस्त्रसस्कारनियुणाः सारङ्कबकूलादयः। १मकन्दो महागन्धसैरिन्ध्रमधुकन्दलाः ॥ ८० ॥ मकरन्दादयश्चामी 'सदाश्बुद्धारकारिणः । सुमनाः कूसुमोल्लासपुष्पभहासहरादयः ॥ ८१ ॥ गन्धाङ्खरागमाल्यादिपृष्पो पस्कारकारिणः | केरसंस्कारकूशलौ सुबन्धकरभाजनौ ॥ ८२॥ कपूरकुमुदावेतो दपंणापंणकमंणि ।
शीतलः प्रगुणः स्स्वक्षो विमलः कमलस्तथा ॥ ८३॥ श्थानपीर्धरा एते परिचर्यापरायणाः।
< धनिष्ठाचन्दनकल(गुणमालारतिप्रभाः ॥ ८४ ॥ धरणीसुप्रभाशोभारम्भाद्याः परिचारिकाः। गृहसम्माजंनालेपक्षीरावरतादिकोविदाः ॥ ८५॥
चेल्यः कुरङद्धीमभृङ्गारीसुलम्बालम्बिकादिकाः । “चतुरदइचारणो धीमान् ५पेशलाद्याशचरोत्तमाः ॥ ८६ ॥ चरन्ति गोपगोपीषु नानावेषेण ये सदा| ९्द्तीविशारदोतुङ्खवावदूकमनोरमाः ॥ ८७ ॥ ९नीतिसारादयः केलि कलौ \भ्व[माकुलेषु च । वृन्दावृन्दारिकाश्सेनासुबालाद्या्च दूतिकाः ॥ ठठ ॥ ९“कुञ्जादिसंस्क्रियाभिन्ञा वृन्दा तासु ‹वरीयक्ती । ‹"वीणानाम वरा दूती ख्याताऽन्या पूजिता वने ॥ ८६ ॥